Thursday, December 15, 2011

अनोखे कण की झलक

पहले लग रहा कि सफलता की गुंजाइश बहुत कम बची है यूरोपीय परमाणु शोध संस्थान (सर्न) का लार्ज हैड्रोन कोलाइडर (एल एच सी) परियोजना विज्ञान के इतिहास की सबसे विशाल, सबसे मँहगी और सबसे महत्वाकाँक्षी परियोजना है औऱ इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसे सूक्ष्म कण का पता लगाना था, जिसका अस्तित्व वैज्ञानिकों के लिये सिर्फ सैद्धांतिक गणित में था। इस कण का नाम हिग्ज बोसान है और अगर यह नही मिलता तो सूक्ष्म कणों की भौतिकी के सारे नियम उलट पलट हो जाते। लेकिन अभी यह खबह आयी है कि एल एच सी के दो मापक यंत्रों ने उस कण का पता लगा लिया है जो संभवतः हिग्ज बोसान है। अभी और प्रयोंगो से ही इस बात की पुष्टि हो पायेगी लेकिन वैज्ञानिक इस सफलता से काफी उत्साहित हैं क्योकि भौतिकशास्त्र की सबसे बड़ी खोंजों में से यह एक होगी। जाहिर है, हिग्ज बोसान का अस्तित्व सिद्ध नही होता तब भी यह भौतिकी इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक होती। बोसान कुछ खास किस्म के एटामिक कणों को कहते हैं जिनका नामकरण महान भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस के नाम पर किया गया है।1960 के दशक में अंगरेज भौतिकशास्त्री पीटर हिग्ज और उनके सहयोगियों ने हिग्ज बोसान की अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा के मुताबिक विभिन्न सूक्ष्म कणों की संहति या भार इस विशिष्ट कण की वजह से होता है। यानि हिग्ज बोसान की खोज के साथ ही परमाणु भौतिकी का वह माडल पूरा हो गया जिसे स्टैंडर्ड माडल कहते हैं और जिसके आधार पर प्रकृति में पाये जाने वाले तमाम सूक्ष्म कणों और बलों के कार्य-कारण की व्याख्या हो सकती है, सिवाय गुरुत्वाकर्षँण के। सैद्धांतिक रूप से तो यह माडल सही था लेकिन इसको पूरी तरह से सही तब कहा जा सकता था जब इसकी प्रायोगिक स्तर पर तस्दीक हो सके।
आधुनिक भौतिक शास्त्र में सबसे मुश्किल काम प्रयोगों से कुछ सिद्ध करना है। क्योंकि हम या तो बहुत विराट शक्तियों और प्रकाश वर्षों के आमने सामने होते हैं या अत्यंत सूक्ष्म कणों और सेकेंड के हजारों-हजारवें हिस्से से हमारा साबक पड़ता है। इस स्तर की नाप-जोख अक्सर असंभव ही साबित होती है। हिग्ज बोसान कोई आसानी से दिखने वाला कण नही है, उसका अस्तित्व इतने कम समय  के लिये होता है कि उसके सामने एक सेकेंड भी कई युगों के समान लगे। फिर वह आसानी से स्वतंत्र रूप में मिलने वाला भी नही।  इसलिये वेज्ञानिकों ने ये तय किया कि सृष्टि के आरंभ  यानि बिग बैंग जैसी परिस्थितियाँ पैदा की जाय। एल एच सी में फ्रांस और स्विट्जरलैण्ड की सीमा पर धरती से 174 मीटर नीचे और 27 किमी लंबी सुरंग है, जिसमें बहुत तेजी से सूक्ष्म कणों को आपस में टकराया जाता है। सैकड़ों बेहद सूक्ष्म संवेदी मापक हर हलचल को रिकार्ड करते रहते हैं औऱ दुनिया में बैठे वैज्ञानिक अपने-अपने कंप्यूटरों पर इस जानकारी का विश्लेषण करते रहते हैं। इसी प्रयोगों के दौरान उन न्यूट्रिनों का भी पता चला था जिनकी गति संभवतः प्रकाश की गति से भी ज्यादा तेज है। अगर हिग्ज बोसान न भी मिलता तब भी इस प्रयोग से इतनी जानकारी मिल ही रही थी जो वैज्ञानिकों को वर्षों तक व्यस्त रखती। प्रयोग 2008 में शुरू हुआ था और धीरे-धीरे हिग्ज बोसान की खोज का दायरा सिमट गया। वैज्ञानिक यह सोचने लगे थे कि कणों को वजनदार बनाने वाला वह कण नही मिला तो फिर क्या संभवनायें हो सकती है। लेकिन दे डिटेक्टरों से संकेत मिलने पर अब फिर उत्साह लौटा है। जल्द ही यह घोषणा हो सकती है कि पीटर हिग्ज ने जो सोचा था, वह सही निकला।
हिंदुस्तान अखबार, संपादकीय- 15-12-2011 से साभार
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Friday, December 9, 2011

