शनिवार, 16 जनवरी 2010

DASTUK....

दे रहीं दस्तक हवायें, अनसुनी अंजान सी,

हो गया वीरान घर है, हर गली सुनसान सी।

खेलती खुशियाँ जहाँ थी, बिन बुलाये हर घड़ी,

आज पसरा है धुँआ, खामोशी है शमशान सी।



दस्तक...

किसी की भी हो सकती है, जाने की, अनजाने की, खुशियों की, गमों की, जीवन की या फिर मृत्यु की भी...। महत्वपूर्ण यह है कि उसके पूर्व का वातावरण क्या रहा है। यदि खुशियाँ दस्तक देती हैं तो उसके पूर्व की घटनायें काफी कुछ उसके विषय में बता देती हैं। इसके अतिरिक्त कुछेक खुशियाँ ऐसी भी होती हैं जिनके आने का पूर्वाभास नही होता और वे एकदम से सामने आ जाती हैं और हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इसी तरह कोई अनजाना सा चेहरा हमारे सामने आ जाता है और हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, और उस अनजाने का प्रभाव हमारे जीवन पर काफी समय तक रहता है।

इस ब्लाग पर कुछ ऐसे ही दस्तकों के विषय में चर्चा होगी, जो हमारे जीवन, हमारे जीवन शैली, हमारे समाज और हमारे देश के दरवाजे पर ना जाने कबसे हो रहे हैं और हम जाने अनजाने में उसके लिये अपने दरवाजे खोल रहे हैं और बंद भी कर रहे हैं।

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