Sunday, August 21, 2011

आज के शैक्षिक परिवेश में नैतिक शिक्षा की जरूरत

 पिछले एक दशक से भारत की आम जनता के रहन सहन में आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के साथ एक बेलगाम गति आयी है जिसके रौ में अमीर तो अमीर, गरीब भी तेजी के साथ बहे जा रहे हैं। मुद्दा चाहे ज्यादा पैसा कमाने का हो या फिर समाज में पुरानी परंपराओं के विरोध में खड़े होने या व्यवहार करने का हो, सभी नवोन्मेषी होना चाहते हैं। इक्कीसवीं सदी में मीडिया के झोपड़ी में पहुँचने का सिलसिला टेलीकाम क्रांति के साथ उस पायदान पर जा पहुँचा जहाँ पर भारत की साठ करोड़ जनता के पास मोबाइल है। तेजी से बदलते इस परिवेश में आज का भारतीय बिना सोचे समझे अफीम रुपी विकास के पिनक में मस्त समस्त वर्जनाओं के तोड़ते हुये नई सदी का ग्लोबल नागरिक बनने के लिये तैयार है जिसके आँख में कमाई की चमक और चलने को बाकी लंबा रास्ता है। लेकिन इन सब परिवर्तनों के बीच में क्या हमने कभी सोचा है कि
-आज कल के बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है।
-उनके व्यवहार में किस तरह के सूक्ष्म लेकिन लागातार परिवर्तन आ रहे हैं।
-अपने साथी बच्चों के साथ उनका व्यवहार किस तरीके से बदल रहा है।
-तेजी के साथ बदल रहीं घटनाओं और विकास के पहिये के साथ उनका सामंजस्य कैसा है।
-वे क्यों आजकल अलग-थलग पड़े रहते हैं
इन सबके बारें में अगर हम विचार करें तो हम पायेंगे कि बहुत सारे बदलाव ऐसे भी हो रहे हैं जिनके बारे में हम अनजान है।

क्लासरूम में बच्चों का व्यवहार बड़ी तेजी के साथ बदल रहा है। घर में टीवी और बाहर मोबाइल के साथ समय बिताने वाले बच्चों के बालमन पर बिना किसी रोक-टोक के दिखाये जाने वाले आपत्तिजनक कार्यक्रमों एवं कुकुरमुत्तों की तरह हर गली-नुक्कड़ पर खुल गये मोबाइल गुमतियों में धड़ा-धड़ किये जा रहे डाउनलोड्स मटेरियल्स का कितना गहरा असर पड़ रहा है यह हमे आने वाला वक्त अचानक आने वाले तूफान की तरह बतायेगा। बच्चे इन सब चीजों को प्रयोग करते हुये मानसिक विकास की उस अधकचरी अवस्था पर पहुँच गये हैं जहाँ से उन्हे यह पता है कि हमारा सीनियर भी इस हमाम में नहाने वाला एक नंगा ही है। समाजिक व्यवहार मे बरती जाने वाली संयम की पतली रेखा ही वह दीवार है जो लोगों को एकदूसरे का अतिक्रमण करने से रोकती है और वर्तमान में सर्वसुलभ तकनीक के द्वारा उपलब्ध खतरनाक कंटेन्ट बाढ़ के पानी की तरह उसे रौंदकर ना जाने कहाँ पहुँच गये हैं। यही कारण है कि वे किसी को सम्मान देने में अपने ज्ञान और विकास में अवरोध मान लेते हैं।
क्लासरूम में अनुशासन का वातावरण बनाने के लिये अध्यापकों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं और सजा देना ही एकमात्र उपाय नजर आ रहा है। कुछेक विद्यार्थियों के सेल्फएनलाइटमेंट को छोड़ दे तो बाकी अध्यापकों को सम्मान देना अपनी इज्जत के विरुद्ध मानते हैं। सुबह अभिवादन ना करके वे अपने आपको ऊँचा समझते हैं और संभवतः दोस्तों में स्वयं की बड़ाई भी करते हों।

ऐसे परिवेश में बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से बचाने का कोई रास्ता नजर नही आता सिवाय ऐसे आत्मविश्वासी शिक्षकों के जो खुद नैतिकता के ठोस धरातल पर खड़े रहकर विद्यार्थियों के स्वाभाविक गुणों को विकसित कर उन्हे भविष्य का जिमेदार नागरिक बना सकें।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Monday, August 15, 2011