ठंड की शुरूआत

 दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।
जब बादलों ने धरती से अपना पुराना हिसाब चुकाने का अच्छा समय देखकर सूर्य देव से साँठ-गाँठ की और चुपके-चुपके एक समझौता करके धरती की गपशप की साथिन धूप को चौखट पार नही करने दिया तब बेचारी सीधी-सादी धूप बादल और सूर्य के जाल में फँसकर अपनी सहेली से मिल नहीं पायी और गुस्से में सूर्य को गालियाँ देने लगी...लेकिन कुछ हो नही पाया। बादल कुछ ज्यादा ही चालाक निकला और उसने धरती को ताना मारा अब तुम्हारी सारी हेकड़़ी निकल जायेगी जब बच्चों जैसे तुम्हारे पशु-पक्षी-पेड़-पौधे और यहाँ तक कि मनुष्य भी त्राहि-त्राहि करने लगेंगे। तब धरती ने कहा-
धरती-
तुम जैसे पाषाण हृदय दूसरों का दर्द क्या समझेंगे, जिनका अपना कोई घर नही, कोई परिवार नही वे लोग तो दूसरों को तकलीफ देकर अपने लिये खुशी तलाशने की बेवकूफी जीवन पर्यंत करते रहते हैं।
बादल-
मेरा कोई घर नही इसलिये मैं निश्चिंत रहता हूँ...मुझे परिवार का डर नही सताता और न ही मुझे अपने संबंधियों के लिये कोई चिंता करनी पड़ती है...अगर इस स्वतंत्रता और बेफिक्री के आनंद से तुम वंचित हो तो इसमें कोई आश्चर्य नही कि तुम इर्ष्या के दावानल में जलती रहो।
धरती-
जिस घर के न रहने से तुम निश्चिंत रहते हो, जिस परिवार के भरण-पोषण का डर तुम्हे दिन रात सताता रहता है औऱ जिन संबंधियों के न होने से तुम बेफिक्र रहते हो उसके पास होने के सुकून और शांति से तुम कोसों दूर रहे हो ठीक उसी तरह जैसे चंद्रमा से चातक दूर रहता है।
बादल-
चातक अपनी बेवकूफी की वजह से कष्ट भोगता है वरना प्यास तो किसी भी जल से बुझ सकती है।
धरती-
तुम जैसे बेवकूफ जीवन भर यही सोचते रहेंगे कि चातक प्यास बुझाने के लिये स्वाति की बूँद का इंतजार करता है।

Friday, November 25, 2011

महराजगंज के निवासियों के लिये एक नया नाम

मेरी हमेशा से यही सोच रही है कि काश मैं अपने छोटे से कस्बे के लिये कुछ ऐसा कर पाता कि इसकी भी पहचान देश और विश्व स्तर पर हो सकती। फिलहाल ऐसा अभी हो तो नही पाया लेकिन कोशिश अभी जारी है और यकीनन भविष्य में यह होगा जरूर भले ही उसका कारण मैं ना रहूँ।
फिलहाल तो मैने कुछ देर पहले अपने यातायात वाले पोस्ट को कुछ दोस्तों के ईमेल आईडी पर भेजा जिसे भेजते हुये मैसेज वाले बाक्स में मैनें अचानक ही लिख दिया कि...plz fwd this to all maharajas...यह लिखते ही अचानक ही ख्याल आया कि अगर मुंबई के मराठी लोग मुंबईकर हो सकते हैं....दिल्ली के दिलवाले हो सकते हैं...पंजाब के पंजाबी हो सकते हैं....केरल के मलयाली हो सकते हैं तो महराजगंज के Mahrajas क्यों नही हो सकते हैं। जरूर हो सकते हैं यह नाम महराजगंज के निवासियों के लिये और भी प्रासंगिक है क्योंकि यहाँ के निवासियों जैसी अमन पसंद जनता शायद ही कहीं हो...हम भले ही विकास के टट्टू पर बैठकर ही अपनी यात्रा पूरी करने की कोशिश कर रहे हों और शेष भारत के तेज कदमों से कदम मिलाकर ना चल पा रहे हों लेकिन हममें एक बात तो है जो औंरों से अलग करती है और वह है हमारी मेहनत से उगाई गई अनाज की बोरियाँ, धान और गेहूँ के रिकार्ड उत्पादन से लाखों भारतवासियों को मिल रहा भोजन, सांप्रदायिक सौहार्द से की मिसाल कायम करती यहाँ की सहिष्णु जनता जो दिल से राजा ही नही महाराजा है....हम पेट भरते हैं..लेकिन हमारे पेट पर उत्तर प्रदेश से बाहर लात मारी जाती है...हम यहाँ पर सबका सम्मान करते हैं, आने वालों की इज्जत करते हैं जबकि बाहर वाले हमें भिखारी कहकर दुत्कारते हैं और हमें हमारा हक देने से कतराते हैं...हम दिल्ली की सरकार बनाते हैं लेकिन वही सरकार हमें मू्र्ख बना देती है....हम आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं लेकिन हमें पिछड़ा कहकर पीछे धकेल दिया जाता है....हम फिर भी आगे बढ़ने की कोशिख कर रहें है आज नही तो कल वह वक्त आयेगा जब यहाँ के लड़के अंग्रेजी नाम की विदेशी चाबुक को अपने हाथ में लेकर विकास नाम के बिगड़ैल घोड़े को मार-मारकर यहाँ पर लायेंगे और उसे सड़कों नही जुते हुये खेतों में दौड़ायेंगे... तब ना केवल राज ठाकरे जैसे लोग बल्कि चिदंबरम जैसे लोग भी मानने के लिये बाध्य होंगे कि हम ही हैं महाराजा....।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

