Friday, May 15, 2020

राजा, दूध का तालाब और प्रजा की आज के समय में प्रासंगिकता

मैं आप लोगों को एक कहानी सुनाता हूँ जिसे मैं आमतौर पर अपने विद्यार्थियों को सुनाता हूँ....। बात पुरानी है, जब राजा लोग हुआ करते थे। उनकी प्रजा होती थी। प्रजा को उनका हुक्म मानना पड़ता था। राजा को अक्सर यह बात सालती रहती थी कि वह कोई ऐसा कार्य करे जिससे उसका नाम अमर हो जाये। क्या करे, ऐसी मंत्रणा उसने अपने मंत्रियों से की। मंत्रियों ने रास्ता सुझाया। उन्होने कहा कि महाराज को एक ऐसा तालाब बनवाना चाहिये जो दूध से भरा हो। इस प्रकार का तालाब न देखा गया है न सुना गया है। यकीनन राजा का नाम विश्व भर में प्रसिद्ध हो जायेगा। राजा को बात अच्छी लगी। अगले ही दिन पूरे प्रजा में फरमान सुना दिया गया कि राजा एक ऐसे तालाब का निर्माण करवा रहे हैं जो दूध से भरा होगा। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अमुक दिन को सारी प्रजा को एक लोटा दूध लाकर तालाब में डालना है। इस प्रकार से पूरा तालाब दूध से भर जायेगा। मुनादी करवा दी गयी। निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया। वह दिन भी पास आ गया जब तालाब में एक लोटा दूध डालना था। निर्धारित दिन के पहले एक अहीर जो राजा के राज्य में रहता था और जिसकी विशाल गोशाला थी। वह दूध के व्यापार से काफी धन कमाता था। उसने सोचा कि सभी लोग तो दूध डालेंगे ही, यदि मैं चुपके से प्रातःकाल ही एक लोटा जल डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। मेरा एक लोटा दूध नुकसान होने से बज जायेगा। निर्धारित दिन वह प्रातःकाल उठा और सबसे पहले (अपने समझ से) तालाब में एक लोटा जल डाल आया। दिन में जब राजा तालाब का निरीक्षण करने आया तो उसने क्या देखा। पूरा तालाब जल से भरा था...।दूध की एक बूंद भीं कहीं नहीं दिखाई दे रही थी।
कहानी का वर्तमान संदर्भ बहुत प्रासंगिक है। विद्यालय प्रबंध तंत्र, आनलाइन क्लासेज और अभिभावक..बाकी आप खुद समझदार हैं।
दस्तक सुरेन्द्र पटेल 

Friday, May 8, 2020

21 दिनों का नियम...

आदतें हमारे जीवन का आइना होती हैं। महान व्यक्तियों के जीवन चरित्र पढ़ने से हमें पता चलता है कि उनकी आदतें उनके विकास के आधार स्तंभ रही हैं। अच्छी आदतें हमें अपने जीवन में ऊँचा उठाती हैं तो दूसरी ओर बुरी आदतें हमें जीवन में असफलता की ओर ढ़केलती हैं। एक व्यक्ति जिसका जीवन अनुशासित, नियंत्रित, समायोजित होता है, यकीनन वह एक सफल व्यक्ति होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आदतें हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आमतौर पर यह कहा जाता है कि आदतें हमारे जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही तय हो जाती हैं। किसी व्यक्ति की क्या आदतें होंगी वह बचपन में ही सामने आ जाती हैं। इसीलिये बच्चों को शुरू से ही अच्छी आदतों के प्रति जागरूक बनाया जाता है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि आदतें बदली नहीं जा सकती हैं। क्या बचपन में जो आदतें व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं, उन्हें नहीं बदला जा सकता है। जवाब है कि बिल्कुल नहीं...।
जी हाँ...आदतों को बदला जा सकता है। बुरी आदतों को अच्छी आदतों में परिवर्तित किया जा सकता है। अपना जीवन अपनी आदतों को बदल कर बदला जा सकता है। तो फिर सवाल उठता है कैसे...?
1950 में अमेरिका के एक प्लास्टिक सर्जन ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि एक व्यक्ति जिसके चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी हुई है उसे अपने नये चेहरे के प्रति खुद को समायोजित करने के लिये कम से कम 21 दिनों की जरूरत है। यानि कि वह व्यक्ति अपने बदले चेहरे को 21 दिनों में स्वीकार कर लेगा। शुरू में उसे अपने बदले चेहरे के प्रति असहजता होगी किन्तु धीरे-धीरे उसका मन उसे स्वीकार करेगा  और अंततः 21 दिनों में पूरी तरह स्वीकार कर लेगा।
कुछ वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को नकार दिया। लेकिन इस बात से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। कई सारे रिसर्च इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि कई दिनों की लगातार कोशिशों के जरिये अपनी आदतों को बदला जा सकता है। इसमें कितने दिन लगते हैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। यह पूरी तरह से आपके आत्मविश्वास, संयम, लगन और परिश्रम पर निर्भर करता है।
सबसे बड़ा उदाहरण कोरोना महामारी के बीच भारत में केन्द्र सरकार द्वारा लगाया गया शुरुआती 21 दिनों का शूरुआती लाकडाउन है। सरकार की तरफ से यह कहा गया कि 21 दिनों का समय वायरस की कड़ी तोड़ने के  लिये है, किन्तु वास्तव में यह जनता की आदत बदलने का शुरुआती कदम था। 134 करोड़ की जनता को एकाएक हाल्ट पर नहीं रखा जा सकता था। यह नामुमकिन था। लेकिन कोरोना का डर और 21 दिनों का लंबा समय लोगों के जीवन चर्या को बदलने के लिये जरूरी था। आप देख सकते हैं कि जिस लाकडाउन ने शुरुआती दिनों में लोगों को बहुत तकलीफ दी, धीरे-धीरे लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया। बाद में लाकडाउन को और बढ़ाया गया और अंततः 17 मई तक बढ़ा दिया गया। ्यानि कि कुल 5 हफ्ते से ज्याादा दिनों का लाकडाउन। यह बहुत ज्यादा समय है। भारत जैसे देश जहाँ की आबादी 134 करोड़ के आसपास है, एक महीने से ज्यादा का समय लोगों ने घर के अंदर रहकर बिता दिया। यह आदत बदलने के नियम का सबसे बड़ा उदाहरण है। 
दस्तक सुरेन्द्र पटेल निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Thursday, March 26, 2020

