बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

शिब्बनलाल सक्सेना


शिब्बनलाल सक्सेना, महराजंगज के मसीहा के रूप में प्रसिद्ध। जन्म 13 जुलाई 1906 में आगरा के गोकुलपुरा नामक मुहल्ले में अपने मामा के घर पर। बरेली में आवला तहसील, बल्लिया नामक गाँव के मूल निवासी जिन्होने महराजगंज के विकास के लिये अपना पूरा जीवन लगा दिया। पेशे से डिग्री कालेज के अध्यापक शिब्बन लाल सक्सेना ने 1932 में अपने अध्यापन कार्य से इस्तीफा दे दिया और महात्मा गाँधी के आह्वान पर पूर्ण रुप से नेशनल मूवमेंट में हिस्सा लेकर महराजगंज के किसानों और यहाँ के मजदूरों को इसमें हिस्सा लेकर आंदोलन को मजबूत बनाने के लिये प्रेरित किया। मृत्यु 20 अक्टूबर 1985 को महराजगंज में।
 
== '''प्रारंभिक जीवन''' ==
शिब्बनलाल सक्सेना का जन्म 13 जुलाई 1906 में अपने मामा के घर आगरा के गोकुलपुरा नाम के मुहल्ले में हुआ। इनके पिता का नाम श्री छोटेलाल सक्सेना था जो पोस्टमास्टर थे। इनकी माता का नाम बिट्टीरानी था। दादाजी का नाम नारायणदास था जिनके तीन बेटे- श्यामसुन्दर, छोटेलाल तथा रामप्रीत थे। शिब्बनलाल का परिवार अपने जमाने में बल्लिया का एक समृद्ध परिवार था जिसकी वजह से उसका गाँव में काफी सम्मान था। सबकुछ ठीक-ठाक चलता अगर शिब्बनलाल की माता का देहांत सात साल की उम्र में और उसके डेढ़ साल बाद ही पिता का भी देहांत नही होता। बालक शिब्बनलाल और उनके दो छोटे भाई-बहन होरीलाल और प्रियंवदा को उनके मामा दामोदार लाल सक्सेना ने सहारा दिया और अपने साथ कानपुर ले गये जहाँ पर वह स्वयं वकालत करते थे। शिब्बनलाल की प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा कानपुर में ही हुई। शिब्बनलाल प्रारंभ से ही काफी मेधावी छात्र रहे थे जिसके फलस्वरूप उन्होने अपनी सारी परीक्षायें न केवल प्रथम श्रेणी में बल्कि स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की थीं। कानपुर में शिब्बनलाल को अपने सामर्थ्य से कहीं अधिक की सुविधायें प्रदान करने के बाद दामोदर लाल ने उन्हे उच्च शिक्षा के लिये इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा जहाँ से शिब्बनलाल ने 1927 में अपनी बी. ए. की परीक्षा गणित और दर्शन शास्त्र विषयों के साथ स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की। 1929 में इन्होंने एम. ए. की परीक्षा स्वर्ण पदक प्राप्त करते हुये गणित विषय के साथ उत्तीर्ण की। शिब्बनलाल शुरू से ही स्वराज आंदोलन से काफी प्रभावित थे जिसकी वजह से वह हमेशा ही लोगों की नजरों में चढे रहे। विश्वविद्यालय में एक बार किसी उत्सव में भाग लेने पहुँचे शिब्बनलाल ने शेरवानी पहना था जिसे देखकर प्राचार्य ने उन्हे देशी पहनावा पहनने के लिये टोक दिया। शिब्बनलाल ने उसी समय से अंग्रेजी वेश-भूषा को अलविदा कह दिया और आजीवन धोती और कुर्ता ही पहनते रहे। सन् 1930 में शिब्बनलाल गोरखपुर के सेन्ट एण्ड्रूयूज कालेज में गणित के प्रवक्ता के रुप में नियुक्त हुये और 1931 में उन्होने आगरा विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र विषय से एम. ए. की डिग्री ली। शिब्बनलाल पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को भी पूरा महत्व देते थे और यह मानते थे कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का विकास होता है।  वे पहलवानी करते थे और विश्वविद्यालय में फुटबाल टीम के कप्तान थे।

