मंगलवार, 14 अगस्त 2012

ओलंपिक और भारत में दिये जाने वाले पुरस्कार


आग लगने पर कुआँ खोदने वाली कहावत हमारे देश में बहुत प्रचलित है और 2012 के ओलंपकि खेलों में सटीक बैठती है। जब हमारा खिलाड़ी पदक जीतने से वंचित हो जाता है तो हम हो हल्ला मचाने लगते हैं और एक सुर में चीन से अपनी तुलना करने लगते हैं। लेकिन दूसरी ओर जब कोई खिलाड़ी पदक, जाहे वो कांस्य हो अथवा रजत हो, जीतता है तो देश में उसे पुरस्कार देने की होड़ मच जाती है। खिलाड़ी को एक करोड़, दो करोड़ देना तो आम बात हो जाती है।
सवाल यह है कि इस तरह रुपयों की बारिश करके असल में हम क्या साबित करना चाहते हैं। यह कि, पदक जीतो और इनाम पाओ अथवा यह कि, एक ओलंपिक पदक जीवन भर की कमाई से बेहतर है। यह सही है कि इस तरह के पुरस्कार खिलाड़ियों में पदक जीतने के जज्बें को बढ़ाने  के उद्देश्य से ही दिये जाते हैं लेकिन कहीं ना कहीं इसमें अरबपति कंपनियों का अपना स्वार्थ भी निहित है। बैठे-बिठाये ही उन्हे मीडिया की बेहिसाब कवरेज मिल जाती है। चार साल में एक बार कुछ खिलाड़ियों को रुपये देकर देश में खेल का कायाकल्प नहीं  हो सकता है। अगर ये कंपनिया वाकई देश में खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाना चाहती हैं तो उन्हे वही रुपये जो वे एक खिलाड़ी को बतौर पुरस्कार देते हैं, को किसी स्पोर्ट स्टेडियम, प्रशिक्षण केन्द्र इत्यादि  खोलने और सुचारु रूप से चलाने में खर्च करना चाहिये। अगर हर शहर, गाँव  में कुछ ऐसे स्पोर्ट कांपलेक्स खुल जायें तो निश्चित ही देश में खेल का कायाकल्प हो सकता है और उसके लिये न तो चीन जैसी तानाशाही प्रवृत्ति  की आवश्यकता है और ना ही पैसों का लालच। भारत के खिलाड़ियों में देश के प्रति जज्बा ही काफी है। 


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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