मंगलवार, 19 जनवरी 2010

Thand, Kiske Liye?

कहा जा रहा है कि इस साल ठंड बहुत पड़ रही है, इसने पिछले दस साल के रिकार्ड को तोड़ दिया है। कोहरे और धुंध की वजह से ट्रेनों और प्लेनों की यात्रा में विलंब हो रहा है। खैर पहली बात तो रिकार्ड बनते ही हैं टूटने के लिये और पिछले कुछ सालों की मौसम की फाइलें उठाकर देखें तो पता चलेगा कि रिकार्ड तो अभी और टूटने बाकी हैं। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम रूठी हुई भाभी बन गया है।

हम बात कर रहे थे ठंडी की...वाकई ठंडी बढ़ी तो है लेकिन किसके लिये, सही है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम कुछ ज्यादा ही अनियमित हो गया है, लेकिन सिर्फ आम आदमी के लिये, नही तो विकसित देश क्योटो प्रोटोकाल पर सहमत क्यों नही होते। अमेरिका जो सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करता है वह क्योटो प्रोटोकाल के संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिये राजी ही नही है। क्यों...क्या उसे इस धरती पर नही रहना है, या फिर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा उसके लिये नही है, है, लेकिन वह इस तथ्य को विकासशील देशों के ऊपर थोपना चाहता है कि हम विश्व के बेताज बादशाह हैं, हम जो करेंगे वह आदर्श होगा और जो सोचेंगे वह नीति। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे कि दिल्ली या गुड़गाँव में कड़ाके की ठंडी में सड़क के किनारे खड़े कुछ फुटपाथ पर पलने वाले बच्चे थर-थर काँप रहे हैं और वहीं दूसरी ओर सड़के के किनारे खड़े कुछ अमेरिकन सोच वाले लोग अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मजे में आइसक्रीम खा रहे हैं और ठंडा पी रहे हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि पैसे से मौसम को भी अपने अपने अनुकूल बना लिया गया है। वो ठंडी में भी मजे करते हैं और गर्मी में भी। पर बेचारा गरीब क्या करे वह तो हर तरफ से मारा-मारा फिरता है। वह खाने की भी व्यवस्था मुश्किल से कर पाता है तो वह सर्दी से बचने की व्यवस्था कहां से करेगा। वह तो भला हो प्रकृति का कि उसने इंसानों में प्रकृति के साथ अनुकूलन की एक नायाब व्यवस्था कर रखी है नही तो पैसे वाले प्रकृति को भी पैसे से खरीदकर गरीबों पर अत्याचार करने के लिये विवश कर देते। जो लोग सड़के के किनारे आइसक्रीम खा रहे हैं जरा उनके जैकेट स्वेटर जूते वगैरह निकाल दिये जायें और कुछ देर बाद फिर आइसक्रीम खाने के लिये दी जाये तो क्या होगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

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