Sunday, September 16, 2012

राज ठाकरे और मुंबई में क्षेत्रवाद का जहर



(यह लघु लेख मैने दिल्ली में रहते हुये 19 जनवरी 2008 में लिखा था)
भारत में संविधान का माखौल उड़ाने के कई उदाहरण मिल सकते हैं। वर्तमान में उत्तर भारतीयों के प्रति मुंबई में अपनाई गई जातीय एवं क्षेत्रीय हिंसा इसमें अगली कड़ी साबित होती है।
संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को भारत में कहीं भी निवास करने, व्यवसाय करने, संपत्ति खरीदने अथवा धर्म संस्कृति या परंपराओं का निर्वाह करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, और इन क्रिया कलापों में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न करना, संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है। कहाँ एक व्यक्ति विशेष के अधिकारों का हनन ही एक गंभीर एवं संवेदनशील मसला है, और यहाँ तो हजारों उत्तरभारतीयों के मौलिक अधिकारों के हनन का प्रश्न है। पिछले दिनों समाचार पत्रों में खबर आयी थी कि आनन-फानन में मुंबई छोड़ने के क्रम में उत्तर भारतीयों ने खोलियाँ बावन हजार एवं साइकिलें 50 रुपयें में बेचीं।
यह प्रथम घटना नही है जब उत्तर भारतीयों के विरुद्ध सुनियोजित तरीके शारीरिक एवं मानसिक आक्रमण हुआ हो, यह भी नही है कि  मुंबई ही इसका अखाड़ा रहा हो। इसके अतिरिक्त पूर्वोत्तर, जम्मू कश्मीर, पंजाब इत्यादि में भी इसकी धमक सुनाई दे जाती है। यदि समग्र रूप में न देखें तो छिटपुट रूप में भारत के प्रत्येक कोने में उत्तर भारतीयों के प्रति दोयम दर्जे का नजरिया रखा जाता है । यह कुछ ऐसा वैसा ही प्रतीत होता है जैसा कि औपनिवेशिक भारत में गोरों व कालों के प्रति होता था। दक्षिण भारत इस मामले में अधिक उर्जावान है जहाँ उत्तर भारतीयों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। विनोद का बात यह है कि राजधानी दिल्ली इस मामले में भारत के अन्य क्षेत्रों से प्रतिद्वंदिता करती है, जिसका अस्तित्व ही उत्तर प्रदेश पर टिका है।
यह मुद्दा मात्र मुंबई का नही वरन पूरे भारत का है। क्या उत्तर भारतीय सर्वत्र मात्र इसी वजह से तिरस्कृत किये जाते हैं कि ने हर जगह निम्न तबके से सम्बन्ध रखते हैं। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि यदि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग, मुंबई , पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं अन्य राज्यों एवं शहरों से वापस आ जायें तो वहाँ की अर्थव्यवस्था चरमरा जायेगी। स्मरणीय है कि यदि उत्तर भारतीयों का कब्जा व्यापार, उद्योग इत्यादि पर रहता तो उनकी स्थिति इतनी ज्यादा खराब नहीं होती।
हम अभी भी औपनिवेशिक भारत में रह रहे हैं।
19-01-2008