64वें स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनायें....।

दिल से निकलेगी ना मरकर भी,
वतन की उल्फत,
मेरी मिट्टी से भी,
खशबू-ए-वतन आयेगी...।

आज के दौर में देशभक्ति की ये भावनायें और जज्बा उपभोक्तावाद संस्कृति तथा बाजारवाद के बोझ तले दबकर अंतिम साँसे गिन रही हैं जिसे पोषण की जरूररत है जो ईमानदारी की आँच से पककर ही निकल सकता है।

Monday, April 11, 2011

हिंन्दुस्तान और उसकी गलतियाँ-2

अभी सुबह ही मैने हिन्दुस्तान अखबार की खबरों के बारे में लिखा था। आज दोपहर में मैं अपने दोस्त अमित के घर गया था। मैंने उसे आज की खबर के बारे में बताया क्योंकि उसके घर भी हिन्दुस्तान ही आता है। जब मैंने अखबार उठाया तो चकरा गया क्योंकि उसमें वो खबर ही नही थी जिसके बारे में मैने लिखा था। यहाँ तक और सारे मैटर भी अलग थे। सबसे बड़ी बात कि अन्ना हजारे की जिस समिति के बारे में रामदेव ने भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था वह भी उसमें से गायब था। उस अखबार में खबर थी हजारे के पहल से मामला सुलझ गया। मैंने अमित से पूछा कि क्या यह आज का अखबार है, उसने कहा हाँ। मैने सोचा कि क्या दिखाने के लिये अखबार उठाया और क्या दिख गया।


हुआ यूँ था कि अमित के घर जो अखबार था वह गोरखपुर संस्करण था, क्योंकि अमित रोज सुबह गोरखपुर से घर आता है और शाम को फिर गोरखपुर चला जाता है।

मैने सुविधा के लिये दोनों अखबारों को स्कैन करके लगाया है। अभी तक मैं खबरों में गलतियों के बारे में बात कर रहा था पर अभी एक नया मामला है और वह है-दो संस्करणों में खबरों के अंतर का। स्थानीय खबरों में विभिन्नता तो समझ में आती है लेकिन मुख्य पृष्ठ ही अलग-अलग, कुछ अजीब है। महराजगंज संस्करण में निकला है कि अन्ना हजारे द्वारा जन लोकपाल समिति में पिता-पुत्र को लेने पर रामदेव ने आपत्ति की और हजारे पर भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया। वही गोरखपुर संस्करण में खबर है कि अन्ना के पहल से मामला सुलझ गया और रामदेव ने आरोप लगाया कि उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। रामदेव की भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षायें हैं जिसके बदौलत वह भी किसी न किसी तरह खबरों में बने रहना चाहते हैं। फिलहाल हमारी बातचीत का मुद्दा यह नही है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि दो आसपास के जिलों में खबरों के स्तर में इस तरह का बर्ताव नही होना चाहिये। यकीनन महराजगंज का खबरों को प्राप्त करने की महत्ता एवं अधिकार को हिन्दुस्तान का यह रवैया दोयम दर्जे का ही दर्शा रहा है कि एक ही दिन दो तरह की खबरें निकल रही हैं और महराजगंज को एक दिन पीछे की खबरें मिल रही हैं। यही हाल है तो बहुत सारी खबरें महराजगंज संस्करण को मिल ही नही पाती होंगी क्योंकि ऐसा इसलिये होता है कि महराजगंज संस्करण पहले ही छप जाता होगा जिसकी वजह से उसकी खबरों को अपडेट नही किया जाता होगा।

हिन्दुस्तान और उसकी गलतियाँ

हिन्दुस्तान अखबार की पाठक संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है, यह हिन्दुस्तान के आकड़ें कहते हैं। इस पर कोई स्पष्ट रिपोर्ट आज तक अखबार में नहीं निकली। कुछेक बार कुछ विज्ञापनों के जरिये इस बात की जानकारी दी गई थी कि हिन्दुस्तान वर्तमान समय में सबसे तेजी के साथ बढ़ने वाला अखबार है। ऐसा क्यों है, इसकी भी कुछ वजहें हैं। उसके विषय में हम चर्चा बाद में करेंगे। पहले शीर्षक के साथ न्याय तो कर लें।

