रविवार, 22 दिसंबर 2013

धूम 3

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम।
धूम 3 को देखकर थियेटर से निकलने के बाद पहला विचार जो दिमाग में आया वह यही था। देशभर के 4500 सिनेमाघरों में रिलीज करके, ऊँची कीमत पर टिकट बेचे जाने का जो गेम यशराज फिल्म्स ने खेला उससे दर्शक फिल्म देखने सिनेमाघर जरूर गया लेकिन बाहर आते समय सिर धुनने के अतिरिक्त कोई चारा उसके पास नहीं था।
फिल्म में ना कोई कहानी है ना कोई सस्पेन्स जो थोड़ा बहुत है उसे निर्देशक ने अगले ही दृश्य में खुद ही बता दिया है। जिस 
प्रकार औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती उसी प्रकार फिल्म के निर्देशक के पेट में फिल्म का कोई सस्पेंस या मिस्ट्री नहीं पचती ऊपर से तुक्का यह कि पूरी फिल्म में मिस्ट्री की बात की गई है।
फिल्म के तकनीकी पक्ष को छोड़ दें तो फिल्म में ऐसा कुछ भी नही जिसे याद रखा जाये। चरित्रों की बात करें तो आदित्य चोपड़ा ने पहले से ही तय कर रखा था कि आमिर के अलावा किसी को स्कोप ही नहीं देना है। पूरी फिल्म में आमिर ही आमिर हैं रही सही कसर उनके डबल रोल ने पूरी कर दी। एक आमिर किसी फिल्म को पचा जाते हैं यहाँ तो दो दो आमिर हैं तो किसी के लिये कुछ बचने की संभावना थी ही नही। लेकिन आदित्य को यह सोचना चाहिये था कि कोई फिल्म केवल एक या दो किरदार की बदौलत नहीं बढ़िया बनती। फिल्म को बढ़िया बनाने के लिये और भी चरित्रों की जरुरत पड़ती है। धूम में ऐसे किरदार हैं भी लेकिन उनपर आमिर के डर से ज्यादा मेहनत नहीं की गई। सबसे ज्यादा नाइंसाफी अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा के साथ की गई है। कैटरीना कैफ से भी कोई हमदर्दी नही दिखाई गई। विदेशी किरदारों का काम शायद शोरूम में रखे आइटम की तरह पोस्टर में छापने के लिये ही किया गया है। कम से कम विक्टरिया के किरदार को बढ़ाया जा सकता था।
म्यूजिक के नाम पर सिर्फ धूम का बैकग्राउण्ड स्कोर ही सुनाई देता है और याद रहता है। हाँ फिल्म के टाइटिल में आमिर द्वारा किया गया टैप डांस दर्शनीय है। स्टंट के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ स्पेशल इफैक्ट है जो अक्सर बोरिंग लगते हैं। सबसे बड़ी कमी फिल्म का बैकग्राउण्ड अमेरिका में होना है। धूम जैसी चोरी का पता हालीवुड का लोकल पुलिसवाला ही आसानी से लगा सकता है उसके लिये भारत से जय और अली को बुलाने की जरुरत नहीं पड़ती।

और क्या लिखूँ बस इतना ही कि इस लेख को पढ़कर अगर एक भी पाठक थोड़ा सा पेशेन्स दिखाकर फिल्म के डीवीडी रिलीज होने तक इंतजार कर सके तो इसका लिखना सार्थक हो जायेगा।

दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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