रविवार, 30 अप्रैल 2017

बाहुबली- 2

bahubali के लिए चित्र परिणाम
दो साल का इंतजार अंततः खत्म हुआ। बाहुबली 2 रिलीज हुई और रिलीज के पहले ही दिन इसने 100 करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया जिसके पास पहुँचते पहुँचते ज्यादातर फिल्में हाफने लगती हैं।
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, यह सवाल सोशल मीडिया में दो सालों तक गूँजता रहा। लोगों की उत्सुकता इस फिल्म के प्रति दीवानगी के हद तक जा पहुँची। यहाँ तक कि मेरे विद्यालय में पढ़ने वाली एक लड़की ने बड़े ही गर्व से बताया कि वह 28 अप्रैल को गोरखपुर जा रही है बाहुबली 2 देखने। किसी फिल्म के प्रति इतना क्रेज, यह बताने के लिये काफी है कि उस फिल्म की कमाई कहाँ तक पहुँचेगी। फिल्म पंडित यह कयास लगा रहे हैं कि यह भारत की पहली फिल्म बन सकती है जो 1000 करोड़ रूपये की कमाई कर सकती है।
निःसन्देह पहली फिल्म हर मायनों में भारतीय फिल्मों से कई साल आगे रही थी। भव्य सेट, रिच कलर, शानदार सिनेमैटोग्राफी, अचंभित करने वाले ग्राफिक्स इन सबने मिलकर एक मायाजाल रच दिया था जिसके भीतर जाने पर दर्शक को कुछ याद नहीं रहता था। बाहुबली के कई सारे दृश्य ऐसे हैं जो अभी तक मानस पटल पर अंकित हैं लेकिन अफसोस कि बाहुबली 2 उस पैमाने पर खरी नहीं उतरी। हालाँकि यह फिल्म भी आम भारतीय फिल्मों से बहुत बेहतर है लेकिन इसमें पहले वाली बात नहीं।

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा इसके जवाब में दर्शक किसी अकल्पनीय ताने-बाने की कल्पना कर रहे थे, लेकिन हकीकत में यह बहुत ही सतही साबित हुआ। शिवगामी देवी द्वारा अपने पुत्रमोह में कटप्पा को यह आदेश देना कि बाहुबली को मार दो अथवा वह उसे मार देंगी, बहुत ही बचकाना रहा। कटप्पा द्वारा बाहुबली को धोखे से मारने की बजाय प्रजा रक्षा के लिये उसके द्वारा खुद मौत के गले लगाने का निर्णय लेना और भी ज्यादा भावनात्मक प्रभाव पैदा करता।
दूसरे हाफ में भल्लाल के षडयंत्र इतने जल्दी-जल्दी घटित होते हैं कि किसी एक को भी एस्टाब्लिश करने का समय ही नहीं मिला।
शिवगामी देवी के चरित्र में इतनी जल्दी यू टर्न आना, अगले कुछ दृश्यों में बाहुबली को मारने का आदेश दे देना, खटकता है।  
जिस बाहुबली को पहली फिल्म में देवता समान दिखाया गया वह दूसरी फिल्म में अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के चलते अपनी जान गँवा बैठा, अखरता है।
पहले फिल्म में अरब से आये हुये एक हथियार के सौदागर का चरित्र दिखाया गया है, जिसे सुदीप ने निभाया था, दूसरे फिल्म में उसके दुबारा लाने की पूरी गुंजाइश थी लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।
पहली फिल्म में युद्ध के दृश्य हालीवुड फिल्मों को भी मात देते थे...वह आकर्षण इस फिल्म में नजर नहीं आया।
पहली फिल्म में महेन्द्र बाहुबली का चरित्र अमरेन्द्र बाहुबली के टक्कर का था, लेकिन इस फिल्म में उसका इस्तेमाल सही तरीके से नही हो पाया।

और भी कई चीजे हैं लेकिन हम अपने कमरे में बैठकर फिल्म मेकिंग को जज नहीं कर सकते। फिल्म बनाने में हजारों लोगों की मेहनत और समय लगता है और बाहुबली को बनाने में तो लाखों की मेहनत लगी होगी। इस फिल्म ने इतिहास बनाया है लेकिन जिससे आशा होती है अगर वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो एक टीस मन में रह ही जाती है। फिलहाल बाहुबली टीम को बधाई...।

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