शुक्रवार, 7 जून 2019

माया महा ठगनी हम जानी

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दस्तक सुरेन्द्र पटेल

माया महा ठगनी हम जानी।।
तिरगुन फांस लिए कर डोले
बोले मधुरे बानी।।



कबीर दास जी लिखते हैं कि माया, यह जो द्रष्ट स्वरूप है, सब एक भुलावा है, छलावा है, मृगमरीचिका है। इसके पीछे भागने वाला न घर का रहता है न घाट का। घर का इसलिये नहीं रहता क्योंकि घरवाले लात मारकर भगा देते हैं। या फिर भांग खाकर बौराये भंगेड़ी की तरह मनुष्य ही घरवालों को लात मारकर भगा देता है। दोनो ही सूरतों में उसके आगे पीछे कोई नहीं रह जाता है। कहावतों में इसे कहा जाता है कि आगे नाथ न पीछे पगाह। 

ठगनी तो यह इस कदर है कि मनुष्य का सारा वैभव, ऐश्वर्य, यश, मान, संपत्ति लेने के बाद भी यह बडे़ ही भोलेपन के साथ कहती है कि भई हमने तो तुम्हारा साथ निभाने की बड़ी ही कोशिश की, तु्म्हारी तरफ से ही कमियाँ रह गई, सो अब हमारा तुम्हारा निबाह होने से रहा। भई अपना रास्ता हमने देख लिया, तुम भी सोध लो, तो भला हो।
इसके डोरे डालने की कहानी भी बड़ी विचित्र है। तरह तरह के प्रलोभन देकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है, मसलन, कभी रूपये पैसे से, कभी शानो शौकत से, कभी रूप से, और कभी-कभी तो राजनीति से भी। कहा जाता है कि राजनेता भारत देश में सबसे पहुँची हुई चीज हैं, उनके आगे देवता भी पानी माँगते हैं। जब इस विरले किस्म के लोग माया के चक्कर मेें फंसकर अपनी लुटिया डुबा लेते हैं तो बात बड़ी ही गंभीर हो जाती है। 


जानने के बाद भी-

लेखक अपने सभी शुभचिंतको, मित्रों और जान पहचान वाले लोगों से एक मार्के वाली बात हमेशा कहता है कि- साँप पालो, बिच्छू पालो कभी कभी तो शेर भी पाल लो, पर भइया भूल के भी कभी खुशफहमी मत पालो। 
खुशफहमी पालने वाला मनुष्य इसी प्रकार माया के चक्कर में फंसता है और अपना राम नाम सत्य करा लेता है। सवाल यह है कि जानने के बाद भी कि माया कभी किसी की नहीं हुई, यहाँ तक कि उसकी भी नहीं जिसने कभी उसका चीर हरण होने से बचाया था तो साधारण से एक बालक की क्योंकर होगी। वह बालक जिसे जन्म से ही माया के बारे में ठसक-ठसक कर बताया गया हो। 


बाप बड़ा ना भाई-जग में हुई हसाँई-

माया के पीछे भागते-भागते कब सबकुछ पीछे छूट गया बेचारे मनुष्य को पता ही नहीं चला। 
किया किनारे चाचा को, पापा दूर हटाय।
कुर्सी खातिर ना जाने कितनों को लतियाय।।
अब हालत यह है कि जहाँ से चले थे लाला, वहीं आकर हो गये खडे, पाँच साल में क्या खोया, पता नहीं, क्या पाया, भूल गया। 
माया का प्रभाव तो बढ़ता ही रहता है। आज यहाँ, कल वहाँ, परसों जहाँ-तहाँ।

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