टीवी चैनल और अखबार वाले किसी के भी बयान अथवा व्यवहार की बखिया उधेड़ देते हैं यदि वह किसी भी प्रकार से असंगत हुआ तो, लेकिन उनसे कुछ गलतियाँ हो जाती हैं तो वे सिर्फ एक खेद का कालम निकाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। और अखबारों के बारे में तो नही जानता पर मैं हिन्दुस्तान का नियमित पाठक हूँ इसलिये इस अखबार के बारें में ज्यादा अच्छी तरह जानता हूँ। अक्सर इस अखबार में खबरों की प्रमाणिकता और यथार्थता में विसंगतियाँ देखने को मिल जाती हैं। ज्यादा दिन नही हुए जब भोजपुरी सिनेमा के पचास वर्ष पूरे होने की उपलब्धियों के बारे में एक आलेख पढ़ने को मिला था जिसमें नदिया के पार के निर्माण वर्ष के बारे में गलत जानकारी उपलब्ध करायी गई थी। हालाँकि उस दिन का अखबार मेरे पास उपलब्ध नही है इसलिये उसपर मैं साक्ष्य के साथ कुछ कहने की कोशिश नही करूंगा लेकिन आज का मुद्दा हट कर है और इसका साक्ष्य भी मेरे पास है।

आज हिंदुस्तान अखबार के मुख पृष्ठ पर एक खबर निकली है जिसमें दिल्ली की एक वृद्ध महिला, जिनकी उम्र 107 साल है, के कूल्हे के आपरेशन की सफलता के बारे में कहा गया है। सफल ऑपरेशन, गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड इत्यादि के बारे में मुझे कुछ नही कहना है। मुझे कहना है खबर के हिस्से पर जिसमें बताया गया है कि विद्यावती, वह महिला जिनका ऑपरेशन हुआ है, उन लोगों में से एक हैं जिन्होने भगत सिंह, सुखबीर और राजगुरु को जेल में देखा है। भगत सिंह, सुखबीर....मुझे नही लगता कि हिन्दुस्तान अखबार के एडीटर को ये बात पता नही होगी कि भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखबीर नही, सुखदेव जेल में बंद थे। लेकिन फिर भी यह खबर छपी है तो इसे क्या समझा जाना चाहिये मुझे ठीक से नही पता। इस तरह कि गलतियों से अखबार वाले अपना मुँह नही छुपा सकते, और ना ही इस सवाल का जवाब देने से मुँह चुरा सकते हैं कि अगर वो पैसा खबर देने का लेते हैं तो क्यों अखबार के तिहाई हिस्से में विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देते हैं। हिंदुस्तान इस मामले में सबसे आगे है, जबसे इसका महराजगंज संस्करण निकलना प्रारंभ हुआ है तबसे यह अखबार, अखबार कम विज्ञापन ज्यादा लगता है। सप्ताह में हर दूसरे दिन इसका अंतिम पृष्ठ पूरा गायब रहता है और उसपर विज्ञापन रहता है। आज के अंतिम पृष्ठ पर कार का विज्ञापन निकला है। मुझे नही लगता कि किसी छोटे से जिले के बारे में तीन चार के आसपास पृष्ठ क्यों रखने जरूरी हैं। विश्व के बारे में इसकी जानकारी न के बराबर होती है और रविवार के दिन इसके अतिक्तांक को देखकर सुबह-सुबह ही गुस्सा आ जाता है। पेज और रंग का तो भगवान ही मालिक है। उसपर से तुक्का यह कि कल से हिंदुस्तान अखबार किसी गार्सिया नाम के अमेरिकन डिजाइनर के डिजाइन किये हुए फार्मेट पर निकलेगा। यकीन मानिये कि इससे पहले में इस गार्सिया नाम के डिजाइनर को जानता ही नही था, हालाँकि यह भी सही है कि मैं दुनिया के बहुत से लोगों को नही जानता लेकिन अखबार वालों को इतना तो जरुर बताना चाहिये कि इसके अखबार को परिवर्तित करने के लिये क्या हो रहा है। पहली बार आज समाचार निकला है कि पिछले कुछ महीनों से अखबार के डिजाइन को बदलने के लिये हिंदुस्तान की सीनियर टीम गार्सिया के साथ मिल कर काम कर रही थी। देखते हैं कि कल का हिंदुस्तान कैसा होता है। हिन्दुस्तान कैसा भी हो अगर उसकी खबरे देने के तरीके में बदलाव नही किया गया तो जिस अंधाधुंध विज्ञापनो के जरिये सबसे तेजी के साथ बढ़ने वाले खबरों को यह खुद ही बड़े चाव के साथ निकाल रहा है, भविष्य में सबसे तेजी के साथ घटने वाली खबरों को पढ़ने के लिये सिर्फ हिंदुस्तान के लोग ही बचेंगे।