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Thursday, September 6, 2012

टीचर्स डे और सेन्ट जोसेफ्स स्कूल में सेलिब्रेशन


कल टीचर्स डे था...और वाकई कमाल का था। सेन्ट जोसेफ्स स्कूल में ऐसा लग रहा था कि सारे विद्यार्थी मानों प्रतिस्पर्धा कर रहे हों...अध्यापकों को केक खिलाने का, गिफ्ट देने का, मिठाई खिलाने का...पूरा माहौल विद्यार्थीमय हो गया था। नन्हे-नन्हे हाथों में लिये हुये पेन, रचनात्मकता का परिचय देते हुये स्वयं द्वारा बनाये हुये ग्रीटिंग कार्ड...पूरा दृश्य कैमरे में कैद करने लायक था।
टीचर्स डे सलिब्रेट करने की कवायद शुरु की गई कक्षा 8 के विद्यार्थियों के द्वारा,  जब पूरे विद्यालय में ये बात फैल गई कि वे पाँच मंजिला केक मँगाने जा रहे हैं। खबर मिलने की देरी थी, सभी ने टीचर्स डे मनाने की योजना बना ली...केक पाँच मंजिला ना हुआ तो क्या हुआ...खिलाने के लिये एक टुकड़ा ही काफी है। आनन-फानन में सारे क्लासेज में पैसा इकट्ठा हुआ और तैयारी शुरु हो गई। कल सुबह से ही सारे क्लासेज के बच्चों ने अपने-अपने क्लासेज को भरसक सुंदर सजाने का कार्य किया लेकिन इन सबके बीच कक्षा 8 के विद्यार्थियों ने अपनी लगन और मेहनत की बदौलत बाजी मार ली। उन्होने अपनी कक्षा को वाकई बहुत सुंदर तरीके से सजाया लेकिन इसके साथ ही साथ सेलिब्रेट करते वक्त क्लास को सुंदर सजाने और केक ऊँचा मँगाने की अहंभावना से वे बच ना सके और उन्होने अपनी खुशी को अपने गले के माध्यम से व्यक्त करना उचित समझा, लिहाजा शोर भी बहुत हुआ।
कक्षा तीन के विद्यार्थियों ने शालीन तरीके से केक काटकर अपने कक्षाध्यापक को खिलाया और शांत तरीके से सेलिब्रेट किया हालाँकि बहुत सारे बच्चे अन्य अध्यापकों को गिफ्ट देने और केक खिलाने के प्रयास में पूरे विद्यालय में दौड़ते देखे गेये। कक्षा चार के विद्यार्थियों के कक्षा को भरसक तरीके से सुंदर सजाने का प्रयास किया और कक्षाध्यापक को केक खिलाकर सुंदर तरीके से सेलिब्रेट किया। लाउड तरीके से टीचर्स डे सेलिब्रेट करने के मामले में कक्षा पाँच के विद्यार्थी भी पीछे नही रहे, अपने कक्षाध्यापक के हाथों केक कटवाकर खिलाने के दौरान कक्षा पाँच में प्रसन्नता के साथ-साथ अव्यवस्था भी देखने को मिली। कक्षा 6 और 7 के विद्यार्थियों ने कमोबेश शांत तरीके से मनाया और कक्षाध्यापकों के हाथों केक कटवाया। कक्षा 9 के विद्यार्थियों ने सम्मिलित रूप से सारे अध्यापकों की मौजदूगी मे अपने कक्षाध्यापक मिस्टर मनोज गुप्ता से केक कटवाया और उन्ही के हाथों से सभी अध्यापकों को खिलवाया भी।
टीचर्स डे सेलिब्रेशन के मामले में सबसे सुंदर और यादगार तरीका अपनाया कक्षा 10 के विद्यार्थियों ने। परंपरागत तरीके से उन्होने डा. राधाकृष्णन की प्रतिमा पर माल्यार्पण कराकर और उसके बाद अगरबत्ती जलवाकर सारे अध्यापकों को पुष्पार्पण करने के लिये आमंत्रित किया। अध्यापकों द्वारा प्रेरणा के दो शब्द कहे जाने के बाद उन्होने जलपान कराया और उसके बाद एक मजेदार कार्यक्रम कराया जिसमें मेज पर पड़ी हुई पर्चियों में से, अध्यापकों द्वारा एक-एक करके उठवाया और पर्ची पर लिखे हुये कार्यों के अनुसार हर अध्यापको से वह कराया भी। शुरुआत हुई मनोज सर से जिनके हिस्से में मिमिक्री करने का दुरूह कार्य आ गया जिसे करना उनके जैसे शुष्क और गंभीर अध्यापक के लिये एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा था। परिणामस्वरुप उन्होने अपने जीवन से संबंधित अनुभव सुनाना ही बेहतर समझा और विद्यार्थियों का मनोरंजन किया। उसके बाद बारी आयी पवन सर की जिन्होने पर्ची के अनुसार एक सुंदर भजन सुनाया। मनमीत सर के हिस्से में मजेदार काम, डांस करना आया जिसे उन्होने स्लो मोशन डांस करके बखूबी पूरा किया। कृष्णा सर ने ऋषभ की एक्टिंग करके खूब वाहवाही लूटी और मैने पर्ची के अनुसार अपने प्रिय अध्यापक के बारे में संस्मरण सुनाया। इसके बाद बारी आयी जार्ज सर की जिन्होने हार्स राइडिंग का सुंदर नमूना प्रस्तुत किया जिसे देखकर लगा कि वाकई केरल के अध्यापकगण अध्यापन में शारीरिक क्रियाकलापों द्वारा कक्षा के बोझिल माहौल को हल्का करके,  अध्ययन में रुचि पैदा करने की विशेष योग्यता रखते हैं। दीपक सर के हिस्से में जोक सुनाने का अत्यंत आसान कार्य आया जिसे वह पूरा नही कर सके, पर उन्होने भविष्य में चुटकुला सुनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने का वादा जरूर किया। इसके बाद विद्यार्थियों के द्वारा अध्यापकों को उपहार भेंट किये गये और इसके बाद कार्यक्रम का समापन हुआ।
निसंदेह यह एक सराहनीय प्रयास  था जिससे विद्यार्थियों ने बहुत कुछ सीखा होगा, क्योंकि इस कार्यक्रम के आयोजन में विद्यार्थियों ने किसी भी अध्यापक का कोई सहयोग नहीं लिया था। यह उनका दिन था और उन्होने इसको यादगार बना दिया। 


