गुरुवार, 21 जनवरी 2010

दर्दनिवारक गोलियों पर टिकी है जिंदगी.

म्योरपुर, सोनभद्र,

उन ग्रामीणों की जिंदगी में दर्द निवारक गोलियों के सिवा कुछ नही हैं। दर्द से बेहाल लोग पेनकिलर के सहारे ही जीते हैं। जिले के चार ब्लाकों में फ्लोराइड के कहर से दो हजार से ज्यादा लोग विकलांग हो चुके हैं। पेनकिलर दवाओं, डेक्लो प्लस, बूफ्रेन डेकोपिन निमुस्लाइड के नाम बच्चों बूढों की जुबान पर हैं। फ्लोराइड की वजह से फ्लोरोसिस के शिकार ग्रामीणों की हड़्डियों में ताकत नही बची है। सरकार के आधे अधूरे प्रयासों से लोगों की जिंदगी नरक बन गयी है। दर्द निवारक गोलियाँ सौगात में दूसरी जानलेवा बिमारियाँ दे रही हैं।

यह दर्दनाक किस्सा, जिले के म्योरपुर ब्लाक के कुसुम्हा, रास पहरी, जरहा, चेटवा, मनवसा, जोरूखाड़, चोपन ब्लाक के नेरूइया दामर, रोहनिया दामर, पड़रच, नई बस्ती, पड़वा, कोतवारी गाँवों का है। बभनी और दुदही ब्लाक ब्लाक में भी कुछ गाँव फ्लोराइड का दंश झेल रहे हैं। कुसुम्हा, रोहनिया दामर, जैसे कुछ गाँव में एक परिवार के सभी सदस्य विकलांगता का दंश झेल रहे हैं। अकेले कुसुम्हा गाँव तीन से चार सौ लोग फ्लोरोसिस पीड़ित हैं। यहीं के रामभजन ने कहा कि उसकी हड्डियाँ कमजोर होने से शरीर में भयंकर दर्द उठता है। उसने कहा कि अगर हम गोली नहीं खायेंगे तो जिंदा नही बचेंगे। हालात यह है कि पीड़ित एक दिन में दो से तीन दर्द निवारक गोलियाँ खा रहे हैं। एक दवा विक्रेता ने बताया कि पिछले दो से तीन सालों में दर्द निवारक दवाओं की बिक्री आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। सी एम ओ डा जी के कुरील का कहना है कि इस रोग में दर्द निवारक गोलियाँ कारगर तो हैं लेकिन अधिक प्रयोग से बुरा प्रभाव पड़ता है। आठ वर्ष पूर्व चार ब्लाकों के दो दर्जन गाँवों में फ्लोरिसिस के प्रकोप का पता चलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने पीड़ितों के लिये अच्छे इलाज के लिये कार्ड बनाये गये।

क्यों बढ़ी है फ्लोराइड की मात्रा-

केमिकल इंजीनियर और विश्व बैंक के सलागकार दुनू राय का कहना है कि एल्यूमिनियम कंपनी बाक्साइट से अधिक बाक्साइट निकालने के लिये फ्लोराइड का इस्तेमाल करती हैं। बाद में चिमनियों के सहारे उड़ने वाला फ्लोराइड चालीस किलोमीटर के क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ता है।


अमर उजाला- 18 जनवरी, 2010

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