कोरोना का कहर- 21 दिनों का लाकडाउन

साभार-जागरण जोश
19 मार्च को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को संबोधित करते हुये 22 मार्च रविवार को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था। उन्होने कहा था कि हर भारतीय सुबह सात बजे से रात के 9 बजे तक अपने घर में रहे। कोरोना से लड़ने में डाक्टर, नर्सेज, पैरामेडिकल स्टाफ के योगदान की प्रशंसा करते हुये उन्होने कहा कि सभी लोग शाम के 5 बजे अपने घरों के बाहर उन लोगो का अभिवादन ताली, थाली इत्यादि बजाकर करें। 22 मार्च को प्रधानमंत्री के अपीलानुसार सभी भारतीय अपने घर में रहे और शाम को सभी ने कोरोना वीरों का अभिवादन किया।
इन सबके बावजूद रविवार, सोमवार को कोरोना के मरीजों में बढ़ोतरी देखी गयी जिसके बाद प्रधानमंत्री ने मंगलवार रात के आठ बजे जनता को संबोधित करते हुये पूरे भारत में 21 दिनों का लाकडाउन घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि जनता को कोरोना से बचाने के यह कठोर कदम उठाना पड़ा। उन्होने भारतवासियों से अपील किया कि 21 दिनों के लिये सभी अपने घरों में रहे और लाकडाउन का पालन करें।
आज 26 मार्च दिन के 12 बजे तक कोरोना मरीजो की संख्या 665 पहुँच गई है। इनमें से 43 मरीज ठीक हो चुके हैं और 11 मरीजों की मौत हो चुकी है। भारत सरकार और उसकी स्वास्थ्य एजेंसिया दिन-रात एक करके कोशिश कर रही हैं कि कोरोना को स्टेज 2 पर ही रोककर रखा जाय और इसे कम्यूनिटी में फैलने न दिया जाय। हाँलाकि पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया गया है लेकिन भारत जैसे विशाल देश जिसकी जनसंख्या 130 करोड़ के आसपास है, वहाँ एकाएक जनजीवन को हाल्ट पर नही डाला जा सकता। इसलिये पिछले दो दिनों में देश के हर कोने से लोगों द्वारा लाकडाउन के हल्के-फुल्के उल्लंघन की खबरें आ रही हैं। प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आने का ऐलान कर दिया है। पुलिस अपने स्तर से थोड़ी सख्ती बरत भी रही है। सोशल मीडिया पर आने वाले वीडियोज में पुलिस ऐसे लोगों पर लाठियाँ भाँज रही है।
भारत में कोरोना वायरस और बीमारी के बारे में कोई आथेंटिक सूचना स्रोत न होने की वजह से लोग इधर-उधर से कापी पेस्ट की हुई जानकारी सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। इसे देखते हुये सरकार ने एक साइट लांच की है जिसपर कोरोना से संबंधित हर प्रकार की जानकारी मौजूद है।
उपरोक्त साइट पर भारत में कोरोना का हर अपडेट मौजूद है जिसे हर चार घंटे में अपडेट किया जा रहा है। हर भारतीय को चाहिये कि कोरोना से संबंधित जानकारी के लिये इसपर मौजूद जानकारी पर ही भरोसा करें।
लाकडाउन का महत्व-
आज जबकि पूरा विश्व कोरोना के प्रहार से कराह रहा है। भारत कतई नहीं चाहता कि उसकी स्थिति दूसरे देशों जैसी हो। इसके लिये हर प्रयास किये जा रहे हैं। 21 दिनों का लाकडाउन इसी कड़ी में प्रयास है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि यदि हमने इन 21 दिनों में सावधानी नहीं बरती तो भारत मे 21 साल पीछे चला जायेगा। इसलिये हर भारतवासी का यह कर्तव्य है कि वह लाकडाउन का पूरी गंभीरता से पालन करें। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्होने यह फैसला मेडिकल फील्ड के विशेषज्ञों से बातचीत करके लिया है। जिनका कहना था कि कोरोना वायरस को हवा में से पूरी तरह खत्म होने में तीन हफ्ते तक का समय लग सकता है। जिसके मद्देनजर 21 दिनों का लागडाउन घोषित किया गया है।
