शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

ठंड की शुरूआत

 दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।
जब बादलों ने धरती से अपना पुराना हिसाब चुकाने का अच्छा समय देखकर सूर्य देव से साँठ-गाँठ की और चुपके-चुपके एक समझौता करके धरती की गपशप की साथिन धूप को चौखट पार नही करने दिया तब बेचारी सीधी-सादी धूप बादल और सूर्य के जाल में फँसकर अपनी सहेली से मिल नहीं पायी और गुस्से में सूर्य को गालियाँ देने लगी...लेकिन कुछ हो नही पाया। बादल कुछ ज्यादा ही चालाक निकला और उसने धरती को ताना मारा अब तुम्हारी सारी हेकड़़ी निकल जायेगी जब बच्चों जैसे तुम्हारे पशु-पक्षी-पेड़-पौधे और यहाँ तक कि मनुष्य भी त्राहि-त्राहि करने लगेंगे। तब धरती ने कहा-
धरती-
तुम जैसे पाषाण हृदय दूसरों का दर्द क्या समझेंगे, जिनका अपना कोई घर नही, कोई परिवार नही वे लोग तो दूसरों को तकलीफ देकर अपने लिये खुशी तलाशने की बेवकूफी जीवन पर्यंत करते रहते हैं।
बादल-
मेरा कोई घर नही इसलिये मैं निश्चिंत रहता हूँ...मुझे परिवार का डर नही सताता और न ही मुझे अपने संबंधियों के लिये कोई चिंता करनी पड़ती है...अगर इस स्वतंत्रता और बेफिक्री के आनंद से तुम वंचित हो तो इसमें कोई आश्चर्य नही कि तुम इर्ष्या के दावानल में जलती रहो।
धरती-
जिस घर के न रहने से तुम निश्चिंत रहते हो, जिस परिवार के भरण-पोषण का डर तुम्हे दिन रात सताता रहता है औऱ जिन संबंधियों के न होने से तुम बेफिक्र रहते हो उसके पास होने के सुकून और शांति से तुम कोसों दूर रहे हो ठीक उसी तरह जैसे चंद्रमा से चातक दूर रहता है।
बादल-
चातक अपनी बेवकूफी की वजह से कष्ट भोगता है वरना प्यास तो किसी भी जल से बुझ सकती है।
धरती-
तुम जैसे बेवकूफ जीवन भर यही सोचते रहेंगे कि चातक प्यास बुझाने के लिये स्वाति की बूँद का इंतजार करता है।

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