Wednesday, April 19, 2017

कमरा(कहानी)

कमरा
डा. साहब बड़े परेशान थे। तीस साल से ज्यादा समय हो गया था उन्हे राजाराम मार्ग पर अपना क्लिनिक खोले हुये। उस समय वहाँ बिजली तो क्या चलने लायक सड़क भी नहीं थी। गर्मी के मारे बुरा हाल होता था और हवा के लिये हाथ का पंखा ही एकमात्र सहारा था। कस्बे में जब डा. साहब दलित-पिछड़ी राजनीतिक चेतना के अग्रदूत बनकर उभरे तब यही क्लिनिक उनके राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र भी बन गया। धीरे-धीरे मरीजों की संख्या कम होती गई और फरियादियों की भीड़ बढ़ने लगी। गाहे-बगाहे मकान मालिक रज्जन मिश्रा से इस बारे में दो-चार बातें भी हो गईं। डा. साहब ठहरे बुद्धिजीवी, अपने किराये के दम पर उन्होने रज्जन मिश्रा की बातों पर कान देना मुनासिब नहीं समझा और गच्चा खा गये यहीं पर। अक्टूबर के महीने में मिश्रा जी ने नोटिस दे दिया कि कमरा खाली कर दिया जाय अब वह बेटे के लिये आफिस की तरह इस्तेमाल होगा। दशहरे दीपावली के शुभ अवसर पर डा. साहब को यह खबर रावण के जिन्दा हो जाने या फिर राम के अयोध्या से निर्वासित हो जाने से कम नहीं लगी। हाँलाकि वह पौराणिक गाथाओं को कपोल-कल्पित कहानियों और देवी-देवताओं को उनके नायक और नायिकाओं से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। उनकी नजर में यह सब समाज की पिछड़ी और दलित जातियों को बरगलाने के पुराने तरीके से ज्यादा कुछ नहीं था फिर भी कमरा खाली करना उन्हे राम के वनवास जाने जैसा ही महसूस हुआ।
डा. साहब कहाँ दीपावली के अवसर पर क्लिनिक की सफाई रंग-रोगन, सजावट इत्यादि की योजनाओं में व्यस्त थे कहाँ उसे खाली करने की नौबत आ गई। एक बार दिमाग में आया कि कोर्ट में केस कर दें, फिर खयाल आया कि लोग क्या कहेंगे। भले मानुस की तरह उन्होने उसी रोड पर दूसरा कमरा देखना शुरू कर दिया। किराये के मकान को छोड़ना जितना आसान है उतना ही कठिन दूसरा मकान ढूँढना है यह बात डा. साहब को अब जाकर समझ में आई। कई दिनों तक पूरे रोड की खाक छान मारी लेकिन कोई कमरा नहीं मिला। एक दिन टहलते-टहलते वह कुछ आगे बढ़ आये तो नजर आया कि एक फोटो स्टूडियो की दुकान जो उनके किसी जानने वाले की थी बंद पड़ी थी। पता किया तो मालूम हुआ की दुकान कई दिनों से बंद है। कारण के बारे में कुछ स्पष्ट पता तो नहीं चला लेकिन उड़ती हुई खबर मिली की शायद दुकान बंद होने वाली है। सड़क पर खड़े-खड़े उन्होने तुरंत उस सज्जन को काल किया। फोन कनेक्ट हुआ और उधर से आपरेटर की आवाज आई।
“थैंक्यू फार कालिंग मिस्टर राजू गुप्ता प्लीज वेट अनटिल योर काल इज बीइंग आन्सर्ड”
जब तक फोन उठा नहीं तब तक ये आवाज उनके कान में गूँजती रही और वह यह सोचते रहे कि आदमी दिखावे के लिये क्या-क्या नहीं करता है। फोन करने वाले को वह अपना नाम बार-बार सुनवाने से भी परहेज नहीं करता है। खैर कुछ देर बाद फोन उठा और उधर से आवाज आई-
“नमस्कार डा. साहब, कैसे हैं”
डा. साहब को समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दें। आमतौर पर वो अभिवादन के लिये जय मूलनिवासी बोलते थे, लेकिन परिस्थितियों से उत्पन्न हुई परेशानियों की बदौलत सामान्य तरीके से कुछ कह पाना उनके लिये मुमकिन ना हुआ।
“नमस्कार गुप्ता जी...ठीक हूँ...एक बात पूछनी थी”
“पूछिये”
आपकी दुकान कई दिनों से बन्द है। क्या बात है?
