शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

पोस्टर और बच्चे

पोस्टर और बच्चे
अक्टूबर जाने वाला है, नवंबर दस्तक देने वाला है और इसी के साथ मौसम भी अपना मिजाज बदल रहा है। हवा में ठंडक महसूस हो रही है और सुबह-सुबह ओस की हल्की चादर पसर रही है। बदलते हुये मौसम के तेवरों के उलट नेताओं के पसीने छूट रहे हैं क्योंकि निकाय चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चक्रव्यूह का पहला द्वार तोड़ने के लिये संभावित प्रत्याशी हर प्रकार के पैतरें आजमा रहे हैं। सभी अपनी पसंद की पार्टियों से टिकट प्राप्त करने के लिये जिलाध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष  से मिलने की तिकड़म भिड़ा रहे हैं। जिस पार्टी का टिकट गूलर का फूल हो गया है वह है भारतीय जनता पार्टी। एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है और टिकट पर कुंडली मारकर बैठे हुये विभिन्न प्रकार के अध्यक्ष बाजार में आम खरीदने वाली कुशल गृहिणी की भाँति हर दुकान पर जाकर आमों की गुणवत्ता को जाँच परखने की पूरी कोशिश कर रही हैं। आम कितना बड़ा है, कितना पका है, कितना पीला है, कितना लाल है, दवा से पकाया गया है कि डाल का पका है, कब तोड़ा गया है, ताजा है कि पुराना और भी न जाने क्या क्या....। बेचारे आम आजतक इसी गफलत में थे कि बिकने के लिये आम होना ही काफी है। सपने में भी नहीं सोचा था कि क्वालिटी के लिये उनकी परेड भी हो जायेगी। गच्चा खा गये यहीं पर। पानी पी-पी कर कोस रहे थे मोदी के उस सलाहकार पर जिसने उन्हे विदेशों में इतनी यात्राये करवा दी जितनी एक आम आदमी अपने ससुराल के भी नहीं लगाता। मोदी जहाँ गये, अपने आम की मिठास ले गये और देखा देखी पार्टी के कर्ता-धर्ताओं ने आम की गुणवत्ता जाँच करनी शुरू कर दी। इतना तो इन आमों को भी नहीं पता कि कब बौर से बौरा गये और डाली से टूटने की जिद में पेड़ से ही बगावत कर दी।
फिलहाल टिकट चाहे किसी को भी मिले, घमासान अभी से मचा हुआ है। हमारा चुनाव लड़ना किसी पार्टी के टिकट का मोहताज नहीं है, ऐसा समझने वालों ने अभी से रणभेरी बजा दी है। जिसका सबसे पहला असर घरों की दीवारों पर पड़ा है। दीवाली में अच्छा-खासा खर्चा किया घर की रंगाई पुताई में और दुलहन के हाथ की मेंहदी के रंग उतरने से पहले ही दनादन पतरू, कतवारू के पोस्टर दीवार पर चिपक गये मानो सोलह श्रृंगार की हुई किसी नवयुवती के चेहरे पर हैन्डीप्लास्ट चिपका दिया गया हो। बेचारे सीधे-सादे लोग किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते उस दब्बू विद्यार्थी की तरह जो मास्टर साहब से दूसरे द्वारा की गई गलती के लिये धोबी के गदहे जैसे हमेशा धो दिये जाते हों। क्या पता कल इसी में से कोई कस्बे का चेयरमैन हो जाये तो क्या होगा। खैर बड़े तो ठहरे बड़े, हर काम सोच विचारकर करते हैं और करने से पहले फायदे नुकसान का गुणा भाग अवश्य लगा लेते हैं। किन्तु........बच्चों को कौन टाल सकता है, उनको कौन मना कर सकता है और मना करने के बाद वो मानेंगे कि नहीं, इसकी कोई गारन्टी नही है। इधर पोस्टर लगे, उधर बच्चों की टोली ने उसको फाड़ दिया। ऊँची से ऊँची जगह लगा दीजिये, ज्यादातर पोस्टरों की नियति बुरी तरह फटना ही होती है।
अभी मुहल्ले में तड़के सुबह किसी नेताजी का पोस्टर लगा हुआ देखा। ध्यान से देखने पर पता चला कि पोस्टर में चुनाव चिह्न वाली जगह खाली थी। थोड़ा विश्लेषण किया तो लगा कि टिकट तो फाइनल हुआ ही नहीं, शायद इसी वजह से नेताजी ने चुनाव चिह्न वाली गोल जगह खाली छोड़ दी। उनका सारा पोस्टर नीले रंग का था जिससे पता चलता था कि वह किस पार्टी से टिकट की आशा लगाये बैठे हैं। उनकी सोच शायद यह रही कि  जब टिकट फाइनल हो जायेगा तो पार्टी का सिंबल लाकर खाली जगह में फिट कर देंगे, या फिर कुछ और।  खैर पोस्टर उनके भी फटे, असल में सबके फटे।
बच्चों को सबसे ज्यादा मजा पोस्टर में छपे नेताजी की तस्वीर की आँखे निकालने में आता है। अलग-अलग तरीके से निकाली गई तस्वीरों की आँखें बहुत कुछ बयान करती हैं।  मानों इस दुनिया  को देखने के लिये  आँखों की जरूरत ही नहीं है क्योंकि पोस्टर में चेहरा तब भी मुस्कराता रहता है। शायद उसे अपनी निकाली गई आँखों का कोई मलाल नहीं रहता है। वैसे भी पोस्टर की बात थोड़ी देर भूलने के बाद लगता है कि दुनिया में आँख वाले तो ज्यादातर हैं लेकिन दिखाई उनको भी नहीं देता। देखकर भी वो अपनी आँख या तो बन्द कर लेते हैं या अनजान ब जाते हैं। बच्चे कहते हैं कि जरूरत ही क्या है आँख की, जब देखना ही नहीं है या देखकर मुस्करान ही है और संवेदनहीन बनकर दाँत ही दिखाना है तो ऐसी आँख रहे ना रहे, क्या फर्क पड़ता है। आँखे निकाले जाने के बाद पोस्टर के नीचे की दीवार दिखाई देने लगती है जो लाल, पीली और ना जाने किस-किस रंग में रंगी होती  है। ऊपर से इंसान दिखाई एक जैसा देता है लेकिन हकीकत इसके उलट होती है। अंदर ना जाने क्या-क्या छुपाकर रखा है उसने, जाति, धर्म, संप्रदाय, घृणा, नफरत, दक्षिणपंथ, वामपंथ और भी बहुत कुछ। बच्चों को इससे क्या मतलब। उन्हे मजा आता है उन तस्वीरों की आँख निकालने में। फाड़ने में। अपना काम करने के बाद उनके मन में खुशी किलकारी मारने लगती है....अंधा। वह जो नहीं होते हुये भी है....और वह जो होते हुये भी नहीं है। बच्चे इस बात को नहीं समझते और जो समझते हैं वह बच्च नहीं है। पर सबसे बुरी बात कि बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते।

27-10-2017
("दस्तक" सुरेन्द्र पटेल)

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