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Tuesday, August 28, 2012

आजम खाँ और नेताओं की भाषा


          हमारे काबिल नेताओं की भाषा और उनका टेंपरामेंट कितना कमाल का है इसकी बानगी मिली लखनऊ में विधानभवन स्थित तिलक हाल में जहाँ पर नगर विकास मंत्री आजम खान ने दो दिवसीय समीक्षा बैठकें रखी थीं। बैठक के तय समय पर कई सारे अफसर नदारद थे जिनके बारे में एक वरिष्ठ पी.सी.एस स्वरूप मिश्र द्वारा पूछने पर माननीय मंत्री जी इतने आगबबूला हो गये कि उन्होने पहले तो पी.सी.एस. आफिसर को चुप बैठिये कहा। बाद में यह, बकवास करते हो...तक पहुँचा और अंत हुआ...बदतमीज कहीं का...के साथ।
            सवाल यह उठता है मंत्री महोदय लोग अपने आपको समझते क्या हैं, क्या वे आसमान से उतरे फरिश्ते हैं जिनसे कोई सवाल नहीं पूछा जा सकता। अगर एक वरिष्ठ पी.सी.एस. के साथ इस तरह का बर्ताव किया जाता है तो एक आम आदमी की इन महानुभावों के सामने औकात ही क्या। जनता को तो ये कीड़े-मकोड़े से ज्यादा की तवज्जो नहीं देते होंगे। 



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Tuesday, August 14, 2012

ओलंपिक और भारत में दिये जाने वाले पुरस्कार


आग लगने पर कुआँ खोदने वाली कहावत हमारे देश में बहुत प्रचलित है और 2012 के ओलंपकि खेलों में सटीक बैठती है। जब हमारा खिलाड़ी पदक जीतने से वंचित हो जाता है तो हम हो हल्ला मचाने लगते हैं और एक सुर में चीन से अपनी तुलना करने लगते हैं। लेकिन दूसरी ओर जब कोई खिलाड़ी पदक, जाहे वो कांस्य हो अथवा रजत हो, जीतता है तो देश में उसे पुरस्कार देने की होड़ मच जाती है। खिलाड़ी को एक करोड़, दो करोड़ देना तो आम बात हो जाती है।
सवाल यह है कि इस तरह रुपयों की बारिश करके असल में हम क्या साबित करना चाहते हैं। यह कि, पदक जीतो और इनाम पाओ अथवा यह कि, एक ओलंपिक पदक जीवन भर की कमाई से बेहतर है। यह सही है कि इस तरह के पुरस्कार खिलाड़ियों में पदक जीतने के जज्बें को बढ़ाने  के उद्देश्य से ही दिये जाते हैं लेकिन कहीं ना कहीं इसमें अरबपति कंपनियों का अपना स्वार्थ भी निहित है। बैठे-बिठाये ही उन्हे मीडिया की बेहिसाब कवरेज मिल जाती है। चार साल में एक बार कुछ खिलाड़ियों को रुपये देकर देश में खेल का कायाकल्प नहीं  हो सकता है। अगर ये कंपनिया वाकई देश में खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाना चाहती हैं तो उन्हे वही रुपये जो वे एक खिलाड़ी को बतौर पुरस्कार देते हैं, को किसी स्पोर्ट स्टेडियम, प्रशिक्षण केन्द्र इत्यादि  खोलने और सुचारु रूप से चलाने में खर्च करना चाहिये। अगर हर शहर, गाँव  में कुछ ऐसे स्पोर्ट कांपलेक्स खुल जायें तो निश्चित ही देश में खेल का कायाकल्प हो सकता है और उसके लिये न तो चीन जैसी तानाशाही प्रवृत्ति  की आवश्यकता है और ना ही पैसों का लालच। भारत के खिलाड़ियों में देश के प्रति जज्बा ही काफी है। 


