रविवार, 17 जनवरी 2010

AHSAAS........

अहसास....


हम लोगों को प्रतिदिन कहते सुनते हैं कि मैं तुम्हारी खुशियों या गमों को महसूस करता हूं। खुशियों के बारे में तो नही कह सकते क्योंकि उनके महसूस करने का विधान ही अलग है लेकिन अगर बात गमों की करें तो यह नामुमकिन है कि किसी दूसरे के दुखों को कोई दूसरा महसूस कर पाये। इस तथ्य को सीधे सीधे शब्दों में कहा जाये तो, किसी का सुख महसूस करना आसान है। इसका साधारण सा तरीका है कि उसके खुशियों में शरीक हो जाओ...खाओ, गाओ, मौज मनाओ। कहते हैं, कि इसी से तो खुशियाँ दुगुनी होती हैं।

लेकिन अगर गम बाँटना हो तो...कैसे बाँटें, उसे सांत्वना देकर...या फिर उसे पुरानी खुशियों की याद दिलाकर, शायद नहीं, क्योंकि यदि हम सांत्वना देने का प्रयास करेंगे तो हम उसके वर्तमान दुखों की याद करायेंगे जो उसके दुखों में वृद््धि ही करेंगे, और यदि हम उसके बीते हुये अच्छे पलों की याद कराकर उसे खुशी प्रदान करने की कोशिश करेंगे तो स्थिति और भी जटिल हो जायेगी क्योंकि जब आदमी पर दुखों का पहाड़ टूटता है तो खुशी के पल भी उसे कष्ट प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ भारतीय वैवाहिक परंपरा में दूल्हे के खाना खाने या फिर दूल्हे के पिताजी के आगमन से संबधित शुभ अवसरों पर गाली देने का रिवाज है, मतलब खुशी के समय पर गालियाँ भी अच्छी लगने लगती है और दुख के अवसर पर अच्छी बातें भी खराब।

तो बात हो रही थी, किसी के सुख या फिर दुख को महसूस करने की। मेरा मानना है कि हम किसी के सुख या फिर दुख को महसूस नही कर सकते। मैं इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा जो आजकल मैं बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूं, स्मरणीय है कि मैं महसूस कर रहा हूँ, इसका मतलब यह नही है कि मैं उसमें शामिल हूँ, एक संवेदनशील द्ष्टा की तरह मैं देख रहा हूँ और उसपर अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ, किंतु इतना अवश्य है कि ये घटना किसी को भी विचलित कर सकती है।

इस समय मैं गुड़गाँव में रह रहा हूं, विकास सर के साथ। हम जहाँ रहते हैं, रहते क्या हैं, बस नहाते हैं और कपड़े चेंज करते हैं, वहाँ की स्थिति थोड़ी अजीब है। मकान के मालिक दो भाई हैं, जिनके मकान में दो भाग हैं। हम दाये वाले भाग में रहते हैं। जिसमें चार कमरे नीचे और एक कमरा ऊपर है। नीचे वाले कमरों में हम

