मंगलवार, 10 अगस्त 2010

उत्तर बनाम दक्षिण भाग एक-शिक्षा

भारत में कुल 300 मेडिकल कालेज हैं जिनमें 143 सरकारी क्षेत्रों में तथा 157 निजी क्षेत्रों में है। मैं मेडिकल कालेजों की संख्या के बारे में चर्चा नही बल्कि उनकी संख्या के विभिन्नता के बारें में चर्चा करना चाहता हूँ।

महाराष्ट्र में 41, कर्नाटक में 39, आन्ध्राप्रदेश में 33, तमिलनाडु में 32 तथा केरल में 22 मेडिकल कालेज हैं। कुल मिलाकर 167 मेडिकल कालेज दक्षिण के पाँच राज्यों में हैं जो भारत की एक तिहाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व भी नही करते। बाकी के 133 मेडिकल कालेज देश के बाकी राज्यों मे हैं जिनमें से 22 उत्तरप्रदेश तथा 21 गुजरात मे हैं। अगर इन दो राज्यों के कालेजों को निकाल दिया जाय तो बचते हैं 90 कालेज जो कि देश के बाकी राज्यों में हैं।

आज के परिवेश में जब पूरा भारत उत्तर भारत के कुछ राज्यों, जिनमें से उत्तर प्रेदश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों को पिछड़ा और अशिक्षित मानता है, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि उत्तर भारत के ये राज्य इस अवस्था में क्यों हैं या फिर इनका जिम्मेदार कौन है।

ऊपर मैंने मेडिकल कालजों का एक उदाहरण दिया जो आधे से अधिक दक्षिण के पाँच राज्यों में है। किसी भी व्यक्ति, समाज या देश के विकास और प्रगति में सबसे ज्यादा जरूरी चीज है शिक्षा, वह भी स्तरीय जो उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण के राज्यों में अधिक सरलता से उपलब्ध है। दक्षिण के राज्यों में जब बच्चा हाईस्कूल या फिर बारहवीँ में होता है तो वह अपना एक टार्गेट बना चुका होता है कि उसे क्या बनना है, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या फिर साइंटिस्ट। हालाँकि उत्तर भारत के राज्यों में भी कैरियर के प्रति सजगता में विकास हुआ है लेकिन फिर भी बहुत सारी कमियाँ है। दक्षिण के राज्यों में बीटेक की डिग्री लेकर निकलने वाला एक सामान्य इंजीनियर डिग्री के साथ संचार के सशक्त माध्यम अंग्रेजी को भी साथ लेकर निकलता है जो मल्टीनेशनल कंपनियो में काम करने के लिये बुनियादी जरूरत है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के राज्यों के स्टूडेंट्स में पहला और बुनियादी अंतर यही जो आगे चलकर नौकरी पाने के अवसरों में विचलन पैदा करता है।

दक्षिण भारत के राज्यों ने शिक्षा व्यवस्था पर बहुत ही ज्यादा ध्यान दिया है और परिणाम सामने है। वहीं उत्तर भारत के राज्यो, विशेषकर उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दुर्गति अगर किसी व्यवस्था की हुई है तो वह शिक्षा व्यवस्था है। सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों, हायर सेकेंडरी स्कूलों और कालेज्स की हालत यह है कि दक्षिण भारत के कालेजों का सबसे कमजोर छात्र यहाँ के सबसे अच्छे छात्र को चैलेंज कर सकता है।

पिछले दिनों एक सरकारी मिडिल स्कूल का एक छात्र मेरे पास फोटो खिंचवाने आया। मैने उसे रेट बताया कि पंद्रह रुपये में तीन पासपोर्ट फोटो बनेंगे। ल़ड़के ने कहा मेरे पास दस रुपये हैं। मेरा जवाब था नही। पास बैठे मेरे दोस्त सेराज ने जो कि एक एडवोकेट है वो कहा कि बना दो...लड़का है। मैन कहा कि इसे घर से पंद्रह रुपये मिले होंगे फोटो खिंचवाने के लिये। पर ये दो फोटो खिंचवा कर पाँच रुपये बचाना चाहता है। जो कि भ्रष्टाचार का पहला पायदान है। जो चीज हमारी नही उसे लेना चोरी है। खैर सेराज के बहुत कहने पर मैने दो फोटो बनाने को तैयार हो गया। साथ में किसी और की फोटो भी बनानी थी इसलिये मैने दोनो की फोटो साथ लगा दी और जब वे प्रिंट होकर निकले तो पता चला कि उस लड़के की तीन फोटो निकल गई थी। मैने कहा अब तो तीन के पैसे देने ही पड़ेंगे। कमाल की बात थी, कि वह बिना कुछ कहे पंद्रह रुपये देकर चला गया। इस बात का संदर्भ मैं शिक्षा व्यवस्था पर देना चाहता हूँ, वह यह था कि फोटो तैयार करते वक्त मैनें उसकी पढ़ाई के विषय में बात करना प्रारंभ कर दिया। वह छठीं या फिर सातवीँ क्लास में था, उसे यह नही पता था कि सातवीं कक्षा को अंग्रेजी मे क्या कहते हैं। उसे नौ का पहाड़ा तक नही याद था और वह हिंदी वर्णमाला के अक्षरों तक को नही जानता था। उसे यह नही पता था कि उसके विद्यालय का गेट किस दिशा मे हैं। शायद उससे यह पूछा जाता कि वह किस देश मे रहता है तो वह यह भी नही बता पाता। उसके अनुसार उसकी दिन में सिर्फ तीन कक्षायें चलती हैं जिनमें उसे हिंदी, गणित और संस्कृत पढ़ाये जाते हैं। सरकारी स्कूलों मे पढ़ने वाले कक्षा सात के विद्यार्थी के बारे में उपरोक्त तथ्य जानकर आश्चर्य के साथ-साथ दुख भी होता है कि जब प्राइमरी लेवल की शिक्षा व्यवस्था का ये हाल है तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि उच्च शिक्षा की क्या हालत होगी।