== पहली गिरफ्तारी ==
कानपुर में रहते हुये ही शिब्बनलाल आजादी की लड़ाई का महत्व समझने लगे थे और स्वराज आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्शाने लगे थे। सन् 1919 में हुये जलियावाला कांड ने जब पूरे भारत को हिला कर रख दिया तब कानपुर में शिब्बनलाल ने भी 13 साल की उम्र में एक विरोध जुलूस का नेतृत्व किया और पकड़े गये। उस समय उन्हे तीन बेतों  की सजा मिली जिसने शिब्बनलाल का विश्वास और भी मजबूत बना दिया और आजादी के लिये लड़ी जा रही लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये प्रेरित किया।

== महात्मा गाँधी से मुलाकात और स्वतंत्रता की लड़ाई के लिये प्रेरणा ==
सन् 1930 में शिब्बनलाल सेंन्ट एण्ड्रूयूज कालेज में गणित के प्रवक्ता नियुक्त हुये और उन्होने यहीं से कारखाना मजदूरों को एकत्र करके कारखाना मालिकों की मनमानी का विरोध करना शुरु कर दिया। उसी दौरान महात्मा गाँधी एक सभा में भाषण देने के लिेय गोरखपुर आये हुये थे। गाँधी जी से शिब्बनलाल की पहली मुलाकात यहीं हुई और गाँधी जी ने उन्हे कांग्रेस में आने का न्यौता दिया जिसे शिब्बनलाल ने स्वीकार कल लिया। इसी घटना के कुछ दिनों के बाद ही शिब्बनलाल कांग्रेस के एक अधिवेशन में भाग लेने के लिये बनारस पहुँचे जहाँ पर गाँधी जी ने एक बड़ी ही हृदयविदारक घटना के बारे में बताया जिसने शिब्बनलाल को पूरी तरह झकझोर दिया और शिब्बनलाल ने महराजगंज जाने का निर्णय लिया। अखबार में निकली एक खबर के अनुसार महात्मा गाँधी ने बताया कि महारजगंज में जमींदारों ने राजबली नाम के एक किसान को जिंदा जला दिया है। गाँधी जी ने उस समय उपस्थित लोगों से महराजगंज की दयनीय हालत के बारे में चर्चा की और किसी को वहाँ जाकर जागृति फैलाने का अनुरोध किया। कोई जाने के लिये तैयार नही हुआ अंत में शिब्बनलाल ने महाराजगंज जाकर वहाँ के लोगों के एक करने का बीडा़ उठाया और गाँधी जी से आशीर्वाद लेकर अपने प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर महराजगंज आ गये।
== शिब्बनलाल और महराजगंज ==
वर्तमान में उत्तर प्रदेश का एक जिला महारजगंज उस समय गोरखपुर जिले का एक तहसील था जहाँ पर किसी भी प्रकार की कोई सुविधायें नहीं थीं। चारों ओऱ जमींदारों का आतंक छाया हुआ था जिनके खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नही थी। ऐसे समय में जब शिब्बनलाल यहाँ आये तो उन्हे अपने साथ काम करने के लिये लोगों को इकट्ठा करने में ही तमाम परेशानियाँ झेलनी पड़ीं। शुरुआती दौर में उन्होने गाँव-गाँव जाकर प्राथमिक स्तर पर लोगों का संगठन खड़ा किया और उन्हे जमींदारो के खिलाफ तैयार किया। उस समय गन्ना यहाँ की प्रमुख फसल थी जिसके किसानों के हक के लिये उन्होने 1931 में ईख संघ की स्थापना की जिसका अस्तित्व आज भी है और जो सबसे पुराने संघों में से एक है। आगे चलकर ईख संघ के आंदोलनों की वजह से ही केंन्द्रीय विधान सभा को गन्ना एक्ट लागू करना पड़ा था। शिब्बनलाल ने अपनी सफल हड़तालों की वजह से गन्ने का तत्कालीन मूल्य दो आना प्रति मन से पाँच आना प्रति मन करा दिया था।
== विभिन्न किसान और मजदूर आंदोलन ==
