बुधवार, 18 जुलाई 2012

मनमोहन.... एक बेबस सिंह

शायद ही किसी को यह पता हो कि इतनी बेइज्जती और विश्व बिरादरी में इतनी छीछालेदर के बावजूद मनमोहन सिंह किस वजह से प्रधानमंत्री कार्यालय में टिके हुये हैं। हालात तो ऐसे हैं कि पिछले कुछ महीनों के दौरान जिस किसी को भी मन किया उसने मनमोहन सिंह की इज्जत उतार दी। देशी विदेशी संगठनों और अर्थजगत की दिग्गज सर्वेक्षण संस्थाओं ने एक सुर से कहा कि मनमोहन अपनी निर्णय लेने कि क्षमता और आत्मविश्वास....दोनों खो चुके हैं। कुछ दिन पहले टाइम जैसी दिग्गज पत्रिका को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि मनमोहन अपनी साख खो चुके हैं। उसने उन्हे ओवररेटेड अर्थशास्त्री और अंडररेटेड प्रधानमंत्री तक कह डाला। हद तो परसों हो गई जब लंदन के द इंडीपेंडेन्ट अखबार ने मनमोहन को सोनिया की गोद का कुत्ता कह डाला। यह लेख उसने अपनी पत्रिका के आनलाइन संस्करण में डाला था, लेकिन अपनी भयंकर गलती का अहसास होने के तुरंत बाद ही अपनी इस गलती को सुधारकर उसने सोनिया के हाथ की कठपुतली कह डाला। सवाल यह उठता है हमारे प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हों सिंह, आदमी या फिर कुत्ता किसी  को उंगली उठाने का कोई हक नही, खासकर बिना हमारे उंगली उठाये। लेकिन क्या किया जाये पश्चिमी देशों की यह नीति ही रही है कि वह किसी और के उंगली उठाने के पहले ही सामने वाले को उंगली कर देते हैं। इस क्रियाकलाप में सबसे पहले अमेरिका का नाम आता है वह उंगली नही करता बल्कि किसी भी देश का ब.......र ही कर देता है उसके बाद जो कुछ भी बचता है वह उंगली करके उसका चाटुकार इग्लैंड कर देता है। पता नही कि इग्लैण्ड की आधी जनता को यह पता भी है कि नहीं कि कभी अमेरिका उनके देश से निकाले गये लोगों और अपराधियों के लिये निर्वासन स्थल हुआ करता था, लेकिन आज वही निर्वासित और अपराधी लोग इंग्लैण्ड को अपने जूते जैसा समझते हैं। पूछने वाली बात यह है कि हमारा देश यह कब समझेगा।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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