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Monday, August 13, 2012

सुशील कुमार


वर्तमान भारतीय कुश्ती के सरताज सुशील कुमार का जन्म 26 मई 1983 को बपरोला, दिल्ली में हुआ। सुशील के पिता दीवान सिंह डी टी सी में बस ड्राइवर थे और माता कमला देवी एक सामान्य गृहिणी थीं। सुशील को कुश्ती की प्रेरणा अपने चचेरे भाई संदीप और चाचा जी से मिली जो खुद एक पहलवान थे। संदीप ने सुशील के लिये अपने कुश्ती करियर को तिलांजलि दे दी क्योंकि एक मध्यमवर्गीय परिवार उस समय एक ही बच्चे को कुश्ती के लिये आवश्यक संसाधन मुहैया करा सकता था।

कुमार ने अपने कुश्ती का प्रशिक्षण छत्रसाल अखाड़ा से चौदह साल की उम्र में पहलवान यशवीर और रामफल के निर्देशन में शुरू किया। बाद में उन्होने अर्जुन पुरस्कार प्राप्त पहलवान सतपाल और रेलवे के कोच ज्ञान सिंह से भी प्रशिक्षण लिया। शुरुआती दौर में सुशील को काफी परेशानियों से दो चार होना पड़ा, जिसमें बिछाने के लिये बिस्तर और सोने के लिये अन्य प्रशिक्षुओं के साथ कमरा बाँटना भी था।


सुशील का करियर-
पहली सफलता सुशील को तब मिली जब उन्होने वर्ल्ड कैडेट गेम 1998 में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद उन्होने एशियाई जूनियर कुश्ती प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक सन् में जीता।  जूनियर प्रतियोगिताओं में अपनी विजय पताका फहराने के बाद सुशील ने एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में कांस्य पदक और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता। 2003 में विश्व कुश्ती चैंपियन के मुकाबले में सुशील कुमार चौथे स्थान पर रहे थे। 2004 के एंथेंस ओलंपिक में वह चौदहवें स्थान पर रहे थे।  विजय के उनके सुनहरे सफर की शुरुआत 2005 के राष्ट्रमंडल खेलों से हुई जब उन्होने स्वर्ण पदक जीता। 2007 के राष्ट्रमंडल खेलों में भी उन्होने स्वर्ण पदक जीता।  2007 में हुए विश्व चैंपियनशिप में वो सातवें स्थान पर रहे और उसके बाद 2008 के बीजिंग ओलंपिक में उन्होने कांस्य पदक जीता।  ओलंपिक में अपने पदकों की संख्या बढ़ाते हुये 2012 के लंदन ओलंपिक में उन्होने रजत पदक जीता। हम आशा करते हैं कि सुशील कुमार 2016 में होने वाले ओलंपिक जिनका आयोजन रियो डि जेनेरियो में होने वाला है, वह स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम अवश्य ही रोशन करेंगे।
सुशील कुमार के लिये हर भारतवासी की तरफ से दिल से शुभकामनायें।