लाकडाउन से होने वाली परेशानियाँ-
वहीं दूसरी ओर अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि इतने ज्यादा दिनों तक लाकडाउन के समय में भारत में अनेकों प्रकार की परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं-
1-भारत की ज्यादातर जनसंख्या गरीब है जो अपने रोजगार के लिये दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर करती है। लाकडाउन के समय में उनके रोजगार का संकट पैदा हो जायेगा और उन्हे भोजन प्राप्त करने की समस्या उत्पन्न हो जायेगी।
2-भारत की ज्यादातर कामगार जनसंख्या असंगठित क्षेत्र में है। कई महीनों से कारखानों में बंदी की स्थिति है जिससे इन कामगारों की नौकरी जा चुकी है। यह सभी अपने घरों को लौट चुके हैं जहाँ पहले से ही समस्यायें मौजूद है। ऐसे समय में उन्हे अपने घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जायेगा।
3-यह लाकडाउन ऐसे समय में किया गया है जहाँ एक और वायरस का खतरा है तो दूसरी ओर लोगों के घरो में खाने-पीने की चीजों की किल्लत है। ऐसे समय में कानून-व्यवस्था को बनाकर रखना भी बहुत बड़ी चुनौती है। यदि जनता में खाने-पीने की चीजों की किल्लत नाकाबिले बर्दाश्त हद तक हो जाती है तो लूट-पाट की नौबत भी आ सकती है।
आशंकायें-
कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत ने यह लाकडाउन देर से किया है और भारत में कोरोना मरीजों की संख्या में कमी इसलिये देखी जा रही है क्योंकि यहाँ मरीजों का टेस्ट बहुत कम किया गया है। चूँकि भारत में अभी कोरोना टेस्ट किट बहुत स्तरीय नहीं है इसलिये इसकी विश्वसनीयता पर बहुत ज्यादा यकीन भी नहीं किया जा सकता है। कुछ लोगों का विचार है कि अगले 15 मई तक भारत में कोरोना के मरीजों की संख्या कई लाख हो सकती है। कुछ लोग भारत सरकार पर निम्नलिखित सवाल उठा रहे हैं-
1-भारत ने शुरुआती दौर में अपना ध्यान चाइना, नेपाल और जापान जैसे पूर्वी देशों पर ही रखा और पश्चिमी देशों जैसे ब्रिटेन, इटली, फ्रांस इत्यादि से आने वाले यात्रियों पर नजर नहीं रखी। भारत में ज्यादातर कोरोना वायरस के केसेज इन्ही देशों से वापस आये मरीजों द्वारा फैले हैं।
2-भारत में अंतर्राष्ट्रीय विमानों के आवागमन पर रोक बहुत देर बाद लगाई गयी। उस समय तक ज्यादातर लोग वापस आ चुके थे जिनकी वजह से शुरूआती संक्रमण हो चुका था।
3-भारत ने लाकडाउन करने में देर कर दी है।
4-मुंबई, दिल्ली, गुजरात इत्यादि से वापस आने वाली वो कामगार जनसंख्या जो बिना किसी जाँच-पड़ताल और टेस्ट के, वापस अपने घर, राज्य में आ चुकी है, वे कोरोना के सबसे बड़े कैरियर के रूप में हो सकते हैं, जिनकी वजह से बीमारी के फैलने का खतरा सबसे ज्यादा हो सकता है।
अभी तक-

फिलहाल हम प्रार्थना कर सकते हैं कि भारत में कोरोना उस स्तर तक न पहुँचे जहाँ से इसे संभालना नामुमकिन हो जाये। 
दस्तक सुरेन्द्र पटेल निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना का कहर


