सोमवार, 28 मई 2012

दिल्ली की मेट्रो और उम्मीद की किरण

पिछले तीन सालों में दिल्ली में बहुत सारे बदलाव हुये जिनकी झलक 2012 में मिल रही है। सबसे बड़ा बदलाव मानवीय शक्ति से चलने वाले रिक्शों के किराये में है जो लघभग तीन गुना बढ़ चुका है। सड़कों की लंबाई और चौड़ाई दोनो बढ़ चुकी है। सूरज का तापमान नाकाबिले बर्दाश्त हो चुका है। सूरज की गरमी से तपती सड़कों और सिर पर बरस रहे अंगारों की जलन से सड़क पर दो कदम चलना भी दुश्वार हो चुका है। पैसा बरस रहा है लेकिन इसके साथ ही बढ़ता प्रदूषण जाड़े में दिखाई देने वाले कोहरे  की चादरों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। हरपल धूल से सना आकाश अपने आखों में बरबस ही आ जा रहे आँसुओं को रोकने की कोशिश में असफल हो जा रहा है। ऐसे विरोधाभासी माहौल में कुछ पल सुकून के भी मिल जाते हैं दिल्ली की मैट्रों में।
तीन साल पहले तक मेट्रों का विस्तार ब्लू और येलो लाइन के सीमित से स्टेशनों तक ही था।

लेकिन आज यह दिल्ली की सारी जगहों को जोड़ती है।  येलो और ब्लू लाइनों के अलावा औरेंज लाइन और ग्रीन लाइन भी अस्तित्व में आ चुके हैं जिसके और भी विस्तार की योजना है। दिल्ली की चौड़ी लेकिन जलती हुई सड़कों से हटकर मेट्रो की अत्यंत ही व्यस्त बोगियाँ एक सुकून का अहसास कराती हैं। भीड़ चाहे कितनी भी क्यों ना हो, घुटन का अहसास बिलकुल भी नही होता।

मेट्रों का संचालन, स्टेशन की साफ-सफाई और रख-रखाव, स्टेशन पर कार्यरत अधिकारियो और सुरक्षा कर्मचारियों का व्यवहार और अनुशासन इत्यादि ऐसे पहलू है, जो हमारे देशवासियों औऱ नेताओं, दोनो के लिये नजीर हैं। काश कि सारा देश मेट्रों की तरह ही हो जाता।
दिल्ली के व्यस्त, बेहाल औऱ प्रदूषित वातावरण में दिल्ली की मेट्रो उम्मीद की एक किरण दिखाती तो है।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

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