अतिक्रमित सड़कों पर अनियंत्रित यातायात से जूझता महराजगंज

2001 की दीपावली की पूर्व संध्या (जिसे धनतेरस के नाम से भी जाना जाता है) पर महराजगंज में टू व्हीलर की बिक्री के आकड़ें अगले दिन अखबार में पढ़ते हुये एक बारगी विश्वास ही नही हुआ कि यहाँ पर ऐसा भी हो सकता है। धनतेरस के दिन यहाँ पर एक करोड़ की बाइक्स बिकी थीं। महराजगंज को करीब से जानने वालों के लिये य़ह खबर चौंकाने वाली हो सकती है, लेकिन असल चौंकाने वाली चीज तो दूसरी है। जितनी तेजी से यहाँ पर बाइक्स की बिक्री हो रही है उसका दूसरा पहलू यहाँ की गलियों जैसी पतली सड़कों पर देखने को मिलता है जो पहले से ही दुकानदारों के अतिक्रमण से बेहाल हो रही हैं। उस पर कोढ़ में खाज वाली स्थिति यहाँ पर बाइपास की कमी कर देती है जिसके न होने की वजह से ट्रक और बस जैसे भारी वाहनों को मुख्य कस्बे से होकर जाना पड़ता है और नतीजन ट्रैफिक जाम जैसी समस्या से दो चार होना वर्तमान महराजगंज कस्बे की नियति बन चुकी है। बात यहीं तक सीमित रहती तो गनीमत थी लेकिन स्थिति बहुत ज्यादा तकलीफदेह तब हो जाती है जब स्कूलों की छुट्टियाँ होती हैं और सभी मुख्य़ स्कूलों की बसें एक ही रास्ते से होकर आने जाने का प्रयास करती हैं। अगर ठीक उसी समय कुछ ट्रक भी आ गये तो हो गया बंटाधार। इसी अफरा तफरी के माहौल में मामला बिगड़ता है और कोई न कोई अनहोनी घट ही जाती है जब, स्कूल से लौट रहा छोटा बच्चा या फिर बच्ची, अपने आपको संभाल नही पाते और अनियंत्रित होकर किसी वाहन के चपेट में आ जाते हैं। अभी हाल में ही कुछ दिनों  पहले मऊपाकड़ में एक स्कूली छात्रा की ट्रक के चपेट में आ जाने की वजह से दर्दनाक मौत हो गई।
महराजगंज कस्बे में नवंबर का महीना यातायात महीने के रूप में मनाया जाता है लेकिन आँकड़े कहते हैं कि 1 नवंबर से 20 नवंबर तक के बीच में यहाँ दुर्घटना की वजह से 18 मौतें हो चुकी हैं जिसमें कस्बे में चार शामिल हैं।
अभी डेढ दो महीने पहले मेरे स्कूल के एक छात्र का भी एक्सीडेन्ट हो गया पर सौभाग्य से वह बच गया और उसे हल्की-फुल्की चोंटे ही आयीं फिलहाल तो वह आराम कर रहा है। कुछ महीने पहले मेरे सामने ही एक वृद्ध आदमी अनियंत्रित होकर एक ट्रक के पिछले पहिये पर ही गिर पड़ा लेकिन उसकी किस्मत बहुत अच्छी थी कि वह सही सलामत बच गया। ये सारे आकडे़ं बताते हैं कि महराजगंज की सड़कें सुरक्षित नही रह गई हैं विशेषकर बच्चों और वृद्धों के लिये।
जनता की बढ़ रही क्रय क्षमता का असर सड़कों पर विशेष तौर पर दिख रहा है जहाँ पर साइकिलों से ज्यादा मोटरसाइकिलें दिख रही हैं। अनियंत्रित गति से बढ़ रही बाइकों की संख्या चलाने वालों की धैर्य क्षमता पर भी असर डाल रही है जिसकी वजह से जल्दी निकल जाने की कोशिश भी बढ़ती जा रही है। हमारे कस्बे में भविष्य में यह समस्या और भी गंभीर होने वाली है क्योंकि यहाँ पर न तो कोई यातायात नियम का अनुसरण करता है और न ही इसके लिये कोई दिल से कोशिश करता है। पर जब हम अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं तो हमें फिक्र होनी ही चाहिये कि क्या ऐसा नही हो सकता है कि सड़कों से इस दबाव को कम किया जा सके।
आज सड़क पर चलने में स्वयं बचकर चलना ही हमारी सुरक्षा की गारंटी नही रह गई है जब तक कि हम हर आने जाने वाले से बचकर नही चलें। मेरे लिये सबसे बड़ी हैरत की बात पिछले दिनों रही जब मुझे सरोजनी नगर वाली गली से निकल कर मुख्य सड़क पर आने के बाद हनुमान गढ़ी तक आने में लघभग 15 से 20 मिनट लग गये। 26 साल तक महराजगंज में रहते हुये पहली बार यह अहसास हुआ कि हालात बड़ी तेजी के साथ बदल रहे हैं अगर हमने कुछ नही किया तो स्थिति और भी खराब हो जायेगी। मँहगाई की सुरसा से निकलने की कोशिश में बाइक पर रेंगते हुये उस दिन मुझे लगा कि बाइक में मेरा पेट्रोल नहीं बल्कि मेरा खून जल रहा है।
काफी दिन से सोच रहा हूँ कि अब बाइक से स्कूल जाना छोड़ ही दूँ...लेकिन यह दिखावे की प्रवृत्ति मेरी दुश्मन बनी हुई है...देखता हूँ कि कब इसे छोड़कर महराजगंज की कमनीय बाला के कटि प्रदेश सदृश पतली सड़कों पर अपनी बाइक सदृश छोटे चींटे के रेंगने कि गति को शांत कर सकता हूँ, इसका दूसरा अच्छा पहलू यह होगा कि अपने देश के लिये मैं हर महीने लघभग 5 लीटर पेट्रोल बचा सकता हूँ.....।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Wednesday, October 26, 2011