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Thursday, August 9, 2012

सनी लियोन और हमारा समाज


यह सही है कि समाज में हमेशा से ऐसी चीजें मौजूद रही हैं जिनके बारे में हमने दोतरफा राय बना रखी है, एक पर्दे के पीछे और दूसरी पर्दे के सामने । कुछ दशकों के पूर्व तक यह प्रश्न हमारे समाज के सामने इतने विकराल रूप में नही आया था कि उत्तर देते समय हमारी स्थिति साँप छंछूदर जैसी हो जाये। जिस पोर्नोग्राफी के बारे में बात करते समय, कुछ वर्षों पहले हमारी जबान लड़खड़ा जाती थी, चेहरे पर एक स्वाभाविक सी झिझक आ जाती थी, ऐसा क्या हो गया कि उस पर बात करना तो बीती बात है, उसमें पैसों के लिये काम करने वाली एक औरत को देखने के लिये सिनेमाघर के टिकट खिड़की पर मार-मारी की स्थिति पैदा हो जा रही है।

पहली बात तो हमें यह समझ लेनी चाहिये कि वर्तमान समय में समाज के विकास का पहिया पैसों की ताकत की वजह से ही आगे बढ़ रहा है। पूरा विश्व धन के पीछे अंधा होकर इस कदर भाग रहा है कि उसे पैरों के नीचे आने वाले कंकड़ों पत्थरों की भी परवाह नही। शायद वह यह भूल गया है कि इन्ही की वजह से पैरों में लगने वाले छोटे-छोटे घाव कालांतर में नासूर बनकर उसे ही मार डालेंगे। पैसे कमाने की बेहिसाब चाहत की वजह से ही फिल्मकारों का एक समूह लागातार ऐसे विषयों को चुनता रहा है जिसके प्रति समाज में हमेशा से ही एक अँधेरा कोना व्याप्त रहा है। अँधेरा, उजाले से ज्यादा आकर्षित करता है, क्योंकि अँधेरे में वे सारे कार्य किये जा सकते हैं जिसे करने में उजाला बंदिशे उत्पन्न करता है।

सनी लियोन पोर्न फिल्मों में काम करने वाली एक औरत है। (मैं यहा मीडिया के तथाकथित पोर्नस्टार संज्ञा का प्रयोग नही कर रहा हूँ, क्योंकि अगर सनी लियोन स्टार है, तो भगवान ना करे कि उस जैसी स्टार बनने की प्रेरणा हमारे समाज में हिलोरे मारने लगे। उसे स्टार का दर्जा देकर मीडिया अपनी गर्दन शुतुरमुर्ग की भाँति रेत में डाल रहा है) उसकी बदनामी को कैश करने की साजिश बालीवुड के कुछ लोगों ने की। दुख की बात तो यह है कि वे अपने मकसद में कामयाब भी हुये और आगे भी उनका मकसद इस तरह के फायदे को भुनाना है। बिग बास के सीजन 5 में बतौर कलाकार सनी लियोन का प्रवेश भारतीय चलचित्र की दुनिया में हुआ और अचानक भारत जैसे देश में सनी लियोन के ऊपर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। प्रिंट और मोशन मीडिया में सनी लियोन के नाम का डंका बज गया। कुछ लोगों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हुये रुढ़िवादियों के समूह को पानी पी-पीकर कोसना शुरू कर दिया। और आखिरकार हुआ वही जो नहीं होना चाहिये था, एक निर्माता-निर्देशक पहुँच गये बिग बास के घर में सनी लियोन को अपनी कहानी सुनाने। अँधे को क्या चाहिये दो आँखे...लियोन ने हाँ कर दी। वहीं से शुरु हो गया पैसे कमाने का खेल, जिसे खेलने वाले अपनी पीठ थपथपा सकते हैं, क्योंकि जिस्म-2 ने रिलीज के पहले ही वीकेंड में 21 करोड़ कमा लिये। उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि पैसा तो एक प्राश्चीट्यूट भी कमा लेती है। हमारे समाज ने कभी भी प्राश्चीट्यूट को नहीं स्वीकारा लेकिन इन प्राश्चीट्यूट्स से भी गंदे और बुरे वे लोग हैं जो बीच में रहकर ग्राहकों से इनका संपर्क कराते हैं जिसे आम भाषा में दलाल कहा जाता है। पे प्राश्चीट्यूट की उस कमाई में अवैध हिस्सा लेते हैं जिसे कमाने के लिये कोई भी प्राश्चीट्यूट सौ बार मर चुकी होती है। लेकिन सनी लियोन और हमारे फिल्म निर्देशक का मामला बिलकुल उलट है। लियोन यह कहती है कि उसने पोर्नोग्राफी का क्षेत्र अपने मर्जी से चुना और इसमें वह कोई  बुराई नही मानती। इस संदर्भ में हमारे निर्देशक की भूमिका और भी गंदी हो जाती है, उसने एक बदनाम औरत को लेकर, एक बदनाम विषय पर, एक बदनाम फिल्म बनाई। कहते हैं कि, नाम ना होगा तो क्या बदनाम भी ना होंगे। बदनामी भी एक तरह की प्रसिद्धि ही है, जिसे पाने का रास्ता बिल्कुल भी कठिन नही है।