पुनश्च-

गार्सिया ने यकीनन काफी मोटी रकम ली होगी अखबार डिजाइन करने के लिये जिसकी कीमत और भी ज्यादा विज्ञापन देकर निकाली जायेगी, पर मैं हिंदुस्तान अखबार का हाकर जो मेरे घर रोज सुबह अखबार डालकर चला जाता है और अक्सर देर से उठने की वजह से मैं उसका मुँह नही देख पाता, से बहुत खुश हूँ और हिंदुस्तान अखबार के संचालकों को उसका शुक्रिया करना चाहिये क्योंकि वही एक वजह है जो मुझे हिंदुस्तान अखबार लेने के लिये प्रेरित करती है। मैं सुबह छह बजे से पहले उठ जाता हूँ और शायद साढ़े पाँच बजे के आस पास और मुझे उस हाकर का नाम नही पता है, अगली बार जब वो मुझसे पेमेंट लेने आयेगा तो उसका नाम जरूर पूछूंगा।

Tuesday, January 4, 2011

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हिंदी सिनेमा की भूमिका

14-15 अगस्त 1947 की अर्द्धरात्रि को ब्रिटिश दासता से मुक्त होकर भारत यद्यपि एक राष्ट्र कहलाने का हकदार तो हो गया किंतु भारत में जब तक भाषाई क्षेत्रीय प्रजातीय इत्यादि विविध आधारों पर उपस्थित विषमताओं को एक सामूहिक चेतना के रुप में एकाकार कर एक सामूहिक उद्देश्य की ओर प्रेरित नही किया जाता तबतक वास्तविक अर्थों में भारत को एक राष्ट्र नही कहा जा सकता। वस्तुतः भारत में मौजूद अनेकानेक विविधताओं के बीच एक सामूहिकता स्थापित करने की प्रक्रिया ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। इसके तहत न केवल सामूहिकता में बाधक तत्वों की पहचान कर उन्हे दूर करने का प्रयास किया जाता है अपितु सामूहिकता उत्पन्न करने वाले तत्वों को प्रोत्साहित भी किया जाता है।


राष्ट्र निर्माण की उपरोक्त प्रक्रिया में विविध कारक अपना-अपना योगदान कर रहे हैं। जिनमें साहित्य, पत्र-पत्रिकायें, जनसभायें, संगोष्ठियाँ इत्यादि तो प्रायः चर्चा में रहती हैं किंतु इस महान कार्य में लगे एक प्रमुख कारक हिंदी सिनेमा की भूमिका को प्रायः नजरअंदाज किया जाता है। प्रस्तुत पत्र सिनेमा की इस महत्वपूर्ण भूमिका को उभार कर सामने लाने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है।


