सोमवार, 3 जून 2019

राहुल गाँधी और 21वीं सदी का ब्रिटिश काल

दैनिक जागरण में 2 जून को छपी खबर

-दस्तक सुरेन्द्र पटेल
जहाँ आग जलती है, धूँआ वहीं से उठता दिखाई देता है।
राहुल गाँधी का दूसरा नाम पप्पू ऐसे ही नहीं पड़ गया। वो पप्पू जो सा.... कभी डांस नहीं कर सकता। वो पप्पू जो कभी पास नहीं हो सकता। वो पप्पू जो कहता कुछ और है, और मतलब उसका कुछ और निकल जाता है। राहुल गाँधी के वक्तव्य और व्यक्तित्व की यही पहचान है। बात चाहे संसद में आँख मारने की हो, प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाना हो, आलू से सोना बनाना हो, राहुल गाँधी कुछ भी कह दें, भारत को हँसने का एक मौका तो मिल ही जाता है।
ताजातरीन उदाहरण उनके एक और वक्तव्य के बारे में हैं जिसमें उन्होने 1 जून को कहा कि भारत में मौजूदा हालात ब्रिटिशकाल जैसे हैं।

राहुल गाँधी की तुलना कांग्रेस बनाम ब्रिटिशकाल-
हाल ही में भारत में सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुये और परिणाम कांग्रेस और सहयोगी दलों के खिलाफ गया। क्यों गया बजाय इस पर मंथन करने के कांग्रेस और राहुल गाँधी तरह तरह सवाल उठाते रहे। कभी ई वी एम, तो कभी चुनाव आयोग, कभी जनता को  दोष मढ़ने के बाद राहुल गाँधा ने अब कहा है कि कांग्रेस के समय ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई है। वह ब्रिटिश काल जब उसके सदस्य लेजेस्टिव काउंसिल में बहुत कम हुआ करते थे, और उन्हे सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिये काउंसिल में लड़ना पड़ता था।  इसके अलावा उन्होने यह भी कहा कि संसद में उनके 52 सदस्य भाजपा 300 से ज्यादा सदस्यों के लिये काफी हैं। एक एक इंच के लिये कांग्रेस के सदस्य अपनी जान लड़ा देंगे।

क्या वाकई भारत में ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ हैं-
राहुल गाँधी के बयान पर यदि गौर किया जाय तो निम्नलिखित सवाल जेहन में आते हैं-
1-15 अगस्त 1947 में आजादी के बाद भारत में  72 सालों में लगातार सत्रहवीं बार लोकसभा के चुनाव संपन्न हुये हैं जिसमें भारत की जनता को उसके द्वारा चुनी हुई सरकार की प्राप्ति हुई है। ब्रिटिश काल में ऐसा नहीं था। सांवैधानिक सुधारों के बाद भारतीय प्रतिनिधित्व मिलने के बाद भी चुने हुये सदस्यों को यह अधिकार नहीं था कि वे वायसराय के बनाये हुये कानूनों में कोई फेरबदल कर दें। सीधे तौर पर कह सकते हैं कि भारतीय प्रतिनिधित्व हाथी के दाँत की तरह था।
2-अगर राहुल गाँधी के बयान को कुछ देर के लिये मान भी लिया जाय तो ब्रिटिश काल में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुन कर काउंसिल में भेजती थी जो उनका प्रतिनिधित्व करते थे। वर्तमान में वैसी परिस्थितियाँ अगर सामने हैं तो जनता ने कांग्रेस को सिरे से खारिज क्यों कर दिया। यदि कांग्रेज ने भारतीय जनता की नुमाँइदगी की मोनोपाली 1885 से ही ले रखी है ( जो सिर्फ उसे लगता है) तो जवाहर लाल नेहरू के बाद कांग्रेस को हर चुनाव में हाँथ पाँव क्यों मारने पड़ते है। यह कहानी राजीव गाँधी तक तो किसी तरह चली लेकिन आज कांग्रेस की क्या हालत है, पूरी दुनिया जानती है। कांग्रेस यह समझने के लिये क्यों तैयार नहीं।
3-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ वाकई सामने होती तो जनता सरकार के खिलाफ बगावत क्यों नहीं कर रही है। सरकार कैसी भी हो, पाँच साल में उसे अपना हिसाब देना ही पड़ता है, लेकिन इस बार तो सारे रिकार्ड टूट गये। जब जवाहर लाल नेहरू के बाद पहली बार किसी पार्टी ने अपने दम पर दूबारा सत्ता में वापसी की है।
4-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ सामने है, तो तथाकथित महागंठबंधन में कांग्रेस को साथ क्यों नहीं लिया गया। सभी को एक साथ  मिलकर ब्रिटिशकाल से लोहा लेने के लिये तैयार हो जाना चाहिये था।
राहुल गाँधी को चुनाव प्रचार के दौरान अपने एक बयान की वजह से सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप से माफी भी माँगनी पड़ी थी। अगर वो ऐसा नहीं करते तो शायद उन्हे जेल की हवा भी खानी पड़ सकती थी।

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे-
हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जिस प्रकार शुतुरमुर्ग शिकारी को देखकर अपनी गर्दन रेत में डाल लेता है। यह समझते हुये कि शिकारी उसे नहीं देख रहा है। कांग्रेस और राहुल गाँधी का बर्ताव ठीक उसी प्रकार है। ई वी एम-ई वी एम चिल्लाने पर चुनाव आयोग सख्त हुआ तो अपनी झुंझलाहट उतारने के लिये राहुल गाँधी नया पैंतरा आजमा रहे हैं। ठीक यही हालत 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुई थी जब कांग्रेस अपनी हार की वजहों को ढू़ढने के बजाय सारा दोष दूसरों पर मढ़ने पर आमादा थी। इस बार भी नतीजा वही है, और राहुल गाँधी का रवैया भी।

संसद में लड़ने के बजाय जनता के बीच जायें-
राहुल गाँधी अगले चुनाव में अगर कांग्रसे का अस्तित्व खत्म होने से बचाना चाहते हैं, तो उन्हे संसद में हल्ला गुल्ला मचाने के बजाय जनता के बीच में जाना चाहिये। बुनियादी काम करने चाहिये। लोगों को यह संदेश देना चाहिये कि वह महज मनोरंजन की वस्तु नहीं बल्कि भारत की चिंताओं को समझने वाले राजनेता है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध संसद में नहीं बल्कि आम जनता के बीच में करना चाहिये।

छुट्टियाँ कैसिल करके काम पर लग जायें-
जहाँ तक संभावना है, राहुल गाँधी छुट्टियाँ मनाने के लिये विदेश जरूर जायेंगे। लेकिन उन्हे ऐसा नहीं करना चाहिये। छुट्टियाँ तो और भी मन जायेंगी, लेकिन ये पाँच साल अगर फिर भाजपा को कोसने में लगा दिया तो कांग्रेस का क्या होगा, कल्पना से परे होगा।
सबसे दुखद भारत के लिये होगा, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सबसे बड़ी है। काश राहुल गाँधी ऐसा कर सकते।


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