शिब्बनलाल सक्सेना


शिब्बनलाल सक्सेना, महराजंगज के मसीहा के रूप में प्रसिद्ध। जन्म 13 जुलाई 1906 में आगरा के गोकुलपुरा नामक मुहल्ले में अपने मामा के घर पर। बरेली में आवला तहसील, बल्लिया नामक गाँव के मूल निवासी जिन्होने महराजगंज के विकास के लिये अपना पूरा जीवन लगा दिया। पेशे से डिग्री कालेज के अध्यापक शिब्बन लाल सक्सेना ने 1932 में अपने अध्यापन कार्य से इस्तीफा दे दिया और महात्मा गाँधी के आह्वान पर पूर्ण रुप से नेशनल मूवमेंट में हिस्सा लेकर महराजगंज के किसानों और यहाँ के मजदूरों को इसमें हिस्सा लेकर आंदोलन को मजबूत बनाने के लिये प्रेरित किया। मृत्यु 20 अक्टूबर 1985 को महराजगंज में।
 
== '''प्रारंभिक जीवन''' ==
शिब्बनलाल सक्सेना का जन्म 13 जुलाई 1906 में अपने मामा के घर आगरा के गोकुलपुरा नाम के मुहल्ले में हुआ। इनके पिता का नाम श्री छोटेलाल सक्सेना था जो पोस्टमास्टर थे। इनकी माता का नाम बिट्टीरानी था। दादाजी का नाम नारायणदास था जिनके तीन बेटे- श्यामसुन्दर, छोटेलाल तथा रामप्रीत थे। शिब्बनलाल का परिवार अपने जमाने में बल्लिया का एक समृद्ध परिवार था जिसकी वजह से उसका गाँव में काफी सम्मान था। सबकुछ ठीक-ठाक चलता अगर शिब्बनलाल की माता का देहांत सात साल की उम्र में और उसके डेढ़ साल बाद ही पिता का भी देहांत नही होता। बालक शिब्बनलाल और उनके दो छोटे भाई-बहन होरीलाल और प्रियंवदा को उनके मामा दामोदार लाल सक्सेना ने सहारा दिया और अपने साथ कानपुर ले गये जहाँ पर वह स्वयं वकालत करते थे। शिब्बनलाल की प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा कानपुर में ही हुई। शिब्बनलाल प्रारंभ से ही काफी मेधावी छात्र रहे थे जिसके फलस्वरूप उन्होने अपनी सारी परीक्षायें न केवल प्रथम श्रेणी में बल्कि स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की थीं। कानपुर में शिब्बनलाल को अपने सामर्थ्य से कहीं अधिक की सुविधायें प्रदान करने के बाद दामोदर लाल ने उन्हे उच्च शिक्षा के लिये इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा जहाँ से शिब्बनलाल ने 1927 में अपनी बी. ए. की परीक्षा गणित और दर्शन शास्त्र विषयों के साथ स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की। 1929 में इन्होंने एम. ए. की परीक्षा स्वर्ण पदक प्राप्त करते हुये गणित विषय के साथ उत्तीर्ण की। शिब्बनलाल शुरू से ही स्वराज आंदोलन से काफी प्रभावित थे जिसकी वजह से वह हमेशा ही लोगों की नजरों में चढे रहे। विश्वविद्यालय में एक बार किसी उत्सव में भाग लेने पहुँचे शिब्बनलाल ने शेरवानी पहना था जिसे देखकर प्राचार्य ने उन्हे देशी पहनावा पहनने के लिये टोक दिया। शिब्बनलाल ने उसी समय से अंग्रेजी वेश-भूषा को अलविदा कह दिया और आजीवन धोती और कुर्ता ही पहनते रहे। सन् 1930 में शिब्बनलाल गोरखपुर के सेन्ट एण्ड्रूयूज कालेज में गणित के प्रवक्ता के रुप में नियुक्त हुये और 1931 में उन्होने आगरा विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र विषय से एम. ए. की डिग्री ली। शिब्बनलाल पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को भी पूरा महत्व देते थे और यह मानते थे कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का विकास होता है।  वे पहलवानी करते थे और विश्वविद्यालय में फुटबाल टीम के कप्तान थे।

== पहली गिरफ्तारी ==
कानपुर में रहते हुये ही शिब्बनलाल आजादी की लड़ाई का महत्व समझने लगे थे और स्वराज आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्शाने लगे थे। सन् 1919 में हुये जलियावाला कांड ने जब पूरे भारत को हिला कर रख दिया तब कानपुर में शिब्बनलाल ने भी 13 साल की उम्र में एक विरोध जुलूस का नेतृत्व किया और पकड़े गये। उस समय उन्हे तीन बेतों  की सजा मिली जिसने शिब्बनलाल का विश्वास और भी मजबूत बना दिया और आजादी के लिये लड़ी जा रही लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये प्रेरित किया।