दिसंबर 2019 के महीने में चीन के वुहान शहर में एक रहस्यमयी साँस की बीमारी ने लोगों को अपने चपेट में लेना शुरु किया। जिस डाक्टर के पास उस बीमारी के मरीज सबसे पहले पहुँचे उसने अपनी सरकार को  इसके बारे में बताया लेकिन किसी ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ दिनों के बाद वह डाक्टर भी उस बीमारी के चपेट में आ गया। उसने एक वीडियो बनाया और इस बीमारी के बारे में लोगों को आगाह किया। स्थिति बिगड़नी शुरू तब हुई जब इस संक्रामक बीमारी ने तेजी से अपना पैर पसारना शुरू किया और देखते ही देखते चीन की एक बड़ी आबादी इस बीमारी के चपेट में आ गई। चीन का वह राज्य जहाँ यह बीमारी सबसे पहले फैली उसका नाम था हुबोई, और शहर था....
वुहान......।
जनवरी आते-आते वुहान में प्रतिदिन सैकड़ों लोग मरने लगे। फरवरी में सरकार ने हुबोई प्रांत को लाकडाउन कर दिया। हमारे यहाँ अखबारों में खबर छपी कि...चीन न अपने राज्य हुबोई को उसके हाल पर छोड़ दिया है और देश के बाकी हिस्सों से उसे काट दिया है, न कोई वहां जा सकता है, और न ही कोई वहाँ से आ सकता है। जब मैंने यह खबर पढ़ी तो हालीवुड फिल्मे जैसे कि डूम्स डे याद आ गई जिसमें रहस्यमयी बीमारी की वजह से एक शहर को बंद कर दिया जाता है।
यह वह समय था जब भारत में हम इन खबरों को मात्र पढ़कर मजाक में उड़ा रहे थे। सोशल मीडिया, व्हाट्सअप, ट्विटर इत्यादि पर चीन की स्थिति का मजाक पर मजाक उड़ाया जा रहा था। मास्क पहने लोगों, अपनी सुरक्षा के लिये विशेष ड्रेस से लैस लोगों पर तमाम कमेंट किये गये। शायद कोई नहीं जानता था कि भारत में भी ऐसी स्थिति जल्द ही आने वाली है।
चीन की यात्रा पर गये लोगों, वहाँ पर पढने के लिये गये छात्रों इत्यादि को जब इस बीमारी के बारे में पता चला तो  उनकी स्थिति चिड़ियाघर में फँसे उस व्यक्ति की भाँति हो गई जिसे अचानक ही पता चला कि चिड़ियाघर में एक नहीं,अनकों शेर पिंजड़ें से बाहर निकल गये हैं और किसी भी वक्त उन्हे अपना शिकार बना सकते है। आनन-फानन में सभी अपने देशों को वापस लौटने लगे और जाने अनजाने में रहस्यमय बीमारी को फैलाने वाले विषाणुओं के लिये कैरियर बनने लगे जिसका नाम था.....
करोना...19
चीन से निकले लोगों ने इस वायरस को विश्व के हर कोने में फैला दिया। सबसे बड़ी मार पड़ी विश्व की महशक्ति यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका पर जिसका बहुत कुछ चीन पर निर्भर करता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इससे बचने की तैयारियों पर ध्यान देने के बजाय चीन को पानी पी-पीकर कोसने लगे। इस बीच कोरोना वायरस अमेरिका के बड़े हिस्से में फैल गया और इसके चपेट मे हजारों लोग आ गये और सैकड़ो लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। वायरस के वजह से सबसे ज्यादा मौते इटली में हुई क्योंकि वहाँ के लोगों ने वायरस की भयावहता को हल्के मे ले लिया। पहले तो सरकार ने सामाजिक दूरी बनाने के आदेश देने में ही काफी देर कर दी, दूसरे लोगों ने इसे सैर सपाटे के अवसर के रूप मे लिया। जब वहाँ की सरकार ने लाकडाउन की घोषणा की तो लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और सपरिवार सार्वजनिक स्थानों पर घूमने के लिये जाने लगे। नतीजन आज की तारीख तक इटली में कोरोना वायरस की वजह से मरने वालो की संख्या 6000 के आसपास पहुँच गई है और हजारों की तादाद में लोग इससे प्रभावित हैं। इसके बाद जहाँ सबसे ज्यादा तबाही फैली है वह देश है ईरान। यहाँ भी मरने वालो की संख्या कई हजार में है। देश की सरकार ने अपने हाथ खड़े कर दिये हैं और तबाही रुकने के लिये जिससे दुआ की जा रही है वह ईश्वर।
इस समय पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं 130 करोड़ की जनसंख्या वाल देश भारत पर जहा वायरस अपने दूसरे स्टेज में पहुँचने के बाद तीसरे स्टेज में पहुँचने के लिये बेताब है और हमारे देश की सरकार, स्वास्थ्य एजेसिया और अधिकांश जनसंख्या उसे वहीं रोकने के लिये जी जान से जुड़ी है। भारत में पहला केस केरल में सामने आया जहाँ वुहान से लौटी एक छात्रा का टेस्ट पाजिटिव पाया गया था। पहला केस सामने आने के बाद आज 24 मार्च को पाजिटिव केसों की सं 500 के पास पहुँच गई है। मरने वालों की संख्या 10 के पास पहुँच गई है। सरकार ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था जो सफलतापूर्वक पूरा हुआ था।। आज देख के 548 जिलों को लाकडाउन कर दिया गया है। पंजाब, महाराष्ट्र में कर्फ्यू लगा दिया गया है। सरकार द्वारा लोगों से घरों में रहने की अपील की जा रही है। न मानने वालों के खिलाफ सख्ती दिखाई जा रही है, मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। आज प्रधानमंत्री दुबारा देशवासियों को संबोधित करने वाले है। संभवतः जनता को अपने घरो में रहने के लिये अपील करेंगे। भारत में सबसे ज्यादा केसेज महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली, उ.प्र., कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश इत्यादि राज्यों में देखा गया है। प्रभावितों की बात करें तो यह भारत के लघभग हर राज्यों में फैल चुका है। उत्तर पूर्व के राज्य अभी इससे बचे हुये थे लेकिन आज मणिपुर में भी एक लड़की प्रभावित पायी गयी है जो हाल ही में ब्रिटेन से वापस आयी है। कुल मिलाजुलाकर अभी स्थिति यह है कि वायरस उन्ही लोगों में पाया गयाहै जो विदेश यात्रा से वापस लौटे हैं अथवा विदेश से वापस आये लोगों के संपर्क में आये हैं। सरकार की कोशिश यही है कि वायरस को इसी स्थिति में रोक दिया जाय अन्य़था स्थिति भयानक हो जायेगी। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें हर मुमकिन कोशिश कर रही है कि वायरस को आम जनता में फैलने से रोका जाय। इसे रोकने के लिये हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम सरकार के दिशा निर्देशो का पालन करें।