वास्तव में हिंदी सिनेमा आजादी प्राप्ति से पूर्व अर्थात स्वतंत्रता संग्राम के काल से ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में लगा हुआ है। अपने शरुआती दौर में प्रभात न्यू थियेटर्स बांबे टाकीज सरीखी फिल्म कंपनियों की फिल्मो ने सामाजिक चेतना को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1936 में बांबे टाकीज निर्मित फिल्म अछूत कन्या ने भारतीय समाज की एक बड़ी बुराई अस्पृश्यता पर करारी चोट करते हुए लोगों को इसके दुष्प्रभावों की ओर आकृष्ट किया, तो ठीक एक वर्ष बाद अर्थात 1937 में हेमचंद ने अनाथ आश्रम में पहली बार विधवा पुनर्विवाह जैसे संवेदनशील मुद्दे को बड़े पर्दे पर जीवंत कर जनता को इसके प्रति जागरूक कर राष्ट्र के एक बहुत बड़े हिस्से अर्थात महिलाओं के उत्थान में बड़ी भूमिका निभाई। इसी क्रम में 1938 में बनी फिल्म धरती माता ने कृषकों की वास्तविक स्थिति का प्रस्तुतीकरण करते हुये सामूहिक कृषि को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर कृषक उत्थान की दिशा में एक सार्थक पहल की। 1940 में महबूब खान ने अपनी फिल्म औरत के माध्यम से स्त्री और कृषक दोनों की समस्याओं को एक साथ प्रस्तुत करने का अनूठा एवं सफल प्रयास किया। 1940 में रंजीत फिल्म्स के बैनर तले बनी एवं सरदार चंदू लाल शाह द्वारा निर्देशित फिल्म अछूत ने तो जातीय रूढ़ियों पर ऐसा प्रहार किया कि स्वयं महात्मा गाँधी एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल इसकी सराहना करने से खुद को नही रोक पाये। फिल्म के नायक-नायिका द्वारा स्वयं के प्राणों की आहुत देकर भी मंदिर के द्वार आम जनता, विशेषकर तथाकथित अस्पृश्यों के लिये खुलवाने का सफल प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिये भी एक प्रेरणास्रोत बनी। 1942 में नेशनल स्टूडियो के अंतर्गत महबूब खान द्वारा निर्मित और रामंचंद्र द्वारा निर्देशित फिल्म गरीब ने अमीर और गरीब के बीच के संघर्ष को बड़े पर्दे पर उभार कर गरीबों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास किया।


आजादी से पूर्व ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों के तहत कड़े सेंशरशिप कानूनों के लागू होने के कारण 1947 के पूर्व हिंदी सिनेमा अपना वास्तविक विस्तार नही प्राप्त कर सका और यह मुख्यतः सामाजिक बुराइयों के इर्द गिर्द ही सिमटा रहा किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत की सत्ता भारतीयों के हाथ में आयी तो हिंदी सिनेमा को एक खुला आकाश मिला और इसने खुलकर अपनी भूमिका का निर्वहन किया। ऐसे में एम. एस. सैथ्यू ने गरम हवा जैसी फिल्म बनाकर विभाजन की त्रासदी और उससे प्रभावित लोगों की वास्तविक स्थितियों और मजबूरियों को आम जनता के सामने प्रस्तुत किया जिससे सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे के विकास में काफी सहायता मिला। 1951 में फणि मजूमदार ने आंदोलन नामक फिल्म बनाकर 1885 में कांग्रेस के स्थापना से लेकर 1947 तक के स्वतंत्रता के पूरे इतिहास को रुपहले पर्दे पर उतारकर आने वाली पीढ़ियों में राष्ट्रवाद की ज्वाला को सदा प्रज्वलित रखने की दिशा में अमूल्य कार्य किया। किंतु जब 1957 में महबूब खान ने मदर इंडिया बनाई तो इसे इतनी लोकप्रियता मिली कि इसे हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया। इस फिल्म ने भारतीय स्त्री के अबला, परावलंबी जैसी छवियों को तोड़ते हुये उसकी संघर्ष क्षमता को न केवल उजागर कर स्त्री उत्थान की दिशा में एक महान कार्य किया अपितु कृषक समस्या की ओर भी सरकार एवं जनता का ध्यान आकर्षित कर कृषकों की राष्ट्र निर्माण में वास्तविक भूमिका सुनिश्चित करने की भी महत्वपूर्ण पहल की।

Saturday, November 13, 2010

एन डी टीवी इमैजिन को शर्म आनी चाहिये...।

झाँसी के लक्ष्मण अहरिवार की अस्पताल में मृत्यु हो गई। वह अवसाद से पीड़ित था और उसके परिवार वालों ने कुछ दिनों पूर्व ही उसको वहाँ भर्ती कराया था। यह कोई महत्वपूर्ण बात नही है। रोज सैकड़ों लोग अस्पतालों में मरते हैं, कोई किसी को नहीं जानता। पर यह खबर अमर उजाला अखबार में निकली और तो और आज हिंदुस्तान टाइम्स, यानि कि राष्ट्रीय स्तर के अंग्रेजी अखबार में निकली है तो कोई ना कोई विशेष बात तो जरूर होगी।