== महात्मा गाँधी से मुलाकात और स्वतंत्रता की लड़ाई के लिये प्रेरणा ==
सन् 1930 में शिब्बनलाल सेंन्ट एण्ड्रूयूज कालेज में गणित के प्रवक्ता नियुक्त हुये और उन्होने यहीं से कारखाना मजदूरों को एकत्र करके कारखाना मालिकों की मनमानी का विरोध करना शुरु कर दिया। उसी दौरान महात्मा गाँधी एक सभा में भाषण देने के लिेय गोरखपुर आये हुये थे। गाँधी जी से शिब्बनलाल की पहली मुलाकात यहीं हुई और गाँधी जी ने उन्हे कांग्रेस में आने का न्यौता दिया जिसे शिब्बनलाल ने स्वीकार कल लिया। इसी घटना के कुछ दिनों के बाद ही शिब्बनलाल कांग्रेस के एक अधिवेशन में भाग लेने के लिये बनारस पहुँचे जहाँ पर गाँधी जी ने एक बड़ी ही हृदयविदारक घटना के बारे में बताया जिसने शिब्बनलाल को पूरी तरह झकझोर दिया और शिब्बनलाल ने महराजगंज जाने का निर्णय लिया। अखबार में निकली एक खबर के अनुसार महात्मा गाँधी ने बताया कि महारजगंज में जमींदारों ने राजबली नाम के एक किसान को जिंदा जला दिया है। गाँधी जी ने उस समय उपस्थित लोगों से महराजगंज की दयनीय हालत के बारे में चर्चा की और किसी को वहाँ जाकर जागृति फैलाने का अनुरोध किया। कोई जाने के लिये तैयार नही हुआ अंत में शिब्बनलाल ने महाराजगंज जाकर वहाँ के लोगों के एक करने का बीडा़ उठाया और गाँधी जी से आशीर्वाद लेकर अपने प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर महराजगंज आ गये।
== शिब्बनलाल और महराजगंज ==
वर्तमान में उत्तर प्रदेश का एक जिला महारजगंज उस समय गोरखपुर जिले का एक तहसील था जहाँ पर किसी भी प्रकार की कोई सुविधायें नहीं थीं। चारों ओऱ जमींदारों का आतंक छाया हुआ था जिनके खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नही थी। ऐसे समय में जब शिब्बनलाल यहाँ आये तो उन्हे अपने साथ काम करने के लिये लोगों को इकट्ठा करने में ही तमाम परेशानियाँ झेलनी पड़ीं। शुरुआती दौर में उन्होने गाँव-गाँव जाकर प्राथमिक स्तर पर लोगों का संगठन खड़ा किया और उन्हे जमींदारो के खिलाफ तैयार किया। उस समय गन्ना यहाँ की प्रमुख फसल थी जिसके किसानों के हक के लिये उन्होने 1931 में ईख संघ की स्थापना की जिसका अस्तित्व आज भी है और जो सबसे पुराने संघों में से एक है। आगे चलकर ईख संघ के आंदोलनों की वजह से ही केंन्द्रीय विधान सभा को गन्ना एक्ट लागू करना पड़ा था। शिब्बनलाल ने अपनी सफल हड़तालों की वजह से गन्ने का तत्कालीन मूल्य दो आना प्रति मन से पाँच आना प्रति मन करा दिया था।
== विभिन्न किसान और मजदूर आंदोलन ==
महराजगंज में उस समय कृषि के अलावा ऐसा कुछ नही था जिसके लिये इसे जाना जा सके। यही वजह थी कि शिब्बनलाल ने यहाँ आते ही यह समझ लिया था कि यहाँ के किसानों में जागृत फैलाये बिना यहाँ का विकास असंभव है जिसके लिये उन्होने पहले किसानों को ही एक करना प्रारंभ किया। उस समय जमींदार ही उन सारी जमीनों के मालिक होते थे जिसे किसान जोतते थे और अन्न उगाते थे। किसान अपनी उपज का अधिकांश हिस्सा जमींदारों को लगान के रुप में दे देते थे। जिससे उनकी हालत में कोई सुधार नही हो रहा था। गन्ना किसानों की बेहतरी के लिये उन्होने गन्ना उत्पादन नियंत्रण बोर्ड की भी स्थापना की। जिस समय पूरा भारत गाँधी जी के अहिंसा मार्ग पर चलते हुये आजादी का सपना देख रहा था उसी समय महराजगंज शिब्बनलाल के नेतृत्व में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की शुरुआत में तत्पर था। 