डा. साहब ने ऐस पूछा जैसे उन्हे कोई काम करवाना है। वैसे आये दिन उन्हे कुछ न कुछ टाइप कराने, डिजाइन कराने या फिर आडियो प्रचार कराने के लिये राजू गुप्ता की दुकान पर जाना पड़ता था। ये बात और थी कि पैसे अदा करने के मामले में वो थोड़ा कच्चे थे। गुप्ता की दुकान पर आज तक उनका हिसाब क्लीयर नही हुआ था। यही कारण था कि गुप्ता जान-बूझकर उनके कार्य को वेटिंग लिस्ट में रखना पसंद करता था।
कहिये कोई काम था क्या।
गुप्ता ने उत्सुकता से पूछा तो डा. साहब को आश्चर्य हुआ वरना उसकी आवाज में खराश से उनकी पहचान पुरानी थी।
कोई काम तो नहीं था, बस यही पूछना था कि आपकी दुकान कई दिनों से बन्द है क्या बात है।
राजू समझ नहीं पाया कि डा. साहब उसकी दुकान बन्द होने से परेशान है या फिर खुश। परेशानी वाली बात उसके समझ में आती थी क्योंकि और किसी दुकान पर उनका काम इतनी जल्दी और कम कीमत में तो होने से रहा। लेकिन उनके आवाज में खुशी की हल्की सी खुशबू कुछ और भी इशारा कर रही थी।
हाँ मैने दुकान बन्द कर दी है।
क्यों
दिल्ली जाने का प्लान बना लिया है। अब यहाँ करने के लिये कुछ बचा नहीं इसलिये वापस दिल्ली जा रहा हूँ।
दुकान का क्या होगा।
उसकी चाभी वापस मकान मालिक को दे दी है।
मकान मालिक का क्या नाम है।
शिवशंकर पटेल। मेरे मुहल्ले के ही हैं। वैसे आप क्यों पूछ रहे हैं।
यह कमरा मुझे चाहिये। मेरा पुराना कमरा मालिक वापस ले रहा है।
तो पहले बताया होता। अब तो यह कमरा उठ गया है।
क्या...कब
कुछ दिन पहले ही। मकान मालिक के रिश्तेदार ही यह कमरा ले रहे हैं।
मुझे दे दिया होता आपने।
मुझे कैसे पता होता डा. साहब कि आपको यह कमरा चाहिये। वैसे भी यह बात तो आपको मालिक से करनी चाहिये। मैं कौन होता हूँ कमरा किराये पर उठाने वाला।
ठीक है मैं उन्ही से बात कर लेता हूँ। फिलहाल ये दुकान अभी खुल तो नहीं रही है।
मुझे ठीक से नही पता। इस बारे में आप उन्ही से बात करें तो बेहतर है।
कहकर गुप्ता ने फोन काट दिया और इधर डा. साहब ईश्वर से दुआ करने लगे कि यह कमरा उन्हे मिल जाये।
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अगले दिन डा. साहब अपने क्लिनिक पर विचार की मुद्रा में बैठे थे ठीक उसी समय उनके सामने वाली दुकान में लेडिज टेलरिंग की दुकान चलाने वाला मास्टर उनके पास आया। सब लोग उसे मास्टर ही कहते थे और आजकल वह डा. साहब के क्लीनिक पर थोड़ा से कुछ ज्यादा आता जाता था। आते ही उसने हाथ उठाकर सलाम ठोंका।
कैसे हैं डा. साहब।
डा. साहब ने सिर उठाया तो मास्टर की तंबाकू चबाने से काली हो चुकी बतीसी दिखाई दी।
ठीक ही हैं मास्टर तुम बताओ। वीजा का इंतजाम हो गया।
मास्टर सउदी जाने वाला था जैसा कि उसने उन्हे बताया था। उसने यह भी बताया था कि सउदी जाने के बाद उसकी टेलरिंग की दुकान खाली हो जायेगी और डा. साहब उसे ले सकते हैं। हाँलाकि वह मकान कच्चे ईंटों का था और बिजली पानी के साथ अन्य सुविधायें सरकारी योजनाओं की तरह बाट जोह रही थीं। डा. साहब ने उस कमरे को बैक-प्लान की तरह रखा हुआ था।
इंतजाम तो हो गया बस टिकट निकल जाये। आप बताइये कमरे का क्या हुआ।
