सोमवार, 23 जुलाई 2012

भारत पाक क्रिकेट मैच, आतंक को एक और न्यौता

जो कौम इतिहास से सबक नही लेती वह मिट जाती है।
26 नवंबर 2008 के आतंकी हमले के बाद जिस क्रिकेट संबंध को पाकिस्तान के साथ अनिश्चितकाल के लिये खत्म कर दिया गया था वह 2012 के जुलाई महीने में बहाल क्यों कर दिया गया, सारे देश के लिये मंथन का विषय है। क्या पाकिस्तान ने आतंकी हमले में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली है। क्या कसाब को उसने पाकिस्तानी नागरिक मान लिया है और इसके साथ ही क्या उसने अपने देश की खुफिया एजेंसी को भारत में आतंकी हमले की तमाम साजिशें रचने के लिये रोक दिया है। क्या पाकिस्तान ने अपने देश में रह रहे कई आतंकवादियों और 1992 के मुंबई हमले के दोषी दाउद इब्राहिम को भारत सौंपने के लिये तैयार हो गया है। कोई बच्चा भी बता सकता है कि नही....इतने सारे सवालों का एक भी जवाब पाकिस्तान ने नहीं दिया, और ना ही उसने किसी भी तरह का कोई सहयोग किया।
तो दूसरा सवाल यह उठता  है कि आखिरकार भारत सरकार ने क्या सोचकर भारत पाक क्रिकेट श्रृंखला को हरी झंडी दी। अगर इजाजत देनी ही थी तो बंदिश लगाने का क्या औचित्य था, और अगर पाकिस्तान पर दबाव बनाना था तो अधर में पड़े हर मामले को सुलझाये बिना रोक क्यो हटाई। ये सारी बातें भारत सरकार की ढुलमुल नीतियों की ओर ईशारा करती हैं जिसके चलते विश्व बिरादरी में उसकी नाक हमेशा नीची ही  रही है। उसकी किसी भी बात को कभी किसी ने गंभीरता से नही लिया। अपने इस फैसले से संप्रग सरकार यह कहकर भी पीछे नही हट सकती कि रोक लगाने का फैसला किसी और सरकार था। शायद अपने इन्ही फैसलों की वजह से हमारी सरकार आतंकवादियों और अन्य गड़बड़ी फैलाने वाले तत्वों को यह संदेश देती रहती है कि फोड़ो, जितना भी बम  फोड़ना है, हमारे कानों के साथ-साथ हमारी हमारी आत्मी भी फट गई है।  हमारे देश के नेता यह नहीं सोचते कि उनके इस प्रकार के फैसलों से उस जनता के ऊपर क्या बीतेगी जिन्होंने इन आतंकवादी हमलों में ना जाने कितने अपनों को खोया है। 
इस फैसले के पीछे भारत का क्रिकेट बोर्ड भी उतना ही दोषी है जितनी कि सरकार। अगर उसके मन में जरा सी भी देशप्रेम की भावना होती तो वह खुद ही सरकार के इस प्रकार के फैसले का विरोध करती। लेकिन यहाँ तो सारा मामला ही उल्टा है, पैसे की चकाचौंध से अंधा विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड पाँच साल के बाद भारत-क्रिकेट मैचों में बरसने वाले धन के बारे में सोच कर ही बावला हुआ जा रहा है। यह ऐसा क्रिकेट बोर्ड है जिसके लिये खिलाड़ियों और देश से बढ़कर पैसा ही सबकुछ है। भारत की जनता अभी भूली नही होगी जब अत्यधिक क्रिकेट खेलने की वजह से भारत के कई खिलाड़ियों का भविष्य ही दाँव पर लग गया। बी सी सी आई के लिये क्रिकेट वह चारागाह है जहाँ भारत के क्रिकेटरों को चराने के बाद उनके दूध के साथ उनकी हड्डी, चमडे इत्यादि का व्यापार करना भी उसके नीतियों में शुमार है।
अत्यधिक क्रिकेट दौरे औऱ आई पी एल की नंगी नाच के बाद अब वक्त है दो देशों के आपसी दुश्मनी, नफरत और इंतकाम की भावना  के साथ आतंकवाद का फायदा उठाने का। बीसीसीआई जैसी प्रोफेशनल संस्था ऐसे सुनहरे वक्त का फायदा उठाने से क्यों चूकेगी।
सबसे ज्यादा दुख की बात तो यह है कि एक वक्त ऐसा आयेगा जब किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर के द्वारा किसी स्टेडियम में बम फोड़ दिया जायेगा और हजारों की संख्या में भारतीय दर्शक मारे जायेंगे, पाकिस्तानी सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेगी कि वह क्रिकेटर कश्मीर की आजादी का समर्थक था औऱ कब उसने आतंकवादियों से हाथ मिला लिया हमें नही पता। और हमारी भारत सरकार...वह क्या करेगी.....पाकिस्तान को एक और निमंत्रण देने की तैयारी।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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