1937 से लेकर 1940 तक शिब्बनलाल ने विभिन्न किसान आंदोलनो से अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया जिसकी वजह से सरकार को जमीनों का एक बार फिर से सर्वे कराना पड़ा और जमीनों का पुनः आबंटन करना पड़ा। यह वही व्यवस्था थी जिसकी वजह से तत्कालीन महराजगंज के एक लाख पच्चीस हजार किसानों को उनकी जमीनों पर मालिकाना हक प्राप्त हुआ और किसानों को जमींदारों के चंगुल से आजादी मिली। अखबारों ने शिब्बनलाल को पूर्वी उत्तर प्रदेश का लेनिन कहकर संबोधित किया था। किसानों की जमीनों पर मालिकाना हक की इस व्यवस्था को '''गण्डेविया बंदोबस्त''' कहते हैं। शिब्बनलाल ने न केवल किसानों के हित के लिये बल्कि कारखाना मजदूरों के बेहतरी के लिये काम किया। उस समय महाराजगंज प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्र था जसकी वजह से इसके विभिन्न उपक्षेत्रों जैसे-घुघली, सिसवां, फरेन्दा इत्यादि में चीनी मिलें अपनी उन्नत अवस्था में थीं लेकिन इनके मजदूरों की हालत बड़ी खराब थी। शिब्बनलाल ने इन मिलों में मजदूर एशोसियेशन बनाये औऱ इनके मालिकों के अत्याचारों पर लगान लगाई। अपने विकास के कार्यों और फौलादी इरादों की वजह से शिब्बनलाल इस क्षेत्र के लिये मसीहा बनकर उभरे जिसकी वजह से यहाँ के जमींदारों ने उनके खिलाफ तरह-तरह के षडयंत्र करना प्रारंभ कर दिया। किसानों के लिये शिब्बनलाल का नारा हुआ करता था कि अपने खेत के मेड़ पर डटे रहों, उसे हरगिजन नही छोड़ो।
== शिब्बनलाल और जमींदारों के षडयंत्र ==
1940 तक आते-आते शिब्बनलाल जमींदारों के लिये आँख की किरकिरी बन चुके थे जिसे निकालना उनके लिेये आवश्यक हो गया था। शिब्बनलाल पर जमींदारों और पुलिस का मिलाजुला पहला सशक्त हमला 1942 में हुआ जिसमें शिब्बनलाल बचकर तो निकल गये लेकिन उनके तीन कार्यकर्ता शहीद हो गये। शहीदों की याद में विशुनपुर गबड़ुआ नामक गाँव में एक शहीद स्मारक भी बना हुआ है। शहीदों में सुखराम पुत्र बेचन कुर्मी तथा झिनकू पुत्र मानिक कुर्मी थे। एक व्यकित की मृत्यु इलाज कै दौरान हुई थी। घायलों में सोमदेव, जनकराज, त्रिलोक, तिलकधारी, रामधारी, शिवदत्त, सरजू, हरिवंश, रामजतन, नगई आदि थे। यहाँ से निकलने के बाद शिब्बनलाल को आखिरकार गोड़धोवा गाँव के बाहर उसी गाँव के जमींदार ने पकड़ लिया क्योंकि वह शिब्बनलाल पर घोषित किये गये पुरस्कार को लेना चाहता था। जब गोड़धोवा गाँव के जमींदार ने शिब्बनलाल को अपने आंगन में पकड़कर रखा था तो उसी समय हरपुर महंथ का काजी वहाँ पर पहुँचा और उसने शिब्बनलाल सक्सेना को माँगा जिसे न देने पर काजी ने जमींदार को गोली मार दी और उसकी वहीं पर मृत्यु हो गई। हरपुर मरंथ ने शिब्बनलाल