महराजगंज में उस समय कृषि के अलावा ऐसा कुछ नही था जिसके लिये इसे जाना जा सके। यही वजह थी कि शिब्बनलाल ने यहाँ आते ही यह समझ लिया था कि यहाँ के किसानों में जागृत फैलाये बिना यहाँ का विकास असंभव है जिसके लिये उन्होने पहले किसानों को ही एक करना प्रारंभ किया। उस समय जमींदार ही उन सारी जमीनों के मालिक होते थे जिसे किसान जोतते थे और अन्न उगाते थे। किसान अपनी उपज का अधिकांश हिस्सा जमींदारों को लगान के रुप में दे देते थे। जिससे उनकी हालत में कोई सुधार नही हो रहा था। गन्ना किसानों की बेहतरी के लिये उन्होने गन्ना उत्पादन नियंत्रण बोर्ड की भी स्थापना की। जिस समय पूरा भारत गाँधी जी के अहिंसा मार्ग पर चलते हुये आजादी का सपना देख रहा था उसी समय महराजगंज शिब्बनलाल के नेतृत्व में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की शुरुआत में तत्पर था। 1937 से लेकर 1940 तक शिब्बनलाल ने विभिन्न किसान आंदोलनो से अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया जिसकी वजह से सरकार को जमीनों का एक बार फिर से सर्वे कराना पड़ा और जमीनों का पुनः आबंटन करना पड़ा। यह वही व्यवस्था थी जिसकी वजह से तत्कालीन महराजगंज के एक लाख पच्चीस हजार किसानों को उनकी जमीनों पर मालिकाना हक प्राप्त हुआ और किसानों को जमींदारों के चंगुल से आजादी मिली। अखबारों ने शिब्बनलाल को पूर्वी उत्तर प्रदेश का लेनिन कहकर संबोधित किया था। किसानों की जमीनों पर मालिकाना हक की इस व्यवस्था को '''गण्डेविया बंदोबस्त''' कहते हैं। शिब्बनलाल ने न केवल किसानों के हित के लिये बल्कि कारखाना मजदूरों के बेहतरी के लिये काम किया। उस समय महाराजगंज प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्र था जसकी वजह से इसके विभिन्न उपक्षेत्रों जैसे-घुघली, सिसवां, फरेन्दा इत्यादि में चीनी मिलें अपनी उन्नत अवस्था में थीं लेकिन इनके मजदूरों की हालत बड़ी खराब थी। शिब्बनलाल ने इन मिलों में मजदूर एशोसियेशन बनाये औऱ इनके मालिकों के अत्याचारों पर लगान लगाई। अपने विकास के कार्यों और फौलादी इरादों की वजह से शिब्बनलाल इस क्षेत्र के लिये मसीहा बनकर उभरे जिसकी वजह से यहाँ के जमींदारों ने उनके खिलाफ तरह-तरह के षडयंत्र करना प्रारंभ कर दिया। किसानों के लिये शिब्बनलाल का नारा हुआ करता था कि अपने खेत के मेड़ पर डटे रहों, उसे हरगिजन नही छोड़ो।
== शिब्बनलाल और जमींदारों के षडयंत्र ==
1940 तक आते-आते शिब्बनलाल जमींदारों के लिये आँख की किरकिरी बन चुके थे जिसे निकालना उनके लिेये आवश्यक हो गया था। शिब्बनलाल पर जमींदारों और पुलिस का मिलाजुला पहला सशक्त हमला 1942 में हुआ जिसमें शिब्बनलाल बचकर तो निकल गये लेकिन उनके तीन कार्यकर्ता शहीद हो गये। शहीदों की याद में विशुनपुर गबड़ुआ नामक गाँव में एक शहीद स्मारक भी बना हुआ है। शहीदों में सुखराम पुत्र बेचन कुर्मी तथा झिनकू पुत्र मानिक कुर्मी थे। एक व्यकित की मृत्यु इलाज कै दौरान हुई थी। घायलों में सोमदेव, जनकराज, त्रिलोक, तिलकधारी, रामधारी, शिवदत्त, सरजू, हरिवंश, रामजतन, नगई आदि थे। यहाँ से निकलने के बाद शिब्बनलाल को आखिरकार गोड़धोवा गाँव के बाहर उसी गाँव के जमींदार ने पकड़ लिया क्योंकि वह शिब्बनलाल पर घोषित किये गये पुरस्कार को लेना चाहता था। जब गोड़धोवा गाँव के जमींदार ने शिब्बनलाल को अपने आंगन में पकड़कर