शायद कम ही लोग जानते होगे कि जिस्म 2 की निर्माता, जो खुद एक औऱत हैं, उनके बारे में आज के पहले लघभग बारह  या चौदह साल पूर्व एक स्कैंडल हो चुका है। उनकी एक न्यूज तस्वीर मैगजीन में छप गई थी जिसे लेकर बहुत बड़ा बवाल मचा था। मामला पुलिस तक पहुँच गया था। उस मामले में आज की इस बोल्ड निर्माता के रोते-रोते बुरा हाल था। बाद में पता चला कि किसी और औरत के शरीर के उपर इनका फोटो चिपका दिया गया था।  जिस घटना ने उनका जीना हराम कर दिया था आज वह उसी प्रकार के दूसरी बदनाम औरत का सहारा लेकर पैसा कमा रही हैं।
असल में इसमें सनी लियोन का कोई दोष नही है। वह तो एक कठुतली है जिसे पैसों की उंगलियों की बदौलत कहीं भी, किसी भी प्रकार से नचाया जा सकता है। दोषी वे लोग हैं जिन्होने लियोन के जरिये पैसा कमाने का गंदा खेल खेला है।

अब एक सवाल उठता है कि महाराष्ट्र में राज ठाकरे, उत्तर भारत में संघ जैसे कट्टरवादी संगठन, तथाकथित मौलान लोग जो विरोध करने के लिये विशेष रूप से पहचाने जाते हैं उनकी बोलती इस मसले पर बंद क्यों है। क्या राज ठाकरे की राजनीति मात्र उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूरों को खदेड़ने पर ही टिकी है, क्या संघ का  गुस्सा सिर्फ वैलेंटाइन डे पर ही फूटता है, या फिर मौलाना लोग तभी कुछ बोलेंगे जब बात उनके मजहब से संबंधित होगी। किसी को नजर क्यों नही आ रहा कि कुछ लोग हमारी संस्कृति और समाज का बलात्कार करने पर तुले हुये हैं। क्या आतंकवाद की परिभाषा खून के छींटों से ही लिखी जाती है। करोड़ों युवा लड़के और लड़कियों के दिमाग में जो बम प्रतिदिन फूट रहें हैं उनका कुछ नही। 

अगर अनारा गुप्ता, वाटर और प्राश्चीट्यूट्स का विरोध हो सकता है तो, हम किसलिये जिस्म 2 देखने के लिये थियेटरों में जा सकते हैं। हमारे समाज का यही दोतरफा चेहरा है जिसने हमें हमेशा गर्त में ढ़केला है। 

दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

टेराकोटा- गोरखपुर का गौरव


टेराकोटा के ऊपर प्रस्तुत किया गया यह लेख मूल रूप में मेंरे डाक्यूमेन्ट्री फिल्म, टेराकोटा-गोरखपुर का गौरव, का वायस ओवर है, इसीलिये कहीं कहीं  लेख में आपको दृश्यात्मक वाक्य भी मिल जायेंगे। कृपया उसको ध्यान में ना रखकर लेख का आनंद लें। अभी मैं इस डाक्यूमेन्ट्री का संपादन कर रहा हूँ। आशा है कि अगले तीन चार दिनों में यह तैयार हो जायेगी।