विशेष यह है कि लक्ष्मण अपने परिवार के साथ एन डी टी वी इमैजिन पर आने वाले प्रोग्राम- राखी सावंत का इंसाफ, में 23 अक्टूबर को शामिल हुआ था अपने घरेलू झगड़े को सुलझाने की कोशिश में। लक्ष्मण की शादी इसी साल फरवरी में हुई थी और कुछ दिनों के बाद ही उसकी पत्नी से अनबन रहने लगी। कुछ दिनों के बाद उसकी पत्नी अपने मायके में रहने लगी और लक्ष्मण परेशान रहने लगा। पत्नी का कहना था कि ससुराल पक्ष के एक आदमी की उसपर बुरी नियति थी। सच क्या था वह तो कोई नही जानता था। लक्ष्मण को इस प्रोग्राम के बारे में जानकारी हुई और पता नही किस सोर्स या फिर जरिये उसे इस प्रोग्राम में हिस्सा लेने का मौका मिल गया। शायद उसे राखी सावंत के बारे में नही पता होगा। प्रोग्राम में राखी सावंत ने उसे कई बार नामर्द कहा। शूटिंग खत्म हुई और इसका टेलीकास्ट भी हुआ। शूटिंग के बाद से ही लक्ष्मण अवसाद में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद उसने खाना-पानी छोड़ दिया, तब उसके परिवार वालों ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ कल उसकी मौत हो गई। यह खबर कल अमर उजाला में निकली थी जिसमें उसके परिवार वालों ने कहा था कि वे राखी सावंत पर केस करेंगे। आज हिंदुस्तान टाइम्स में खबर है कि लक्ष्मण के परिवार वालों ने राखी पर एफ आई आर दर्ज कराया है।


मैं इस घटिया प्रोग्राम के बारे में नही जानता और न मैने कभी इसे देखा है। सबसे ज्यादा हैरत यह जानकर हुई कि यह प्रोग्राम एन डी टीवी इमैजिन पर आता है। यह एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल है और इसकी कुछ तो नैतिकता होनी चाहिये। राखी सावंत के बारे में कुछ कहना अपनी जिह्वा पर कालिख लगाना है, इसलिये मैं उसपर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। मुझे एन डी टी वी इमैजिन के बारे में कहना है। सवाल यह है कि क्या आजकल टी आर पी के लिये न्यूज चैनल किसी भी हद तक जा सकते हैं...जवाब हैं हाँ...। पैसे के खेल में टीवी चैनल आज जानते ही नही कि उनकी क्या जिम्मेदारी है। वे घटिया से घटिया प्रोग्राम बना सकते हैं और हमारी घटिया सरकार और उसकी घटिया नीतियाँ इनको दिखा सकते हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व सबसे घटिया चैनल, दूरदर्शन पर सरकार की ओर से एक विज्ञापन आ रहा था कि भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर ध्यान न दें। अरे बेवकूफों जनता तो बेवकूफ है ही....वो भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर ध्यान देती है या नही वह दूसरी बात है पर उन विज्ञापनों और टी वी चैनलों पर दिखाने का अधिकार कौन देता है। जनता को भ्रमित करने वाले विज्ञापनों को उन्हे देखने के लिये कौन मजबूर करता है...तुम। तुम्हारी जिम्मेदारी कहाँ गई।

सारी जिम्मेदारी सरकार और उसके बाद टीवी चैनल्स की है...वे ऐसे ही प्रोग्राम बनाना चाहते हैं जिसे जनता देखे। मीडिया अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूलकर सिर्फ पैसा बनाने में लगी है। अगर जनता के आक्रोश का भय नही हो तो ये चैनल्स बलात्कार का भी लाइव टेलीकास्ट दिखा सकते हैं...चाहे वो किसी का भी हो...। जरूरत है सरकार अपनी जिम्मेदारी समझे और टीवी चैनल्स पर दिखाये जाने वाले प्रोग्राम्स और विज्ञापनों के लिये एक आचार संहिता बनाये...जिसे सभी चैनल्स अनुसरण करने के लिये बाध्य हों।

एन डी टीवी इमैजिन को शर्म आनी चाहिये...।

झाँसी के लक्ष्मण अहरिवार की अस्पताल में मृत्यु हो गई। वह अवसाद से पीड़ित था और उसके परिवार वालों ने कुछ दिनों पूर्व ही उसको वहाँ भर्ती कराया था। यह कोई महत्वपूर्ण बात नही है। रोज सैकड़ों लोग अस्पतालों में मरते हैं, कोई किसी को नहीं जानता। पर यह खबर अमर उजाला अखबार में निकली और तो और आज हिंदुस्तान टाइम्स, यानि कि राष्ट्रीय स्तर के अंग्रेजी अखबार में निकली है तो कोई ना कोई विशेष बात तो जरूर होगी।