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के दौर में एक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी भी कम नहीं है। हमें चाहिये कि हम सरकार के अगले निर्देशों तक अपने घरो में रहें। सार्वजनिक स्थानों पर जाने से बचें। एक दूसरे के संपर्क में न आये। स्थिति की गंभीरता को समझें। इसे मजाक में तो बिल्कुल भी न लें...क्योंकि आप और हम सिर्फ ऐहतियात बरत सकते हैं, वायरस को अपने घरों में प्रवेश करने से रोक सकते हैं....लेकिन उसकी कल्पना बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं कि क्या होगा जब कोरोना-19 आपके और हमारे घरों में प्रवेश कर जायेगा। 
दस्तक सुरेन्द्र पटेल निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Tuesday, June 11, 2019

जानवर बनाम इंसान

भेड़िया के लिए इमेज परिणाम
-दस्तक सुरेन्द्र पटेल
एक व्हाट्स अप ग्रुप में कल पढ़ने को मिला कि...किताबों में पढ़ते थे कि इंसान पहले जानवर था, आज लगता है कि इंसान आज भी जानवर है। ये उद्गार निश्चित तौर पर समाज में बढ़ते अपराध, इंसानियत के गिरते स्तर और आधी दुनिया को दोयम दर्जे का नागरिक मानने इत्यादि की वजह से अस्तित्व में आये होंगे। यह कहना बिल्कुल सही है, और वाकई हर दूसरे, तीसरे दिन होने वाली दर्दनाक वारदातें इनकी गवाह हैं।

जानवर कौन हैं-
निश्चित तौर पर धरती पर पाये जाने वाले वे जीवधारी जो-
1-साँस लेते हैं।
2-वृद्धि करते हैं।
3-भोजन करते हैं, तथा उस भोजन के उपापचय से प्राप्त उर्जा से उनमें विकास होता है, और वे दैनिक गतिविधियाँ करने में सक्षम होते हैं।
4-प्रजनन करते हैं।
5-गति करते हैं।
6-अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत रहते हैं।
उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त वैज्ञानिक शब्दावली में और भी कुछ जोड़ा जा सकता है, चिंतन का विषय यह नहीं है। चिंतन का विषय तो यह है कि मनुष्य कहाँ तक जानवरों के इस विशेषता क्रम में फिट बैठता है।
ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि उपरोक्त सभी गुण मानवों में भी पाये जाते हैें।

