मंगलवार, 4 जनवरी 2011

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हिंदी सिनेमा की भूमिका

14-15 अगस्त 1947 की अर्द्धरात्रि को ब्रिटिश दासता से मुक्त होकर भारत यद्यपि एक राष्ट्र कहलाने का हकदार तो हो गया किंतु भारत में जब तक भाषाई क्षेत्रीय प्रजातीय इत्यादि विविध आधारों पर उपस्थित विषमताओं को एक सामूहिक चेतना के रुप में एकाकार कर एक सामूहिक उद्देश्य की ओर प्रेरित नही किया जाता तबतक वास्तविक अर्थों में भारत को एक राष्ट्र नही कहा जा सकता। वस्तुतः भारत में मौजूद अनेकानेक विविधताओं के बीच एक सामूहिकता स्थापित करने की प्रक्रिया ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। इसके तहत न केवल सामूहिकता में बाधक तत्वों की पहचान कर उन्हे दूर करने का प्रयास किया जाता है अपितु सामूहिकता उत्पन्न करने वाले तत्वों को प्रोत्साहित भी किया जाता है।


राष्ट्र निर्माण की उपरोक्त प्रक्रिया में विविध कारक अपना-अपना योगदान कर रहे हैं। जिनमें साहित्य, पत्र-पत्रिकायें, जनसभायें, संगोष्ठियाँ इत्यादि तो प्रायः चर्चा में रहती हैं किंतु इस महान कार्य में लगे एक प्रमुख कारक हिंदी सिनेमा की भूमिका को प्रायः नजरअंदाज किया जाता है। प्रस्तुत पत्र सिनेमा की इस महत्वपूर्ण भूमिका को उभार कर सामने लाने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है।


वास्तव में हिंदी सिनेमा आजादी प्राप्ति से पूर्व अर्थात स्वतंत्रता संग्राम के काल से ही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में लगा हुआ है। अपने शरुआती दौर में प्रभात न्यू थियेटर्स बांबे टाकीज सरीखी फिल्म कंपनियों की फिल्मो ने सामाजिक चेतना को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1936 में बांबे टाकीज निर्मित फिल्म अछूत कन्या ने भारतीय समाज की एक बड़ी बुराई अस्पृश्यता पर करारी चोट करते हुए लोगों को इसके दुष्प्रभावों की ओर आकृष्ट किया, तो ठीक एक वर्ष बाद अर्थात 1937 में हेमचंद ने अनाथ आश्रम में पहली बार विधवा पुनर्विवाह जैसे संवेदनशील मुद्दे को बड़े पर्दे पर जीवंत कर जनता को इसके प्रति जागरूक कर राष्ट्र के एक बहुत बड़े हिस्से अर्थात महिलाओं के उत्थान में बड़ी भूमिका निभाई। इसी क्रम में 1938 में बनी फिल्म धरती माता ने कृषकों की वास्तविक स्थिति का प्रस्तुतीकरण करते हुये सामूहिक कृषि को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर कृषक उत्थान की दिशा में एक सार्थक पहल की। 1940 में महबूब खान ने अपनी फिल्म औरत के माध्यम से स्त्री और कृषक दोनों की समस्याओं को एक साथ प्रस्तुत करने का अनूठा एवं सफल प्रयास किया। 1940 में रंजीत फिल्म्स के बैनर तले बनी एवं सरदार चंदू लाल शाह द्वारा निर्देशित फिल्म अछूत ने तो जातीय रूढ़ियों पर ऐसा प्रहार किया कि स्वयं महात्मा गाँधी एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल इसकी सराहना करने से खुद को नही रोक पाये। फिल्म के नायक-नायिका द्वारा स्वयं के प्राणों की आहुत देकर भी मंदिर के द्वार आम जनता, विशेषकर तथाकथित अस्पृश्यों के लिये खुलवाने का सफल प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिये भी एक प्रेरणास्रोत बनी। 1942 में नेशनल स्टूडियो के अंतर्गत महबूब खान द्वारा निर्मित और रामंचंद्र द्वारा निर्देशित फिल्म गरीब ने अमीर और गरीब के बीच के संघर्ष को बड़े पर्दे पर उभार कर गरीबों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास किया।


आजादी से पूर्व ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों के तहत कड़े सेंशरशिप कानूनों के लागू होने के कारण 1947 के पूर्व हिंदी सिनेमा अपना वास्तविक विस्तार नही प्राप्त कर सका और यह मुख्यतः सामाजिक बुराइयों के इर्द गिर्द ही सिमटा रहा किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत की सत्ता भारतीयों के हाथ में आयी तो हिंदी सिनेमा को एक खुला आकाश मिला और इसने खुलकर अपनी भूमिका का निर्वहन किया। ऐसे में एम. एस. सैथ्यू ने गरम हवा जैसी फिल्म बनाकर विभाजन की त्रासदी और उससे प्रभावित लोगों की वास्तविक स्थितियों और मजबूरियों को आम जनता के सामने प्रस्तुत किया जिससे सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे के विकास में काफी सहायता मिला। 1951 में फणि मजूमदार ने आंदोलन नामक फिल्म बनाकर 1885 में कांग्रेस के स्थापना से लेकर 1947 तक के स्वतंत्रता के पूरे इतिहास को रुपहले पर्दे पर उतारकर आने वाली पीढ़ियों में राष्ट्रवाद की ज्वाला को सदा प्रज्वलित रखने की दिशा में अमूल्य कार्य किया। किंतु जब 1957 में महबूब खान ने मदर इंडिया बनाई तो इसे इतनी लोकप्रियता मिली कि इसे हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया। इस फिल्म ने भारतीय स्त्री के अबला, परावलंबी जैसी छवियों को तोड़ते हुये उसकी संघर्ष क्षमता को न केवल उजागर कर स्त्री उत्थान की दिशा में एक महान कार्य किया अपितु कृषक समस्या की ओर भी सरकार एवं जनता का ध्यान आकर्षित कर कृषकों की राष्ट्र निर्माण में वास्तविक भूमिका सुनिश्चित करने की भी महत्वपूर्ण पहल की।

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