रहते हैं। पहले वाले कमरे में एक परिवार रहता हैं जिसमें पति-पत्नी और उनके तीन बच्चे रहते हैं। ये लोग हरियाणा से बिलांग करते हैं। दूसरे वाले कमरे में हम लोग रहते हैं, विकास सर और मैं। तीसरे कमरे में दो लड़के रहते हैं जो किसी कंपनी में काम करते हैं, वे कहाँ के हैं, नही जानता। चौथे कमरे में भी लड़के रहते हैं। सारी पाँचवा कमरा भी है, मैं बताना भूल गया था, जिसमें एक पति-पत्नी रहते हैं जो बिहार के हैं। सर उनको बिहारी और बिहारन कहते हैं। अच्छी बात यह है कि दोनो काम पर जाते हैं, और शायद बहुत खुश भी हैं। अब आते हैं मुख्य कहानी पर, घर का दूसरा हिस्सा, दूसरे भाई का है। उसमें किरायेदार रहते हैं कि नही मैं नही जानता हूँ। दूसरे भाई का परिवार रहता है, यह पता है। मेरे कहानी का पात्र दूसरा भाई और उसकी पत्नी हैं। उनके बच्चे भी हैं पर कितने हैं, कह नही सकता, कभी जानने का मौका नही मिला। या फिर जानने की कोशिश नही की। कहानी का प्लाट यह है कि दिन भर उस घर में क्या होता है नही पता क्योंकि दिन भर हम रहते ही, रहते तो रात में भी नही हैं, लेकिन खाना खाने चले जाते हैं। जैसे ही रात के दस बजे के आसपास का समय होता है, दूसरा भाई घर में प्रवेश करता है, पूरी तरह धुत होकर, शराब के नशे में। आते ही वह अपनी पत्नी को भद्दी-भद्दी गालियाँ देना शुरू कर देता है। और गालियाँ भी ऐसी की गोलियाँ भी शर्मा जायें। वह कुछ सेलेक्टेड गालियों को बार-बार दोहराता है और ना जाने कैसी-कैसी आवाजें निकालता है, कभी लगता है कि वह रो रहा है कभी लगता है कि वह हँस रहा है। कभी लगता है कि किसी को मार रहा है और कभी लगता है कि अपने पैर पटक रहा है। उसकी पत्नी की आवाज कभी सुनाई नही देती और ना ही उसके बच्चों की। बस आवाज आती है तो उसके गालियों की, और यह सिलसिला ना जाने कबसे चल रहा है ना जाने कब तक चलेगा। हम सुनते हैं और बस सुनते हैं, कभी-कभी लगता है कि वो कमरा छो़ड़ दिया जाय, शुरु में तो मैं बर्दाश्त ही नही कर पाता था, और लगता था कि कहाँ आ गये हैं हम, कैसे कैसे लोग हैं संसार में। लेकिन धीरे धीरे ये लगने लगा कि क्या हम इस आदमी के रुप में किसी कैरेक्टर का निर्माण कर सकते हैं कि नही, लगा कि हाँ, निर्माण कर सकते हैं। तबसे उसका चीखना चिल्लाना और गालियाँ देना मैंने कैरेक्टर के रूप में लेना शुरु कर दिया, और मेरे कैरेक्टर का निर्माण शुरू हो गया। मैं उसकी गालियों पर ध्यान देता हूँ और समझने की कोशिश करता हूँ। यह शायद मानवता नही है लेकिन एक कोशिश है, इन परिस्थितियों से सबको अवगत कराने की। उस व्यक्ति की पत्नी पर क्या गुजरती होगी, शायद कोई महसूस नही कर सकता। प्रतिदिन शाम को एक मानसिक अत्याचार, स्ट्रेट फारवर्ड कहें तो मेंटल रेप.....। सुबह यदि वो सामने आ जाती है तो उसके चिह्न उसके चेहरे पर साफ दिखाई देते हैं। एक मुरझाया हुआ चेहरा, जिसपर बेबसी और बिखराव की झुर्रियाँ साफ दिखाई दे जाती हैं। उसकी क्या गलती है शायद उसे नही पता। उसके साथ ऐसा क्यों होता है, वह कभी भी नही जान पायेगी। आमतौर पर ऐसी स्थितियाँ उस घर में उत्पन्न होती हैं जहाँ पर आर्थिक, या फिर नैतिक संकट हो, या फिर अशिक्षा भी एक कारण हो सकती है। लेकिन यहाँ पर ऐसा कोई कारण नही है। उसका परिवार संपन्न तो नही फिर भी आराम से घर चल जाता है। सामने दो दुकाने हैं जिनसे अच्छा खासा किराया आ जाता है। पत्नी अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा से निभाती है, लेकिन फिर भी ये सारी घटनाये होती है। क्यों, पता नही क्यों। इन सारी बातों में एक बात बहुत ही अजीब है कि वह व्यक्ति किसी और से बात करते समय पूरी तरह सामान्य रहता है, अगर वह घर में से गाली ही देकर क्यों ना निकला हो। देखने में भी शराबी या फिर गाली बकने वाला नही लगता। कभी-कभी स्वयं ही कहता है जब उसका सामना सर से हो जाता है कि वह रिसर्च कर रहा है। क्या रिसर्च कर रहा है, उसे ही पता होगा। शायद किसी को कितनी बेरहमी से टार्चर किया जा सकता है, उस विषय पर।

क्या उस पत्नी के दुख को महसूस करके उसे कम किया जा सकता है......उत्तर मिले तो अवश्य बतायें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नारी का नारकीय जीवन: कारण

सभ्यता के आदिकाल से ही नारी को दोयम दर्जे का नागरिक मााना जाता रहा है। नाना प्रकार के विकास के बावजूद आज इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भी...