मनुष्य कितना जानवर है-
विज्ञान कहता है कि इंसान का विकास जानवरों अर्थात बन्दर से हुआ है। डार्विन के जीवों के विकास का सिद्धान्त स्पष्ट रूप से बताता है कि इंसान के पूर्वज जानवर थे। सवाल यह है कि वर्तमान मनुष्य में अपने पूर्वजों का कितना अंश है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि आज के इंसान में जानवरों का अंश जितना पहले था, उतना आज भी है। तो क्या निष्कर्ष निकाला जाय कि इंसान आज भी जानवर है। विचार करने पर हमें पता चलता है कि इंसान का मस्तिष्क ही वह पैमाना है जिसने इंसान और जानवर को अलग किया है। अपने विकास के क्रम में मनुष्य आज जिस जगह खड़ा है वह शान से कहता है कि उसने सृष्टि में सबसे चोटी पर अपना मुकाम बनाया है जहाँ से सभी जीवधारी निकृष्ट नजर आते हैं।

वे गुण जो इंसान को जानवर बनाते हैं-
जानवरों के संदर्भ में वर्णित उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त बहुत सारी विशेषतायें हैं जो इंसान को जानवरों के क्रम में खड़ा करती हैं-
1-कानून का भय न होना।
2-गरीब, कमजोर, नाबालिग, दिव्यांग, महिलाओं को हेय दृष्टि से देखना।
3-धनबल, शारीरिक बल, राजनीतिक बल इत्यादि का अहंकार, और उसका इस्तेमाल स्वतुष्टिकरण के लिये करना।
4-पराई संपत्ति, स्त्री, ऐश्वर्य और वैभव को देखकर घृणा की आग में जलना।
5-न्याय के लिये आँख के बदले आँख के सिद्धान्त को मानना।
6-इन्द्रियो को सुख का साधन मानना।
निश्चित तौर पर मनुष्य द्वारा किये गये हर अपराध के पीछे जानवरों के उपरोक्त अवगुण ही जिम्मेदार होंगे। ऐसा मेरा मानना है।

जानवर अपनी प्रकृति कैसे छोड़ेगा-
सृष्टि का एक कण भी अपनी प्रकृति नहीं त्याग सकता है। जिस तत्व से जिसकी रचना हुई है, वह प्रकृति उसके अंदर अवश्यंभावी है। इस तरह से तो इंसान में जानवरों वाले गुण हमेशा से विद्यमान रहे हैं तो क्या वह भी अपनी प्रकृति नहीं त्याग सकता। ठोस रूप से देखा जाय तो हाँ, यदि मनुष्य अपने मूल रूप में ही व्यवहार करता रहे तो वह जानवर वाली प्रकृति त्याग ही नहीं सकता। ऐसे तो पूरी सृष्टि जानवरों से ही भर जायेगी और समाज हिंसक हो जायेगा, चारों ओर त्राहि-त्राहि मच जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं है। क्यों?

मनुष्य को यौगिक बनना पड़ेगा-
मनुष्य को पाशविक व्यवहार से ऊपर उठकर मानवोचित व्यवहार करने के लिये अपने अंदर कुछ और गुणो का समावेश करना पड़ेगा। वैज्ञानिक भाषा में कहा जाय तो उसे तत्व से यौगिक बनना पड़ेगा। जानवर तो वह स्वभाव से है ही, इंसान बनने के लिये इंसानी गुणों का समावेश अपने चरित्र में करना पड़ेगा। वह कौन से गुण है जो इंसान को इंसान बनाते हैं, अगले ब्लाग में।
क्रमशः





Friday, June 7, 2019

माया महा ठगनी हम जानी

माया महा ठगनी हम जानी के लिए इमेज परिणाम


दस्तक सुरेन्द्र पटेल

माया महा ठगनी हम जानी।।
तिरगुन फांस लिए कर डोले
बोले मधुरे बानी।।



कबीर दास जी लिखते हैं कि माया, यह जो द्रष्ट स्वरूप है, सब एक भुलावा है, छलावा है, मृगमरीचिका है। इसके पीछे भागने वाला न घर का रहता है न घाट का। घर का इसलिये नहीं रहता क्योंकि घरवाले लात मारकर भगा देते हैं। या फिर भांग खाकर बौराये भंगेड़ी की तरह मनुष्य ही घरवालों को लात मारकर भगा देता है। दोनो ही सूरतों में उसके आगे पीछे कोई नहीं रह जाता है। कहावतों में इसे कहा जाता है कि आगे नाथ न पीछे पगाह। 

