गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

अनोखे कण की झलक

पहले लग रहा कि सफलता की गुंजाइश बहुत कम बची है यूरोपीय परमाणु शोध संस्थान (सर्न) का लार्ज हैड्रोन कोलाइडर (एल एच सी) परियोजना विज्ञान के इतिहास की सबसे विशाल, सबसे मँहगी और सबसे महत्वाकाँक्षी परियोजना है औऱ इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसे सूक्ष्म कण का पता लगाना था, जिसका अस्तित्व वैज्ञानिकों के लिये सिर्फ सैद्धांतिक गणित में था। इस कण का नाम हिग्ज बोसान है और अगर यह नही मिलता तो सूक्ष्म कणों की भौतिकी के सारे नियम उलट पलट हो जाते। लेकिन अभी यह खबह आयी है कि एल एच सी के दो मापक यंत्रों ने उस कण का पता लगा लिया है जो संभवतः हिग्ज बोसान है। अभी और प्रयोंगो से ही इस बात की पुष्टि हो पायेगी लेकिन वैज्ञानिक इस सफलता से काफी उत्साहित हैं क्योकि भौतिकशास्त्र की सबसे बड़ी खोंजों में से यह एक होगी। जाहिर है, हिग्ज बोसान का अस्तित्व सिद्ध नही होता तब भी यह भौतिकी इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक होती। बोसान कुछ खास किस्म के एटामिक कणों को कहते हैं जिनका नामकरण महान भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस के नाम पर किया गया है।1960 के दशक में अंगरेज भौतिकशास्त्री पीटर हिग्ज और उनके सहयोगियों ने हिग्ज बोसान की अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा के मुताबिक विभिन्न सूक्ष्म कणों की संहति या भार इस विशिष्ट कण की वजह से होता है। यानि हिग्ज बोसान की खोज के साथ ही परमाणु भौतिकी का वह माडल पूरा हो गया जिसे स्टैंडर्ड माडल कहते हैं और जिसके आधार पर प्रकृति में पाये जाने वाले तमाम सूक्ष्म कणों और बलों के कार्य-कारण की व्याख्या हो सकती है, सिवाय गुरुत्वाकर्षँण के। सैद्धांतिक रूप से तो यह माडल सही था लेकिन इसको पूरी तरह से सही तब कहा जा सकता था जब इसकी प्रायोगिक स्तर पर तस्दीक हो सके।
आधुनिक भौतिक शास्त्र में सबसे मुश्किल काम प्रयोगों से कुछ सिद्ध करना है। क्योंकि हम या तो बहुत विराट शक्तियों और प्रकाश वर्षों के आमने सामने होते हैं या अत्यंत सूक्ष्म कणों और सेकेंड के हजारों-हजारवें हिस्से से हमारा साबक पड़ता है। इस स्तर की नाप-जोख अक्सर असंभव ही साबित होती है। हिग्ज बोसान कोई आसानी से दिखने वाला कण नही है, उसका अस्तित्व इतने कम समय  के लिये होता है कि उसके सामने एक सेकेंड भी कई युगों के समान लगे। फिर वह आसानी से स्वतंत्र रूप में मिलने वाला भी नही।  इसलिये वेज्ञानिकों ने ये तय किया कि सृष्टि के आरंभ  यानि बिग बैंग जैसी परिस्थितियाँ पैदा की जाय। एल एच सी में फ्रांस और स्विट्जरलैण्ड की सीमा पर धरती से 174 मीटर नीचे और 27 किमी लंबी सुरंग है, जिसमें बहुत तेजी से सूक्ष्म कणों को आपस में टकराया जाता है। सैकड़ों बेहद सूक्ष्म संवेदी मापक हर हलचल को रिकार्ड करते रहते हैं औऱ दुनिया में बैठे वैज्ञानिक अपने-अपने कंप्यूटरों पर इस जानकारी का विश्लेषण करते रहते हैं। इसी प्रयोगों के दौरान उन न्यूट्रिनों का भी पता चला था जिनकी गति संभवतः प्रकाश की गति से भी ज्यादा तेज है। अगर हिग्ज बोसान न भी मिलता तब भी इस प्रयोग से इतनी जानकारी मिल ही रही थी जो वैज्ञानिकों को वर्षों तक व्यस्त रखती। प्रयोग 2008 में शुरू हुआ था और धीरे-धीरे हिग्ज बोसान की खोज का दायरा सिमट गया। वैज्ञानिक यह सोचने लगे थे कि कणों को वजनदार बनाने वाला वह कण नही मिला तो फिर क्या संभवनायें हो सकती है। लेकिन दे डिटेक्टरों से संकेत मिलने पर अब फिर उत्साह लौटा है। जल्द ही यह घोषणा हो सकती है कि पीटर हिग्ज ने जो सोचा था, वह सही निकला।
हिंदुस्तान अखबार, संपादकीय- 15-12-2011 से साभार
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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