विशेष यह है कि लक्ष्मण अपने परिवार के साथ एन डी टी वी इमैजिन पर आने वाले प्रोग्राम- राखी सावंत का इंसाफ, में 23 अक्टूबर को शामिल हुआ था अपने घरेलू झगड़े को सुलझाने की कोशिश में। लक्ष्मण की शादी इसी साल फरवरी में हुई थी और कुछ दिनों के बाद ही उसकी पत्नी से अनबन रहने लगी। कुछ दिनों के बाद उसकी पत्नी अपने मायके में रहने लगी और लक्ष्मण परेशान रहने लगा। पत्नी का कहना था कि ससुराल पक्ष के एक आदमी की उसपर बुरी नियति थी। सच क्या था वह तो कोई नही जानता था। लक्ष्मण को इस प्रोग्राम के बारे में जानकारी हुई और पता नही किस सोर्स या फिर जरिये उसे इस प्रोग्राम में हिस्सा लेने का मौका मिल गया। शायद उसे राखी सावंत के बारे में नही पता होगा। प्रोग्राम में राखी सावंत ने उसे कई बार नामर्द कहा। शूटिंग खत्म हुई और इसका टेलीकास्ट भी हुआ। शूटिंग के बाद से ही लक्ष्मण अवसाद में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद उसने खाना-पानी छोड़ दिया, तब उसके परिवार वालों ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ कल उसकी मौत हो गई। यह खबर कल अमर उजाला में निकली थी जिसमें उसके परिवार वालों ने कहा था कि वे राखी सावंत पर केस करेंगे। आज हिंदुस्तान टाइम्स में खबर है कि लक्ष्मण के परिवार वालों ने राखी पर एफ आई आर दर्ज कराया है।


मैं इस घटिया प्रोग्राम के बारे में नही जानता और न मैने कभी इसे देखा है। सबसे ज्यादा हैरत यह जानकर हुई कि यह प्रोग्राम एन डी टीवी इमैजिन पर आता है। यह एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल है और इसकी कुछ तो नैतिकता होनी चाहिये। राखी सावंत के बारे में कुछ कहना अपनी जिह्वा पर कालिख लगाना है, इसलिये मैं उसपर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। मुझे एन डी टी वी इमैजिन के बारे में कहना है। सवाल यह है कि क्या आजकल टी आर पी के लिये न्यूज चैनल किसी भी हद तक जा सकते हैं...जवाब हैं हाँ...। पैसे के खेल में टीवी चैनल आज जानते ही नही कि उनकी क्या जिम्मेदारी है। वे घटिया से घटिया प्रोग्राम बना सकते हैं और हमारी घटिया सरकार और उसकी घटिया नीतियाँ इनको दिखा सकते हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व सबसे घटिया चैनल, दूरदर्शन पर सरकार की ओर से एक विज्ञापन आ रहा था कि भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर ध्यान न दें। अरे बेवकूफों जनता तो बेवकूफ है ही....वो भ्रमित करने वाले विज्ञापनों पर ध्यान देती है या नही वह दूसरी बात है पर उन विज्ञापनों और टी वी चैनलों पर दिखाने का अधिकार कौन देता है। जनता को भ्रमित करने वाले विज्ञापनों को उन्हे देखने के लिये कौन मजबूर करता है...तुम। तुम्हारी जिम्मेदारी कहाँ गई।

सारी जिम्मेदारी सरकार और उसके बाद टीवी चैनल्स की है...वे ऐसे ही प्रोग्राम बनाना चाहते हैं जिसे जनता देखे। मीडिया अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूलकर सिर्फ पैसा बनाने में लगी है। अगर जनता के आक्रोश का भय नही हो तो ये चैनल्स बलात्कार का भी लाइव टेलीकास्ट दिखा सकते हैं...चाहे वो किसी का भी हो...। जरूरत है सरकार अपनी जिम्मेदारी समझे और टीवी चैनल्स पर दिखाये जाने वाले प्रोग्राम्स और विज्ञापनों के लिये एक आचार संहिता बनाये...जिसे सभी चैनल्स अनुसरण करने के लिये बाध्य हों।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...