रखा था तो उसी समय हरपुर महंथ का काजी वहाँ पर पहुँचा और उसने शिब्बनलाल सक्सेना को माँगा जिसे न देने पर काजी ने जमींदार को गोली मार दी और उसकी वहीं पर मृत्यु हो गई। हरपुर मरंथ ने शिब्बनलाल को गोरखपुर के तत्कालीन कलेक्टर ई. वी. डी. मॉस को सौंप दिया जहाँ से शिब्बनलाल को फाँसी की कालकोठरी में डाल दिया गया जहाँ पर वह छब्बीस महीनों तक रहे और उन पर ना जाने कितने अत्याचार किये गये जिसकी वजह से शिब्बनलाल की ठीक तरह से बोलने की शक्ति जाती रही। मॉस ने शिब्बनलाल को फाँसी पर चढ़ाने का पूरा बंदोबस्त कर रखा था जिससे शिब्बनलाल को बचाया मॉस के एक पत्र ने जिसे उसने नैनीताल में रहने वाली अपनी पत्नी के नाम लिखा था। पत्र में उसने शिब्बनलाल को गालियाँ दी थीं और उनके बारे में सच्चाई लिखी थी। जब मॉस ने वह पत्र अपने चपरासी को पोस्ट करने के लिये दिया तो उस चपरारी ने उसे पोस्ट न करके पत्र शिब्बनलाल को पहुँचा दिया। उसी पत्र की बदौलत शिब्बनलाल जेल से बाहर आ सके। हालाँकि कहा यह भी जाता है कि शिब्बनलाल को जेल से निकलवाने में जवाहर लाल नेहरू की भूमिका रही थी।
== '''महराजगंज में शिक्षा की शुरुआत''' ==
1940 से पहले महराजगंज में कोई स्कूल नही था और चारों तरफ अशिक्षा का बोलबाला था। मुश्किल से ही कोई पढ़ालिखा व्यक्ति मिलता था। शिब्बनलाल ने अशिक्षा की कमी से होने वाली समस्या को समझा और 1940 में यहाँ का पहला स्कूल अपने राजनीतिक जीवन के प्रथम गुरू गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर खोला। जिसका वर्तमान नाम गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक इंटरमीडियेट कालेज है। 13 मार्च 1965 में शिब्बनलाल ने यहाँ का पहला डिग्री कालेज जवाहर लाल नेहरू के नाम पर खोला। इसके बाद 24 मार्च 1972 में उन्होने दूसरा डिग्री कालेज लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर खोला। शिक्षा के क्षेत्र में शिब्बनलाल द्वारा जलायी जाने वाली अलख का अंत यहीं नहीं हुआ और उन्होने अपना अंतिम डिग्री कालेज सिसवां के बीसोखोर में अपने पिता और मामा की याद में खोला जिसका नाम उन्होने छोटेलाल दामोदर प्रसाद स्मारक डिग्री कालेज रखा। वर्तमान में इस कालेज के नाम में शिब्बनलाल भी जुड़ गया है। इसके अतिरिक्त शिब्बनलाल ने शकुंतला बाल विद्या मंदिर के नाम पर एक जूनियर हाई स्कूल भी खोला।
== शिब्बनलाल और राजनीति ==
शिब्बनलाल स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ के पहले सांसद बने और इस क्षेत्र के विकास के लिये कार्या किया। उन्होने महाराजगंज को रेलवे लाइन से जोड़ने के लिये 1946 में ही प्रयास शुर कर दिया था लेकिन उनके उस प्रयास का महराजगंज को आज भी नही मिला है। आजादी के बाद उन्होने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और अपनी खुद की पार्टी बनाकर सांसद हुये। शिब्बनलाल कुल मिला जुलाकर महराजगंज से तीन बार सांसद चुने गये। अंतिम बार वह 1976 में जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गये थे। 1946 में शिब्बनलाल संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य चुने गये और संविधान निर्माण में भी अपना योगदान दिये।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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