शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

अन्ना हजारे, ये तो होना ही था


दिल की दबी ख्वाहिश आखिर होठों पे आ गई
उनके सुर्ख चेहरे पे कैसी लाली छा गई।
जो बात ना निकली थी अभी तक जुबान से,
निकली तो इस कदर कि हलचल मचा गई।।

किशन  बाबूराव हजारे....बहुत कम लोग उनके पूरे नाम के बारे में जानते होंगे, लेकिन अन्ना हजारे का पूरा नाम यही है। सामाजिक जीवन में 1978  से ही सक्रिय अन्ना हजारे ने सबसे पहले रालेगन नाम के अपने गाँव को पूरी तरह बदल दिया। उन्होने वहाँ बिजली, पानी और आवागमन के साधनों का विकास करवा के उसे सौर उर्जा के केन्द्र में परिवर्तित कर दिया। 1991 में महाराष्ट्र सरकार का विरोध करते हुये कुछ मंत्रियों के खिलाफ धरने पर बैठे अन्ना हजारे को मानहानि के मुकदमे का सामना भी करना पड़ा जिसके एवज में उन्हे तीन महीने की जेल भी हुई, लेकिन मुरली मनोहर जोशी की वजह से वह जेल से एक दिन बाद ही रिहा हो गये।
http://1.bp.blogspot.com/-SZHLECpYK64/TZ0qJzKD5sI/AAAAAAAAAEQ/rzy2YcwVptY/s1600/05.04.11anna_hajare1%255B1%255D.jpgअन्ना को सबसे बड़ी सफलता मिली 1997 में जब उन्होने सुचना के अधिकार के लिये मुंबई के आजाद मैदान में अपना आंदोलन शुरू किया। 9 अगस्त 2003 को अन्ना हजारे, आजाद मैदान में ही आमरण अनशन पर बैठ गये और 12 दिन तक चले इस अनशन के बाद महाराष्ट्र सरकार को सूचना अधिकार कानून को पास करना पड़ा। शीघ्र ही इस आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया और 12 अक्टुबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना के अधिकार का कानून बनाया।

जिस घटना के बाद अन्ना हजारे को पूरे देश ने जाना वह था लोकपाल विधेयक, जिसके लिये  अन्ना हजारे  5 अप्रैल 2011 को दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने पर बैठ गये।  इस अनशन को शुरुआती दौर में सरकार ने हल्के तौर पे लिया और लेकिन बाद में जनता के द्वारा मिले अपार समर्थन से सरकार सकते में आ गई और 16 अगस्त तक संसद में लोकपाल बिल प्रस्तुत करने का आश्वासन देकर उसने एक समिति का भी गठन किया। अगस्त के मानसून सत्र में जो लोकपाल बिल प्रस्तुत किया गया वह सैद्धांतिक रूप से काफी कमजोर था जिसके विरोध स्वरूप अन्ना हजारे पुनः अनशन पर बैठने की तैयारी करने लगे लेकिन पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया। दिल्ली से बाहर जाने अथव तीन दिनों के अनशन पर राजी न होने पर अन्ना को सात दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पूरे देश में विरोधप्रदर्शन हुये और आखिरकार सरकार को उन्हे रिहा करना ही पड़ा।

