शनिवार, 6 जनवरी 2018

कोहरा-2


जिस चीज पर आपको सबसे अधिक विश्वास हो और वह ऐन मौके पर दगा दे जाय तो आपके सामने हाथ मलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। यही हुआ हमारे साथ, जब विजय ने गाड़ी आगे चलाने से हाथ खड़े कर दिये। मैंने कार कभी कोहरे भरे रास्ते पर नहीं चलाई थी। हाँलाकि जब विजय गाड़ी चला रहा था तब मेरे दिमाग में यह बात थी कि मुझे भी ऐसे समय में गाड़ी चलाने का अनुभव कर लेना चाहिये। लेकिन कोहरे की भयानकता के देखकर स्टीयरिंग पकड़ने का साहस नहीं हुआ। लेकिन अब जबकि उसने हार मान ली थी गाड़ी चलाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।
गोलू ने गाड़ी चलाने की पेशकश की लेकिन मुझे उसपर जरा सा भी विश्वास नहीं था क्योंकि उसे रात में बाइक चलाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता था। खैर मैने भगवान का नाम लेते हुये स्टीरिंग पकड़ा और गाड़ी गियर में डाला। खैर गियर का कोई ज्यादा काम नहीं था क्योंकि गाड़ी दो नंबर से ज्यादा चल ही नहीं सकती थी। दो नंबर में भी एक्सीलेटर पर पाँव ऐसे रखना था कि गाड़ी कहीं बुरा ना मान जाये और नखरे दिखाने वाली बहुरिया की तरह भाग खड़ी ना हो। अगर ऐसा होता तो गाड़ी के गड्ढे में गिरने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
कार के हेडलाइट की पीली रोशनी हाँफते-काँपते ज्यादा से ज्यादा 5 मीटर तक पहुँच पा रही थी, लेकिन उस पाँच मीटर में सड़क मात्र कुछ फीट नजर आ रही थी। आगे बस कोहरा नजर आ रहा था। जाहिर है गाड़ी कहाँ जा रही है कुछ यकीन से कह पाना मुश्किल था। मुझे उस इंडिगो के ड्राइवर का चेहरा याद आ गया जो दरवाजे के शीशे से अपना चेहरा निकालकर सड़क देकने का प्रयास कर रहा था और अपनी गाड़ी दूल्हे के लेकर द्वारपूजा में बारातियों के पीछे धीरे-धीरे चल रहा था। मैने गोलू से कहा कि वो सड़क के किनारे के बारे में मुझे लगतार बताता रहे। अगर मैं सड़क के किनारे से एक फीट भी हटूं तो मुझे सावधान कर दे।
यकीन मानिये गाड़ी चलाने समय नजरें सड़क को इस तरह ढ़ूँढ रही थीं जिस तरह बूढ़े लोग अपना चश्मा। रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था और चलना जरूरी था। खैर इसी तरीके से चलते हुये हम कप्तानगंज तक आये। रेलवे क्रासिंग पर आकर सड़क के घुमाव का अंदाजा न लगने के कारण मैं गाड़ी सीधी ही लेकर चला जा रहा था। सामने एक कार खड़ी थी उससे अंदाजा मिला की आगे रास्ता नहीं है। अमित कार से बाहर निकला और उसके पीछे-पीछे धीरे-धीरे मैं बैरियर तक पहुँचा। ट्रेन गई और हम परतावल जाने वाली सड़क पर आये। वहाँ से थोड़ी राहत मिली क्योंकि सड़क के बीच में और किनारे सफेद पट्टियाँ बनी हुई थी जिससे सड़का का अंदाजा पूरी तरह मिल रहा था। गाड़ी की स्पीड तेज हुई और कहीं कहीं वह 60 तक पहुँच गई। अमित को कई बार टोकना पड़ गया।  कप्तानगंज से परतावल आने में ज्यादा देर नहीं लगी और इसी चक्कर में हम परतावल चौराहे को क्रास करके पनियरा रोड पर आगे बढ़ गये। अचानक से रास्ता पतला हुआ तो सभी चौंक गये। कप्तानगंज से परतावल चौराहे तक रास्ता पूरा चौड़ा है। एक बार फिर अमित गाड़ी से बाहर निकला और पता चला कि हम आगे बढ़ गये हैं। गाड़ी मोड़कर मैं वापस परतावल चौराहे पर आया और वहाँ से महराजगंज रोड पर गाड़ी बढ़ा दी। महराजगंज गोरखपुर रोड और भी चौड़ा था और किनारे तथा बीच वाली पट्टियाँ और भी ज्यादा चटक थीं इसलिये उस घने कोहरे में भी गाड़ी चलाने में विशेष परेशानी  नहीं हुई और हम जल्दी ही महराजगंज पहुँच गये।

कोहरे में गाड़ी चलाते वक्त सावधानियाँ
1-बायीं तरफ किसी को सड़क का किनारा देखने के लिये जरूर बिठायें।

2-आगे चलने वाली गाड़ी पर ज्यादा भरोसा ना करें, क्योंकि वह अचानक से ब्रेक लगा सकता है।
3-स्पीड हमेशा कम रखें।
4-बैक-साइड इंडिकेटर आन करके चलें।
5-म्यूजिक आफ कर दें। यह आपका ध्यान भटका सकता है।
6-गाड़ी में बैठने वाले सभी लोगों का ध्यान सड़क पर ही रहे। सिर्फ ड्राइवर के भरोसे ना रहें।
7-कोशिश करें कि कोहरे वाली रात में उस सड़क का चुनाव करें जिसपर पट्टियाँ लगी हों।

8-हाइवे पर चलने से बचें। 

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