शनिवार, 1 जून 2019

मोदी 2.0



Modi 2.0 के लिए इमेज परिणाम























दस्तक सुरेन्द्र पटेल/
सत्रहवीं लोकसभा के परिणाम के पश्चात हर अखबार, टी.वी. चैनल, फेसबुक, ट्विटर इत्यादि जनसंचार माध्यमों पर एक चीज जो सामान्यतः देखी जा रही है वह मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल। मजे की बात है कि हमेशा से लकीर का फकीर रहा भारतीय मीडिया इसे मोदी 2.0 बता रहा है। मीडिया जो बता रहा है भारतीय जनता वही देख रही है, सुन रही है और समझ रही है।

मोदी 2.0 क्यों?
जहाँ तक मुझे याद है कि 2.0 दक्षिण भारत के निर्देशक शंकर द्वारा निर्देशित की गई फिल्म रोबोट का सीक्वल थी। जिस फिल्म ने भारतीय सिनेमाई इतिहास में साँइंस फिक्शन फिल्मो, जिनका निर्माण न के बराबर होता है, को कई कदम आगे ले जाकर खड़ा कर दिया। शंकर की इस फिल्म का टाइटिल भी आई. टी. फील्ड से जुड़ा हुआ है जहाँ साफ्टवेयर के अपडेटड वर्जन को प्वाइंट समथिंग के अनुसार बताया जाता है। उदाहरण के लिये कोई कंपनी जब किसी साफ्टवेयर का निर्माण करती है तो उसे बीटा वर्जिन कहती है। मार्केट के इनपुट मिलने के बाद उसका कंज्यूमर वर्जन बनाया जाता है और समय दर समय उसके अपडेटेड वर्जन सामने आते है। जिसको वह 2.0, 2.0.1, 2.1.1, 2.1.2 इत्यादि नाम दिया करती है। 
इस हिसाब से देखा जाय तो शंकर की सीक्वल फिल्म का नाम 2.0 किसी हद तक तो सही था। क्योंकि उसका हीरो एक रोबोट है, और सीक्वल फील्म में वह और भी ज्यादा अपडेटेड होकर सामने आता है, इसको 2.0 कहा जा सकता है। 
सवाल यह है कि मोदी 2.0 कहाँ तक उचित है।
1-क्या मोदी को एक रोबोट की तरह पेश किया जा रहा है।
2-क्या दूसरे कार्यकाल में मोदी के शारीरिक, मानसिक स्वरूप में कुछ अपडेट हुये हैं।
3-क्या मोदी के सामने भारत को विनाश से बचाने का एक ही मौका जिसमें उनके चूकने के बाद भारत की बर्बादी तय है।
4-क्या मोदी किसी साइंटिस्ट द्वारा निर्मित किये गये एक उत्पाद हैं।
5-क्या मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं जो भारत की हर समस्याओं का समाधान है।
6-क्या भारत सिर्फ एक व्यक्ति के नाम का मोहताज हो गया है।

क्या इसे मीडिया पर सिनेमा काे प्रभाव के तौर पर देखा जाना चाहिये-
इसके पहले भी देखा जा चुका है कि अलग-अलग विषयों, अवसरों और घटनाओं पर मीडिया सिनेमा का इस्तेमाल प्रतीकों के रूप में किया करता है। परिणाम आने से पहले जब एक्जिट पोल के नतीजे दिखाये जा रहे थे तो उस समय पूरा मीडिया बाहुबली और सिंघममय हो गया था। सारे चैनलों पर बाहुबली और सिंघम के म्यूजिक ट्रैक, एनिमेशन की बाढ़ आ गई थी। चुनाव के पहले भी मीडिया प्रतीकों के रूप में अलग-अलग सिनेमाई चरित्रों को पेश कर चुका है। जहाँ तक सवाल इन्हे इस्तेमाल करने का है, इसका प्रयोग सिर्फ उत्सुकता बढ़ाने के लिये किया जाता है। और अगर ऐसा है तो यह बिल्कुल गलत है क्योंकि खबर में उत्सुकता का तत्व मौजूद नहीं है और आप उसमें उत्सुकता का तड़का एनिमेशन, म्यूजिक, प्रतीको का बेवजह प्रयोग करके बढ़ाते हैं तो निश्चित तौर पर आप भटक रहे हैं। दुख की बात है कि हर चैनल, मीडिया हाउस भटकाव की राह पर है। एक-एक खबर और फुटेज कई-कई बार चलाना इसकी बानगी भर है।

अंत में-
मोदी 2.0 संज्ञा देने के पीछे मीडिया की सोच, समझ और मंतव्य क्या है, यह तो वही लोग बता सकते हैं। लेकिन सिनेमा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र करना है और राजनीति, सुरक्षा, समाज, जनता मनोरंजन की विषय वस्तु नहीं है। मीडिया को चाहिये की वह बने बनाये भोेजन को खाने के लिये ना लपके, बल्कि खुद अपना भोजन बनाये। सिनेमाई प्रतीकों का इस्तेमाल कहीं न कहीं वास्तविक चरित्र को उन चरित्रों के आगे छोटा बना देता है। मोदी 2.0 सामने आने पर कहीं न कहीं शंकर की 2.0 की याद हो ही जाती है, जो निश्चित तौर पर मोदी के सामने कुछ भी नहीं है। 

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