दूसरा उदाहरण और भी विचारणीय है। मेरे जनपद का सबसे अच्छा हाईस्कूल जिसकी शिक्षा व्यवस्था विद्यालय के कथनानुसार प्रदेश में तीसरे स्थान पर है। उसके एक छात्र ने उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाइस्कूल की परीक्षा में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। जिसका विज्ञापन अखबारों, विद्यालय के प्रचार माध्यमों से दो सालों तक जोरशोर से किया गया। वही छात्र दो साल बाद बी एस सी के इंट्रेंस इग्जाम में गोरखपुर विश्विद्यालय की प्रवेश परीक्षा तक नही पास कर पाया। वर्तमान मे जनपद की थर्ड क्लास कालेज में बी एस सी कर रहा है। यह एक निजी विद्यालय है जो दिन दोगुनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहा है लेकिन सिर्फ पैसा कमाने में। विद्यालय के विषय में एक हास्यास्पद बात और है कि यह प्रदेश का तीसरा सबसे अच्छा विद्यालय है। जिसका कुल कैंपस ही एक एकड़ है। विद्यालय भवन में लघभग बीस से पच्चीस कमरे हैं और उसके अध्यापकों की स्थिति और भी चिंताजनक है। जब मैंने इसके तीसरे स्थान के बारे में सुना तो मुझे अचानक ही फैजाबाद के जिंगल बेल्स एकेडमी की याद आ गयी। जहाँ मैं राज्य स्तरी बाल विज्ञान कांग्रेस में हिस्सा लेने के लिये प्रथम बार महराजगंज की ओर से 1999 में गया था। जब मैं दसवी क्लास में था। 1999 में जिंगल्स बेल्स एकेडमी को देखने पर पहली बार अहसास हुआ कि कालेज ऐसे भी होते है। उस समय उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज महज आठ तक था। और किराये के मकान में चलता था। तीन से चार मंजिलों की जिंगल्स बेल्स एकेडमी की इमारतें अपनी भव्यता का गुणगान कर रही थी। क्लासेज इतने बड़े थे कि उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज के तीन कमरे उसमें समा जाये। यहाँ तक कि गोरखपुर विश्विद्यालय के क्लासेज भी आगे फीके थे। कालेज की अपनी ए क्लास की कैंटीन, टीचर्स अपर्टमेंट थे। 1999 में कालेज का कंप्यूटर रूम पचास के लघभग कंप्यूटरों से भरा था। कालेज के फर्श पर धूल का एक कण भी दिखाई नही देता था, और प्लेग्राउंड इतना बड़ा था कि उत्तर प्रदेश के तीसर कालेज जैसे आठ-दस कालेज इसमें बन जाते। सबसे बड़ी बात बता दें कि स्टूडेंट्स, जिनको देखने से ही लगता था कि ये किसी ए क्लास कालेज में पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं। प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन के दौरान वहाँ के आडिटोरियम जाने का मौका मिला और मैने जाना कि आडिटोरियम क्या होता है। जब कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी आडिटोरियम को बने कुछ साल हुये। जिंगल्स बेल्स एकेडमी के सेमी ओपेन आडिटोरियम में ऐसा लग रहा था कि मैं किसी और दुनिया में था। मुझे वहाँ एकमात्र स्पेशल कांशोलेशन प्राइज मिला और मैं उस पल को याद करके आज भी रोमांचित हो जाता हूँ। खैर इस बात को बीते और जिंगल्स बेल्स एकेडमी को देखे ग्यारह साल हो गये और विश्वास है कि उस कालेज ने और भी ज्यादा तरक्की की होगी, लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज और ग्यारह साल पहले के जिंगल्स बेल्स एकेडमी की तुलना करें तो आज उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज ग्यारह साल पहले के जिंगल्स बेल्स एकेडमी के बराबर क्या नीचे बैठने के लायक भी नही है। न शिक्षा के बारे में, न व्यवस्था के मामले में और न ही विद्यार्थियों के मामले में। कमाल की बात यह है कि मैं स्वयं भी आज से तेरह साल पहले इसी उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज से आठवीं पास हूँ। तब जब ये स्कूल किराये के मकान में चलता था।

अपवाद हर जगह होते हैं और उत्तर प्रदेश में भी शिक्षा के साथ हर क्षेत्र में भी। जिंगल्स बेल्स एकेडमी जैसे और भी कालेज होंगे जो अपने स्तर से अच्छा कर रहे होंगे लेकिन अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता। ऊपर से जिंगल्स बेल्स एकेडमी जैसे स्कूल प्राइवेट सेक्टर में हैं जिनकी फीस आम आदमी अफोर्ड नही कर सकता। राज्य सरकार को चाहिये कि वो शिक्षा व्यवस्था में तत्काल सुधार करे ताकि आने वाले सालों में शिक्षा का स्तर उपर उठ सके और उत्तर प्रदेश के विद्यार्थी भी विज्ञान, तकनीकी, कला, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में, उत्तर प्रदेश मे रहकर ही कार्य कर सकें ताकि उत्तर प्रदेश से पिछड़ेपन और अविकसित होने का दाग धीरे धीरे मिटाया जा सके। वरना नाम डुबाने के लिये उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज है ही........

सुरेंद्र पटेल

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