सोमवार, 11 अप्रैल 2011

हिन्दुस्तान और उसकी गलतियाँ

हिन्दुस्तान अखबार की पाठक संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है, यह हिन्दुस्तान के आकड़ें कहते हैं। इस पर कोई स्पष्ट रिपोर्ट आज तक अखबार में नहीं निकली। कुछेक बार कुछ विज्ञापनों के जरिये इस बात की जानकारी दी गई थी कि हिन्दुस्तान वर्तमान समय में सबसे तेजी के साथ बढ़ने वाला अखबार है। ऐसा क्यों है, इसकी भी कुछ वजहें हैं। उसके विषय में हम चर्चा बाद में करेंगे। पहले शीर्षक के साथ न्याय तो कर लें।

टीवी चैनल और अखबार वाले किसी के भी बयान अथवा व्यवहार की बखिया उधेड़ देते हैं यदि वह किसी भी प्रकार से असंगत हुआ तो, लेकिन उनसे कुछ गलतियाँ हो जाती हैं तो वे सिर्फ एक खेद का कालम निकाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। और अखबारों के बारे में तो नही जानता पर मैं हिन्दुस्तान का नियमित पाठक हूँ इसलिये इस अखबार के बारें में ज्यादा अच्छी तरह जानता हूँ। अक्सर इस अखबार में खबरों की प्रमाणिकता और यथार्थता में विसंगतियाँ देखने को मिल जाती हैं। ज्यादा दिन नही हुए जब भोजपुरी सिनेमा के पचास वर्ष पूरे होने की उपलब्धियों के बारे में एक आलेख पढ़ने को मिला था जिसमें नदिया के पार के निर्माण वर्ष के बारे में गलत जानकारी उपलब्ध करायी गई थी। हालाँकि उस दिन का अखबार मेरे पास उपलब्ध नही है इसलिये उसपर मैं साक्ष्य के साथ कुछ कहने की कोशिश नही करूंगा लेकिन आज का मुद्दा हट कर है और इसका साक्ष्य भी मेरे पास है।

आज हिंदुस्तान अखबार के मुख पृष्ठ पर एक खबर निकली है जिसमें दिल्ली की एक वृद्ध महिला, जिनकी उम्र 107 साल है, के कूल्हे के आपरेशन की सफलता के बारे में कहा गया है। सफल ऑपरेशन, गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड इत्यादि के बारे में मुझे कुछ नही कहना है। मुझे कहना है खबर के हिस्से पर जिसमें बताया गया है कि विद्यावती, वह महिला जिनका ऑपरेशन हुआ है, उन लोगों में से एक हैं जिन्होने भगत सिंह, सुखबीर और राजगुरु को जेल में देखा है। भगत सिंह, सुखबीर....मुझे नही लगता कि हिन्दुस्तान अखबार के एडीटर को ये बात पता नही होगी कि भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखबीर नही, सुखदेव जेल में बंद थे। लेकिन फिर भी यह खबर छपी है तो इसे क्या समझा जाना चाहिये मुझे ठीक से नही पता। इस तरह कि गलतियों से अखबार वाले अपना मुँह नही छुपा सकते, और ना ही इस सवाल का जवाब देने से मुँह चुरा सकते हैं कि अगर वो पैसा खबर देने का लेते हैं तो क्यों अखबार के तिहाई हिस्से में विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देते हैं। हिंदुस्तान इस मामले में सबसे आगे है, जबसे इसका महराजगंज संस्करण निकलना प्रारंभ हुआ है तबसे यह अखबार, अखबार कम विज्ञापन ज्यादा लगता है। सप्ताह में हर दूसरे दिन इसका अंतिम पृष्ठ पूरा गायब रहता है और उसपर विज्ञापन रहता है। आज के अंतिम पृष्ठ पर कार का विज्ञापन निकला है। मुझे नही लगता कि किसी छोटे से जिले के बारे में तीन चार के आसपास पृष्ठ क्यों रखने जरूरी हैं। विश्व के बारे में इसकी जानकारी न के बराबर होती है और रविवार के दिन इसके अतिक्तांक को देखकर सुबह-सुबह ही गुस्सा आ जाता है। पेज और रंग का तो भगवान ही मालिक है। उसपर से तुक्का यह कि कल से हिंदुस्तान अखबार किसी गार्सिया नाम के अमेरिकन डिजाइनर के डिजाइन किये हुए फार्मेट पर निकलेगा। यकीन मानिये कि इससे पहले में इस गार्सिया नाम के डिजाइनर को जानता ही नही था, हालाँकि यह भी सही है कि मैं दुनिया के बहुत से लोगों को नही जानता लेकिन अखबार वालों को इतना तो जरुर बताना चाहिये कि इसके अखबार को परिवर्तित करने के लिये क्या हो रहा है। पहली बार आज समाचार निकला है कि पिछले कुछ महीनों से अखबार के डिजाइन को बदलने के लिये हिंदुस्तान की सीनियर टीम गार्सिया के साथ मिल कर काम कर रही थी। देखते हैं कि कल का हिंदुस्तान कैसा होता है। हिन्दुस्तान कैसा भी हो अगर उसकी खबरे देने के तरीके में बदलाव नही किया गया तो जिस अंधाधुंध विज्ञापनो के जरिये सबसे तेजी के साथ बढ़ने वाले खबरों को यह खुद ही बड़े चाव के साथ निकाल रहा है, भविष्य में सबसे तेजी के साथ घटने वाली खबरों को पढ़ने के लिये सिर्फ हिंदुस्तान के लोग ही बचेंगे।

पुनश्च-

गार्सिया ने यकीनन काफी मोटी रकम ली होगी अखबार डिजाइन करने के लिये जिसकी कीमत और भी ज्यादा विज्ञापन देकर निकाली जायेगी, पर मैं हिंदुस्तान अखबार का हाकर जो मेरे घर रोज सुबह अखबार डालकर चला जाता है और अक्सर देर से उठने की वजह से मैं उसका मुँह नही देख पाता, से बहुत खुश हूँ और हिंदुस्तान अखबार के संचालकों को उसका शुक्रिया करना चाहिये क्योंकि वही एक वजह है जो मुझे हिंदुस्तान अखबार लेने के लिये प्रेरित करती है। मैं सुबह छह बजे से पहले उठ जाता हूँ और शायद साढ़े पाँच बजे के आस पास और मुझे उस हाकर का नाम नही पता है, अगली बार जब वो मुझसे पेमेंट लेने आयेगा तो उसका नाम जरूर पूछूंगा।

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