को गोरखपुर के तत्कालीन कलेक्टर ई. वी. डी. मॉस को सौंप दिया जहाँ से शिब्बनलाल को फाँसी की कालकोठरी में डाल दिया गया जहाँ पर वह छब्बीस महीनों तक रहे और उन पर ना जाने कितने अत्याचार किये गये जिसकी वजह से शिब्बनलाल की ठीक तरह से बोलने की शक्ति जाती रही। मॉस ने शिब्बनलाल को फाँसी पर चढ़ाने का पूरा बंदोबस्त कर रखा था जिससे शिब्बनलाल को बचाया मॉस के एक पत्र ने जिसे उसने नैनीताल में रहने वाली अपनी पत्नी के नाम लिखा था। पत्र में उसने शिब्बनलाल को गालियाँ दी थीं और उनके बारे में सच्चाई लिखी थी। जब मॉस ने वह पत्र अपने चपरासी को पोस्ट करने के लिये दिया तो उस चपरारी ने उसे पोस्ट न करके पत्र शिब्बनलाल को पहुँचा दिया। उसी पत्र की बदौलत शिब्बनलाल जेल से बाहर आ सके। हालाँकि कहा यह भी जाता है कि शिब्बनलाल को जेल से निकलवाने में जवाहर लाल नेहरू की भूमिका रही थी।
== '''महराजगंज में शिक्षा की शुरुआत''' ==
1940 से पहले महराजगंज में कोई स्कूल नही था और चारों तरफ अशिक्षा का बोलबाला था। मुश्किल से ही कोई पढ़ालिखा व्यक्ति मिलता था। शिब्बनलाल ने अशिक्षा की कमी से होने वाली समस्या को समझा और 1940 में यहाँ का पहला स्कूल अपने राजनीतिक जीवन के प्रथम गुरू गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर खोला। जिसका वर्तमान नाम गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक इंटरमीडियेट कालेज है। 13 मार्च 1965 में शिब्बनलाल ने यहाँ का पहला डिग्री कालेज जवाहर लाल नेहरू के नाम पर खोला। इसके बाद 24 मार्च 1972 में उन्होने दूसरा डिग्री कालेज लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर खोला। शिक्षा के क्षेत्र में शिब्बनलाल द्वारा जलायी जाने वाली अलख का अंत यहीं नहीं हुआ और उन्होने अपना अंतिम डिग्री कालेज सिसवां के बीसोखोर में अपने पिता और मामा की याद में खोला जिसका नाम उन्होने छोटेलाल दामोदर प्रसाद स्मारक डिग्री कालेज रखा। वर्तमान में इस कालेज के नाम में शिब्बनलाल भी जुड़ गया है। इसके अतिरिक्त शिब्बनलाल ने शकुंतला बाल विद्या मंदिर के नाम पर एक जूनियर हाई स्कूल भी खोला।
== शिब्बनलाल और राजनीति ==
शिब्बनलाल स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ के पहले सांसद बने और इस क्षेत्र के विकास के लिये कार्या किया। उन्होने महाराजगंज को रेलवे लाइन से जोड़ने के लिये 1946 में ही प्रयास शुर कर दिया था लेकिन उनके उस प्रयास का महराजगंज को आज भी नही मिला है। आजादी के बाद उन्होने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और अपनी खुद की पार्टी बनाकर सांसद हुये। शिब्बनलाल कुल मिला जुलाकर महराजगंज से तीन बार सांसद चुने गये। अंतिम बार वह 1976 में जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गये थे। 1946 में शिब्बनलाल संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य चुने गये और संविधान निर्माण में भी अपना योगदान दिये।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Sunday, August 21, 2011