वर्तमान में अन्ना हजारे फिर से सुर्खियों में हैं, वजह है उनकी टीम द्वारा राजनीति में प्रवेश के ऐलान। हर किसी के मन में ये सवाल हिलोरें मार रहा है कि 32 सालों के बाद अन्ना हजारे को राजनीति में प्रवेश करने की ऐसी क्या मजबूर आ गई। उनके समर्थक और उनके आलोचक दोनों ही सकते में आ गये हैं। इस घटना के बाद कहीं ना कहीं उनके आलोचकों को उनकी खिंचाई करने का एक मौका जरूर मिल गया है जैसा कि कपिल सिब्बल ने कहा कि- अन्ना और उनकी टीम शुरु से ही राजनीतिक ताकत प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील थी।  यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि कांग्रेस ने ही राजनीतिक ताकत अपने पास रखने का अधिकार प्राप्त कर लिया है। खैर जो भी हो, इस पर गंभीर विमर्श करने की आवश्यकता है कि अन्ना को राजनीति में प्रवेश करने का क्या जरूरत थी। तीन दशकों से भी ज्यादा समय के अपने सामाजिक जीवन के दौरान अन्ना ने विरोध करने का गाँधीवादी तरीका ही अपनाया और उसमें सफल भी रहे। भारत में महात्मा गाँधी के बाद अगर किसी ने अनशन को विरोध का हथियार बनाया तो वे अन्ना हजारे थे। जब वे अपने तरीके से सरकार पर दबाव डाल सकते थे, तो उन्होने विरोध का राजनीतिक रास्ता क्यों अपनाया।

इसकी कई वजहें हो सकती हैं जिसमें प्रमुख है कि, कहीं ना कहीं अन्ना और उनकी टीम को यह लगने लगा है कि  सिस्टम में कोई भी बदलाव सिस्टम से बाहर रहकर नही हो सकता। अनशन और विरोध प्रदर्शन से छोटी-छोटी माँगे ही मनवाई जा सकती हैं लेकिन ऐसा कोई कार्य नही किया जा सकता जो सरकार में आमूलचूल परिवर्तन कर दे। कोई भी ऐसा बदलाव जो सरकार के लिये खतरे की घंटी बन सकता है, वह बदलाव क्यों किया जायेगा। यह सही है कि बिना सिस्टम में बदलाव किये, हमारे देश में किसी भी बदलाव की अपेक्षा करना बेकार है। अन्ना और उनकी टीम यह सोचती है कि सरकार का हिस्सा बनकर वे कुछ ऐसा कर सकते हैं जो जनता की भलाई कर सके। लेकिन इसके साथ ही साथ यह भी सत्य है कि जब उनकी टीम काजल की कोठरी में प्रवेश करेगी तो उसके दामन में भी उसके दाग लगेंगे जरूर, भले ेही वह कितनी भी सावधानी से उसमें प्रवेश क्यों ना करे। राजनीति में प्रवेश करते ही वे उन दागी मंत्रियों के समकक्ष हो जायेंगे जिनपर पहले से ही अनगिनत दाग हैं।

दूसरी प्रमुख वजह है, अन्ना की टीम के अन्य सदस्य। शायद उनमें अन्ना जैसी सहनशक्ति नही है जिसके फलस्वरूप बदलाव के लिये वे लंबे समय तक इंतजार कर सकें। वे अपने द्वारा किये जा रहे कार्यों का फल तुरंत मिलता देखना चाहते हैं जिसका रास्ता उन्हे राजनीति के चौराहे पर ही दिखाई दे रहा है। लेकिन उन्हे यह समझना पड़ेगा कि यह तात्कालिक लाभ वाली वस्तु नही है जिसकी सफलता या असफलता उसके प्राप्त होने में लगे समय पर आधारित है। लंबे सामाजिक बदलाव के लिये इंतजार करना ही पड़ेगा।

कुल मिलाजुलाकर यह आशंका बहुत पहले से जताई जा रही थी कि अन्ना और उनकी टीम राजनीति में प्रवेश  करने का रास्ता तलाश कर रही है। रास्ते पर उन्होने कदम बढ़ा दिये हैं। देखना दिलचस्प होगा कि बढ़े कदम वापस होते हैं कि नही, अगर वापस नही होते, तो कहीं ना कहीं देश को बड़ी क्षति होने वाली है क्योंकि देश शांतिपूर्वक विरोध करने वाला एक जिम्मेदार चेहरा खो देगा।



दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नारी का नारकीय जीवन: कारण

सभ्यता के आदिकाल से ही नारी को दोयम दर्जे का नागरिक मााना जाता रहा है। नाना प्रकार के विकास के बावजूद आज इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भी...