हुआ क्या...एक जगह खाली तो हुई थी, लेकिन किसी की नजर मुझसे पहले पड़ गई और वह कमरा भी उठ गया। अब तो लगता है कि तुम्हारे कमरे में ही शिफ्ट होना पड़ेगा।
तो क्या बुरा है। घर भले ही पुराना सही लेकिन थोडा मेन्टेन करवा देने पर चकाचक हो जायेगा। इससे बड़ी जगह है, आपका क्लिनिक भी सेट हो जायेगा और आने जाने वाले लोगों के बैठने के लिये आफिस भी बन जायेगा। खामख्वाह परेशान हो रहे हैं आप।
ठीक कहते हो...इस कमरे के चक्कर में पार्टी की मीटिंग कैंसिल करनी पड़ी, लखनऊ जाना था, वह भी नहीं हो पाया। अगर कुछ दिन और चक्कर लगाना पड़ा तो और भी काम रूक जायेंगे। सोचता हूँ जो मिल जाये उसी से काम चला लिया जाय।
तो इसमें बुराई क्या है। अच्छी भली जगह है। मैं आज ही मालिक से बात करता हूँ।
इस मतलबी दुनिया में डा. साहब को मास्टर ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति नजर आ रहा था जो उनके साथ था। लिहाजा उन्होने उससे वादा किया था कि भविष्य में यदि उसे या उसके परिवार को किसी भी प्रकार के मदद की आवश्यकता हुई तो डा. साहब अविलंब उसकी सहायता करेंगे।
और बताओ तुम्हारे बेटे का क्या हालचाल है।
ठीक है। डाक्टर ने कहा है कि उसे आराम करने की जरूरत है। बीमारी की वजह से उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया है और ताकत आने में वक्त लगेगा।
मास्टर का एक ही बेटा था। कुछ महीने पहले उसे बुखार आने लगा था जो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। इसके साथ ही साथ उसकी भूख भी कम हो गई थी जिसकी वजह से उसकी वजन बड़ी तेजी से कम हो होने लगा। कई डाक्टरों को दिखाने के बाद भी जब कोई नतीजा नहीं निकला तो डा. साहब ने उसे जिला अस्पताल के टी.बी. क्लिनिक में भेज दिया। वहाँ से भी कुछ संतोषजनक परिणाम नहीं निकला लेकिन ट्रायल बेस पर डाट्स का कोर्स चलने लगा। थोड़े दिनों में बुखार की परेशानी दूर हो गई लेकिन उसका वजन कम होना जारी रहा। बाद में खून की जाँच हुई तो पता चला कि उसका हीमोग्लोबीन कम हो गया था। डा. साहब की सलाह पर उसे खून बढ़ाने के लिये अच्छी खुराक दी जाने लगी। इसी बीच मास्टर ने तय कर लिया कि उसे सउदी जाना है। वहाँ से वह रियाल कमाकर अपने घर भेजेगा और उसके परिवार का पालन-पोषण बेहतर तरीके से हो सकेगा।
ठीक हो जायेगा वह...बस खान-पान पर ध्यान देना पड़ेगा।
आपने बड़ी मदद की है। आपका एहसान कभी नहीं भूलूंगा।
मास्टर ने कृतज्ञता जताते हुये कहा। मैं आज ही अपने मकान मालिक से आपके बारे में बात करता हूँ।
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राधेश्याम तिवारी के घर पर कुछ लोग आये थे। कोई गंभीर बात-चीत चल रही थी ठीक उसी समय मास्टर कमरे में आया। राधेश्याम तिवारी उसी मकान के मालिक थे जिसमें मास्टर की दुकान थी। मास्टर को देखते ही राधेश्याम में खुश होकर कहा।
मास्टर ये लोग रामपुर से आये हैं। बीस लाख देने के लिये कह रहे हैं।
क्या बात करते हैं तिवारी जी..बीस लाख..मछली बेचने के लिये बाजार में नहीं बैठे हैं कि सड़ जायेगी और फेंकनी पड़ेगी। मौके की जमीन है...घर है...पचीस लाख देने के लिये तो कितने लोग तैयार हैं। आज ही यादव जी से बात हुई है, वो सत्ताइस देने के लिये तैयार हैं।