ठगनी तो यह इस कदर है कि मनुष्य का सारा वैभव, ऐश्वर्य, यश, मान, संपत्ति लेने के बाद भी यह बडे़ ही भोलेपन के साथ कहती है कि भई हमने तो तुम्हारा साथ निभाने की बड़ी ही कोशिश की, तु्म्हारी तरफ से ही कमियाँ रह गई, सो अब हमारा तुम्हारा निबाह होने से रहा। भई अपना रास्ता हमने देख लिया, तुम भी सोध लो, तो भला हो।
इसके डोरे डालने की कहानी भी बड़ी विचित्र है। तरह तरह के प्रलोभन देकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है, मसलन, कभी रूपये पैसे से, कभी शानो शौकत से, कभी रूप से, और कभी-कभी तो राजनीति से भी। कहा जाता है कि राजनेता भारत देश में सबसे पहुँची हुई चीज हैं, उनके आगे देवता भी पानी माँगते हैं। जब इस विरले किस्म के लोग माया के चक्कर मेें फंसकर अपनी लुटिया डुबा लेते हैं तो बात बड़ी ही गंभीर हो जाती है। 


जानने के बाद भी-

लेखक अपने सभी शुभचिंतको, मित्रों और जान पहचान वाले लोगों से एक मार्के वाली बात हमेशा कहता है कि- साँप पालो, बिच्छू पालो कभी कभी तो शेर भी पाल लो, पर भइया भूल के भी कभी खुशफहमी मत पालो। 
खुशफहमी पालने वाला मनुष्य इसी प्रकार माया के चक्कर में फंसता है और अपना राम नाम सत्य करा लेता है। सवाल यह है कि जानने के बाद भी कि माया कभी किसी की नहीं हुई, यहाँ तक कि उसकी भी नहीं जिसने कभी उसका चीर हरण होने से बचाया था तो साधारण से एक बालक की क्योंकर होगी। वह बालक जिसे जन्म से ही माया के बारे में ठसक-ठसक कर बताया गया हो। 


बाप बड़ा ना भाई-जग में हुई हसाँई-

माया के पीछे भागते-भागते कब सबकुछ पीछे छूट गया बेचारे मनुष्य को पता ही नहीं चला। 
किया किनारे चाचा को, पापा दूर हटाय।
कुर्सी खातिर ना जाने कितनों को लतियाय।।
अब हालत यह है कि जहाँ से चले थे लाला, वहीं आकर हो गये खडे, पाँच साल में क्या खोया, पता नहीं, क्या पाया, भूल गया। 
माया का प्रभाव तो बढ़ता ही रहता है। आज यहाँ, कल वहाँ, परसों जहाँ-तहाँ।

Monday, June 3, 2019

राहुल गाँधी और 21वीं सदी का ब्रिटिश काल

दैनिक जागरण में 2 जून को छपी खबर

-दस्तक सुरेन्द्र पटेल
जहाँ आग जलती है, धूँआ वहीं से उठता दिखाई देता है।
राहुल गाँधी का दूसरा नाम पप्पू ऐसे ही नहीं पड़ गया। वो पप्पू जो सा.... कभी डांस नहीं कर सकता। वो पप्पू जो कभी पास नहीं हो सकता। वो पप्पू जो कहता कुछ और है, और मतलब उसका कुछ और निकल जाता है। राहुल गाँधी के वक्तव्य और व्यक्तित्व की यही पहचान है। बात चाहे संसद में आँख मारने की हो, प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाना हो, आलू से सोना बनाना हो, राहुल गाँधी कुछ भी कह दें, भारत को हँसने का एक मौका तो मिल ही जाता है।
ताजातरीन उदाहरण उनके एक और वक्तव्य के बारे में हैं जिसमें उन्होने 1 जून को कहा कि भारत में मौजूदा हालात ब्रिटिशकाल जैसे हैं।

राहुल गाँधी की तुलना कांग्रेस बनाम ब्रिटिशकाल-
हाल ही में भारत में सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुये और परिणाम कांग्रेस और सहयोगी दलों के खिलाफ गया। क्यों गया बजाय इस पर मंथन करने के कांग्रेस और राहुल गाँधी तरह तरह सवाल उठाते रहे। कभी ई वी एम, तो कभी चुनाव आयोग, कभी जनता को  दोष मढ़ने के बाद राहुल गाँधा ने अब कहा है कि कांग्रेस के समय ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई है। वह ब्रिटिश काल जब उसके सदस्य लेजेस्टिव काउंसिल में बहुत कम हुआ करते थे, और उन्हे सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिये काउंसिल में लड़ना पड़ता था।  इसके अलावा उन्होने यह भी कहा कि संसद में उनके 52 सदस्य भाजपा 300 से ज्यादा सदस्यों के लिये काफी हैं। एक एक इंच के लिये कांग्रेस के सदस्य अपनी जान लड़ा देंगे।