यूँ तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से ढ़ाई सौ किलोमीटर उत्तर पूर्व में बसे हुये ऐतिहासिक नगर गोरखपुर को किसी परिचय की आवश्यकता नही। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान  1919 में घटी चौरी-चौरा की दर्दनाक घटना हो, या फिर नाथ संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करता विश्वप्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर, धार्मिक अध्ययन सामग्री के प्रकाशन में वैश्विक कीर्तिमान बना चुका गीताप्रेस हो अथवा पूर्वोत्तर रेलवे का कार्यालय गोरखपुर रेलवे स्टेशन...ये सभी गोरखपुर को एक अलग प्रकार की विशिष्टता प्रदान करते हैं लेकिन इन सबके अतिरिक्त गोरखपुर को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का कार्य किया है एक खास तरीके की कला ने...जो यहाँ के जमीन से जुड़ी है...यहाँ की खुशबू से जुड़ी है...और यहाँ की परंपरा से जुड़ी है।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं..विश्वप्रसिद्ध टेराकोटा आर्ट की...जिसने गोरखपुर को एक अलग  ही मुकाम पर पहुँचाया है। लाल रंग से रंगी प्रतीत होती विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ बरबस ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। सिर्फ चाक और कुछ अन्य प्रकार के छोटे-छोटे यंत्रों के प्रयोग से ही तैयार ये मूर्तियाँ ऐसा आकर्षण उत्पन्न करती हैं कि हर कोई इनकी तरफ खिंचा चला आता है और सोचने के लिये विवश हो जाता है कि कितनी मेहनत लगती होगी इनको तैयार करने में

गोरखपुर से महराजगंज जाने वाली सड़क पर दस किलोमीटर चलने के बाद एक सड़क जाती है टेराकोटा के कलाकारों के गाँव जिसका नाम है...औरंगाबाद। नाम सुनने के बाद चौंकियेगा मत...क्योंकि यह महाराष्ट्र का औरंगाबाद नही है...यह है गोरखपुर का औरंगाबाद जहाँ पर भोलानाथ प्रजापति जी के साथ-साथ बारह पुश्तैनी परिवार टेराकोटा की मूर्तियाँ बनाने में संलग्न है और इस कला को आजतक जीवित रखे हुये हैं। टेराकोटा मूर्तिकला की खूबसूरती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी इसके सम्मोहन से नहीं बच सके थे। उसके बाद श्रीमती इन्दिरा गाँधी, राजीव गान्धी, सोनिया गान्धी, पी. वी. नरसिम्हा राव, माननीय श्री शंकर दयाल शर्मा, माननीय के. आर. नारयणन, उत्तर प्रदेश के  पूर्व मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह, पूर्व राज्यपाल डा. मुरली मनोहर जोशी इत्यादि राजनयिकों ने इस कला को सँवारा और सम्वर्धित किया।

 श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने यह तालाब जिससे कलाकार मूर्तियों के लिये मट्टियाँ निकालते हैं, इन कलाकारों के नाम ही कर दिया। बाद में सरकार ने इनका कार्य सुचारु रूप से चलाने के लिये इस टेराकोटा भवन का भी निर्माण करा दिया। 

टेराकोटा मूर्तिकला के जिस रूप को हम वर्तमान में देख रहे हैं, वह सदा से ऐसी नही थी। समय के साथ-साथ इस कला ने भी अपने आपको परिवर्तित किया है और वर्तमान में इस रूप में हमारे सामने उपस्थित है। पं. जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि पड़ने से पूर्व टेराकोटा कला का स्वरूप गाँव में काली माता के पूजा के लिये प्रयोग किये जाने वाले हाथी और घोड़ों को बनाने तक ही सीमित था।

दिखने में यह मूर्तियाँ जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही श्रमसाध्य है इनके निर्माण की प्रक्रिया। कई दिनों के लागातार परिश्रम के पश्चात यह इस मुकाम पर आ पाती हैं कि बाजार में इनकी मुँहमाँगी कीमत मिल जाती है।

मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया में पहला काम होता है मिट्टी को भुरभुरा बनाना। इसके पश्चात पानी मिलाकर इसे बारह घण्टे के लिये छोड़ दिया जाता है ताकि यह ठीक से गीली हो सके। उसके बाद मिट्टी को अच्छे तरीके से मड़कर उसे दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है जहाँ इसे पैरों से खूब अच्छी तरह से दबाया जाता है जिससे यह जमीन पर एक गोल चपटे आकार में परिवर्तित हो जाती है। अब इसे काटा जाता है और फिरसे पैरों से दबाकर पुनः पहले वाली प्रक्रिया दोहराई जाती है। तत्पश्चात लहछुर नामक यंत्र से मिट्टी को काट-काटकर अलग-अलग किया जाता है, ताकि इसमें से कंकड़-पत्थर इत्यादि निकल जाये। आगे की प्रक्रिया में इसे एक लकड़ी के तख्ते पर हाथों से गूँथा जाता है। यह प्रक्रिया भी मिट्टी से कंकड़-पत्थर निकालने के लिये ही की जाती है। अब मिट्टी मूर्ति निर्माण के अगली प्रक्रिया के लिये तैयार है।

किसी भी मूर्ति के निर्माण के लिये सबसे पहले उसका आधार तैयार करते हैं। यदि एक हाथी के मूर्ति का निर्माण किया जाना है तो सबसे पहले उसके पेट, पैर और सूँड़ का निर्माण किया जायेगा। आधार तैयार होने के पश्चात इसे एक दिन सूखने के लिये छोड़ा जाता है ताकि यह अगले प्रक्रिया, यानि कि जुड़ाई के लिये तैयार हो सके।
सूखने के पश्चात इसे जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की जाती है और सर्वप्रथम हाथी के पैर जोड़े जाते हैं। जुड़ाई एवं नक्काशी का कार्य सहूलियत के हिसाब से साथ-साथ ही संपादित किया जाता है। ध्यातव्य है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के साँचे का प्रयोग नहीं किया जाता है। सब कार्य संपादित होने के बाद इसे सूखने के लिये छोड़ दिया जाता है। सुखाने का कार्य छायादार स्थान पर किया जाता है। पानी सूखने के पश्चात इसे कुछ देर के लिये धूप में सुखाते हैं। सूखने के बाद रंगाई का कार्य प्रारंभ किया जाता है। रंगाई का कार्य प्रायः महिलाएं ही करती हैं।

ध्यातव्य है कि मूर्तियों को रंगने के लिये किसी अन्य रंग का नही बल्कि मिट्टी से ही निर्मित घोल का प्रयोग किया जाता है जो पकने के बाद लाल रंग में परिवर्तित हो जाता है। मिट्टी का लाल रंग में परिवर्तित होना इसमें उपस्थित आयरन आक्साइड की वजह से होता है। रंगाई के पश्चात यह पकाने के लिये तैयार हो जाती है।
पकाने के क्रम में सबसे पहले खाली भट्टी के तह में राख की तह बिछाई जाती है ताकि गर्मी जमीन में ना जा सके। उसके बाद उसमें गोबर के कण्डे मध्य भाग से बाहर की ओर बिछाये जाते हैं। अब मूर्तियाँ सजाने का कार्य होता है। बड़ी मूर्तियाँ नीचे व छोटी मूर्तियाँ क्रमशः ऊपर रखी जाती हैं। इसके बाद इनपर पुनः कण्डे बिछाये जाते हैं एवं उन्हे पुआल से ढ़का जाता है। पुआल को ढ़कने के पश्चात उसे पानी से भिगोकर मिट्टी का लेप किया जाता है।

अब भट्टी आग डालने के लिये तैयार हो गई है। भट्टी के मध्य भाग में छिद्र करके उसमें आग डाली जाती है और फिर उस छिद्र को बंद कर दिया जाता है।भट्टी में मूर्तियाँ बारह से चौदह घण्टे में पक जाती हैं। भट्टी ठंडी होने के बाद उसमें से मूर्तियाँ निकाल ली जाती हैं और उसके बाद ये वितरण के लिये तैयार हो जाती हैं।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...