आज के शैक्षिक परिवेश में नैतिक शिक्षा की जरूरत

 पिछले एक दशक से भारत की आम जनता के रहन सहन में आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के साथ एक बेलगाम गति आयी है जिसके रौ में अमीर तो अमीर, गरीब भी तेजी के साथ बहे जा रहे हैं। मुद्दा चाहे ज्यादा पैसा कमाने का हो या फिर समाज में पुरानी परंपराओं के विरोध में खड़े होने या व्यवहार करने का हो, सभी नवोन्मेषी होना चाहते हैं। इक्कीसवीं सदी में मीडिया के झोपड़ी में पहुँचने का सिलसिला टेलीकाम क्रांति के साथ उस पायदान पर जा पहुँचा जहाँ पर भारत की साठ करोड़ जनता के पास मोबाइल है। तेजी से बदलते इस परिवेश में आज का भारतीय बिना सोचे समझे अफीम रुपी विकास के पिनक में मस्त समस्त वर्जनाओं के तोड़ते हुये नई सदी का ग्लोबल नागरिक बनने के लिये तैयार है जिसके आँख में कमाई की चमक और चलने को बाकी लंबा रास्ता है। लेकिन इन सब परिवर्तनों के बीच में क्या हमने कभी सोचा है कि
-आज कल के बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है।
-उनके व्यवहार में किस तरह के सूक्ष्म लेकिन लागातार परिवर्तन आ रहे हैं।
-अपने साथी बच्चों के साथ उनका व्यवहार किस तरीके से बदल रहा है।
-तेजी के साथ बदल रहीं घटनाओं और विकास के पहिये के साथ उनका सामंजस्य कैसा है।
-वे क्यों आजकल अलग-थलग पड़े रहते हैं
इन सबके बारें में अगर हम विचार करें तो हम पायेंगे कि बहुत सारे बदलाव ऐसे भी हो रहे हैं जिनके बारे में हम अनजान है।

क्लासरूम में बच्चों का व्यवहार बड़ी तेजी के साथ बदल रहा है। घर में टीवी और बाहर मोबाइल के साथ समय बिताने वाले बच्चों के बालमन पर बिना किसी रोक-टोक के दिखाये जाने वाले आपत्तिजनक कार्यक्रमों एवं कुकुरमुत्तों की तरह हर गली-नुक्कड़ पर खुल गये मोबाइल गुमतियों में धड़ा-धड़ किये जा रहे डाउनलोड्स मटेरियल्स का कितना गहरा असर पड़ रहा है यह हमे आने वाला वक्त अचानक आने वाले तूफान की तरह बतायेगा। बच्चे इन सब चीजों को प्रयोग करते हुये मानसिक विकास की उस अधकचरी अवस्था पर पहुँच गये हैं जहाँ से उन्हे यह पता है कि हमारा सीनियर भी इस हमाम में नहाने वाला एक नंगा ही है। समाजिक व्यवहार मे बरती जाने वाली संयम की पतली रेखा ही वह दीवार है जो लोगों को एकदूसरे का अतिक्रमण करने से रोकती है और वर्तमान में सर्वसुलभ तकनीक के द्वारा उपलब्ध खतरनाक कंटेन्ट बाढ़ के पानी की तरह उसे रौंदकर ना जाने कहाँ पहुँच गये हैं। यही कारण है कि वे किसी को सम्मान देने में अपने ज्ञान और विकास में अवरोध मान लेते हैं।
क्लासरूम में अनुशासन का वातावरण बनाने के लिये अध्यापकों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं और सजा देना ही एकमात्र उपाय नजर आ रहा है। कुछेक विद्यार्थियों के सेल्फएनलाइटमेंट को छोड़ दे तो बाकी अध्यापकों को सम्मान देना अपनी इज्जत के विरुद्ध मानते हैं। सुबह अभिवादन ना करके वे अपने आपको ऊँचा समझते हैं और संभवतः दोस्तों में स्वयं की बड़ाई भी करते हों।

ऐसे परिवेश में बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से बचाने का कोई रास्ता नजर नही आता सिवाय ऐसे आत्मविश्वासी शिक्षकों के जो खुद नैतिकता के ठोस धरातल पर खड़े रहकर विद्यार्थियों के स्वाभाविक गुणों को विकसित कर उन्हे भविष्य का जिमेदार नागरिक बना सकें।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Monday, August 15, 2011

64वें स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनायें....।

दिल से निकलेगी ना मरकर भी,
वतन की उल्फत,
मेरी मिट्टी से भी,
खशबू-ए-वतन आयेगी...।

आज के दौर में देशभक्ति की ये भावनायें और जज्बा उपभोक्तावाद संस्कृति तथा बाजारवाद के बोझ तले दबकर अंतिम साँसे गिन रही हैं जिसे पोषण की जरूररत है जो ईमानदारी की आँच से पककर ही निकल सकता है।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...