क्या वाकई भारत में ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ हैं-
राहुल गाँधी के बयान पर यदि गौर किया जाय तो निम्नलिखित सवाल जेहन में आते हैं-
1-15 अगस्त 1947 में आजादी के बाद भारत में  72 सालों में लगातार सत्रहवीं बार लोकसभा के चुनाव संपन्न हुये हैं जिसमें भारत की जनता को उसके द्वारा चुनी हुई सरकार की प्राप्ति हुई है। ब्रिटिश काल में ऐसा नहीं था। सांवैधानिक सुधारों के बाद भारतीय प्रतिनिधित्व मिलने के बाद भी चुने हुये सदस्यों को यह अधिकार नहीं था कि वे वायसराय के बनाये हुये कानूनों में कोई फेरबदल कर दें। सीधे तौर पर कह सकते हैं कि भारतीय प्रतिनिधित्व हाथी के दाँत की तरह था।
2-अगर राहुल गाँधी के बयान को कुछ देर के लिये मान भी लिया जाय तो ब्रिटिश काल में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुन कर काउंसिल में भेजती थी जो उनका प्रतिनिधित्व करते थे। वर्तमान में वैसी परिस्थितियाँ अगर सामने हैं तो जनता ने कांग्रेस को सिरे से खारिज क्यों कर दिया। यदि कांग्रेज ने भारतीय जनता की नुमाँइदगी की मोनोपाली 1885 से ही ले रखी है ( जो सिर्फ उसे लगता है) तो जवाहर लाल नेहरू के बाद कांग्रेस को हर चुनाव में हाँथ पाँव क्यों मारने पड़ते है। यह कहानी राजीव गाँधी तक तो किसी तरह चली लेकिन आज कांग्रेस की क्या हालत है, पूरी दुनिया जानती है। कांग्रेस यह समझने के लिये क्यों तैयार नहीं।
3-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ वाकई सामने होती तो जनता सरकार के खिलाफ बगावत क्यों नहीं कर रही है। सरकार कैसी भी हो, पाँच साल में उसे अपना हिसाब देना ही पड़ता है, लेकिन इस बार तो सारे रिकार्ड टूट गये। जब जवाहर लाल नेहरू के बाद पहली बार किसी पार्टी ने अपने दम पर दूबारा सत्ता में वापसी की है।
4-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ सामने है, तो तथाकथित महागंठबंधन में कांग्रेस को साथ क्यों नहीं लिया गया। सभी को एक साथ  मिलकर ब्रिटिशकाल से लोहा लेने के लिये तैयार हो जाना चाहिये था।
राहुल गाँधी को चुनाव प्रचार के दौरान अपने एक बयान की वजह से सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप से माफी भी माँगनी पड़ी थी। अगर वो ऐसा नहीं करते तो शायद उन्हे जेल की हवा भी खानी पड़ सकती थी।

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे-
हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जिस प्रकार शुतुरमुर्ग शिकारी को देखकर अपनी गर्दन रेत में डाल लेता है। यह समझते हुये कि शिकारी उसे नहीं देख रहा है। कांग्रेस और राहुल गाँधी का बर्ताव ठीक उसी प्रकार है। ई वी एम-ई वी एम चिल्लाने पर चुनाव आयोग सख्त हुआ तो अपनी झुंझलाहट उतारने के लिये राहुल गाँधी नया पैंतरा आजमा रहे हैं। ठीक यही हालत 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुई थी जब कांग्रेस अपनी हार की वजहों को ढू़ढने के बजाय सारा दोष दूसरों पर मढ़ने पर आमादा थी। इस बार भी नतीजा वही है, और राहुल गाँधी का रवैया भी।

संसद में लड़ने के बजाय जनता के बीच जायें-
राहुल गाँधी अगले चुनाव में अगर कांग्रसे का अस्तित्व खत्म होने से बचाना चाहते हैं, तो उन्हे संसद में हल्ला गुल्ला मचाने के बजाय जनता के बीच में जाना चाहिये। बुनियादी काम करने चाहिये। लोगों को यह संदेश देना चाहिये कि वह महज मनोरंजन की वस्तु नहीं बल्कि भारत की चिंताओं को समझने वाले राजनेता है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध संसद में नहीं बल्कि आम जनता के बीच में करना चाहिये।

छुट्टियाँ कैसिल करके काम पर लग जायें-
जहाँ तक संभावना है, राहुल गाँधी छुट्टियाँ मनाने के लिये विदेश जरूर जायेंगे। लेकिन उन्हे ऐसा नहीं करना चाहिये। छुट्टियाँ तो और भी मन जायेंगी, लेकिन ये पाँच साल अगर फिर भाजपा को कोसने में लगा दिया तो कांग्रेस का क्या होगा, कल्पना से परे होगा।
सबसे दुखद भारत के लिये होगा, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सबसे बड़ी है। काश राहुल गाँधी ऐसा कर सकते।


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