शनिवार, 19 जून 2021

जून (ज्येष्ठ) महीने में वर्षा रानी की ज्यादती



जीवन के 36 बसंत देख लिये हैं (यह आफिशियल डेटा है) लेकिन जेठ मास में वर्षा सुन्दरी का ताड़का रूप का दर्शन पहले नहीं देखा था। सही कहा है कवियों ने, ऐसा हमारे पुराणों में भी वर्णन है कि "स्त्री चाहे बना दे, चाहे तो बर्बाद कर दे।" यही हाल वर्षा का भी है, चाहे तो खेतों में सोना पैदा कर दे, चाहे तो उन्हे मटियामेट कर दे। मई महीने में मैने अपनी पत्नी से कई बार कहा कि "यार मई महीने में इस बार बारिश नहीं हुई।" नहीं मालूम था कि मई महीने का सारा उधार, जून महीने में सूद-ब्याज के साथ वसूल हो जायेगा। 
जून महीने के पहले हफ्ते में ताउते और दूसरे हफ्ते में यास नाम के दो तूफानो ने क्रमशः अरब सागर और बंगाल की की खाड़ी में खर और दूषण की तरह ऐसी तबाही मचायी कि चारों ओर पानी ही पानी हो गया। उत्तर भारत में तो किसान धान का बेहन डालने का इंतजार करते ही रह गये। जिन्होने डाल दिया वो पानी उलीचते-उलीचते परेशान हो गये। हमारे गाँव में लोग तो बाल्टी और इंजन के साथ पानी उलीचने में लगे थे। अभी ताउते का पानी खतम नहीं हुआ था कि, यास ने फिर से डुबा दिया। अबकी बार लोगो ने सोचा, जो होगा देखा जायेगा। 
तो कहने का मतलब यह है कि, केरल में सबसे पहले मानसून की दस्तक होती है, ऐसा मैने पढ़ा है, चूँकि भूगोल का विद्यार्थी रहा हूँ, तो ज्यादा अच्छी तरह से पढ़ा है। मानसून को उत्तर भारत में आते-आते लघभग दो हफ्ते का समय लग जाता है और वह जून के अंतिम हफ्ते या फिर जुलाई के पहले हफ्ते में उत्तर भारत में पहुँच जाता है। पर इस साल तो बिना बुलाये मेहमान की तरह वह जून के पहले हफ्ते से ही धमक पड़ा और जाने का नाम ही नहीं ले रहा है। पिछले दो दिनों से तो हवायें तूफान की तरह चल रही हैं। गाँव शहर के अंदर रहने वालों को नहीं पता लेकिन हम लोग तो ठहरे निर्वासित लोग जो, गाँव और शहर दोनों में नहीं गिने जाते। खेतों को बीच में विद्यालय प्रांगण में निवास है, इसलिये हमें मौसम में होने वाली हर एक हल्की से हल्की जुंबिश का अहसास हो जाता है। 
ध्यान से देखा जाये तो, जिसे मौसम विज्ञानी पिछले कई दशकों से देख भी रहें हैं लेकिन दुनिया की सरकारें आँखें बन्द की हुई हैं, कि यह मामला सिर्फ समुद्री तूफान का मैदानी इलाकों में पड़ने वाला प्रभाव मात्र नही है। यह मुद्दा निर्वनीकरण, अंधाधुँध शहरीकरण, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग का भी है। तूफान पहले भी समुद्रों में आते रहे हैं, लेकिन मैदानी इलाकों में  इस तरह का प्रभाव देखने को नहीं मिलता था। हवाओं के साथ एकाध दिन हल्की फुल्की बारिश हो जाती थी, बस इतना ही, लेकिन इस साल तो अति हो गयी है। बारिश है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। 
तो लब्बोलुआब यह है कि आगे इस तरह की घटनाओ को टालने के लिये मौसम विज्ञानियों की बातों क न सिर्फ सुनना होगा, बल्कि अमल भी करना होगा।

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