मकान कच्चा है तिवारी जी, और किसी काम का नही कुछ भी बनाने से पहले उसे गिराना जरूरी होगा। वैसे भी मकान के साथ बैनामा कराना ज्यादा मँहगा पड़ेगा।
एक आदमी जो खरीददार प्रतीत हो रहा था बोल पड़ा।
देखिये गुप्ता जी हमें इससे फर्क नहीं पड़ता कि मकान के साथ बैनामा होगा या मकान के बिना बैनामा होगा। सत्ताइस लाख कीमत जमीन की लगी है। छह डिस्मिल जमीन मेन रोड पर, इससे सस्ती तो मिल ही नहीं सकती। और अगर आपको कीमत ज्यादा लग रही हौ तो जमीने और भी हैं पर खरीददारों से भी दुनिया खाली नहीं है। आप कोई और जमीन देख लीजिये। मैं पचीस लाख से कम में जमीन नहीं बेचूंगा।
यह सुनकर गुप्ता और उसके साथ आये हुये लोग उठकर चल दिये। उनके जाने के बाद मास्टर तिवारी के साथ बैठते हुये बोला-
मैंने जमीन का सौदा यादव से सत्ताइस लाख में तय कर दिया है। आपको पचीस लाख चाहिये लेकिन आप यादव से इसकी कीमत सत्ताइस लाख बतायेंगे बाकी के दो लाख मेरा कमीशन होगा।
मुझसे इससे कोई मतलब नहीं कि तुम इसे कितने में बिकवाते हो...मुझे अपने पचीस लाख से मतलब है।
ठीक है...बाकी काम आप मुझपर छोड़ दीजिये।
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डा. साहब कुछ काम से अपने गाँव गये थे। कोई पारिवारिक मामला था जो बड़ी मुश्किल से सुलझ सका था। वापस आने पर उन्होने देखा कि
जिस मकान में उन्होने अपना क्लिनिक खोलने का सपना देखा था वह तो जमींदोज हो चुका था। मजदूर वहाँ से ईंट मिट्टी हटाने में लगे थे। यादव वहाँ कुछ आदमियों के साथ खड़ा था। उनमें से एक ईंजीनियर जैसा लग रहा था और वह यादव को कुछ बता रहा था। डा. साहब यादव के पास गये और यादव से घबराते हुये बोले-
ये मकान क्यों गिरा दिया गया।
क्यों गिरा दिया गया मतलब...मुझे इसकी जरूरत नहीं थी इसलिये गिरवा दिया। वैसे आप कौन हैं यह पूछने वाले।
यादव ने घूरने वाली नजरों से देखते हुये डा. साहब से पूछा।
मैं डा. मनोहर गौतम हूँ। सामने वाली क्लीनिक मेरी है। मेरी मकान मालिक से इस घर को किराये पर लेने की बात हुई थी।
हुई होगी...पर मैने यह जमीन खरीद ली है।
यादव ने लापरवाही से कहा। डा. साहब के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह निराश होकर वहाँ से अपने क्लीनिक चले आये। कुर्सी पर बैठकर वह विचार करने लगे कि अब क्या किया जाये। इतनी जल्दी तो कोई कमरा मिलने से रहा तो इस हालत में एक ही सूरत बचती है कि रज्जन मिश्रा से कुछ दिनों की मोहलत और ली जाय ताकि किसी और कमरे का इंतजाम हो सके। इसी बीच उन्हे मास्टर का खयाल आया शायद वह उनकी कोई मदद कर दे। यह सोचकर उन्होने उसे फोन मिलाया लेकिन उसका फोन नाट रिचेबल था। उसके घर जाकर कुछ पता चले यह सोचकर वह क्लिनिक से बाहर निकले और दरवाजा लाक करके उसके घर की ओर चल दिये। मास्टर का घर कस्बे में दूसरी ओर था जिसे दौलतपुरा कहते थे। वहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा थी और अधिकांश आदमी सउदी में कमाने के लिये देश से बाहर थे। डा. साहब चलते हुये सोच रहे थे कि शायद यही वजह है कि मास्टर भी सउदी जाने के लिये इतना उतावला है। रियाल में तनख्वाह मिलती है। भले ही वहाँ के लिहाज से बहुत कम हो पर रूपयों में बदलने के बाद उसका भाव बढ़ जाता है। चलते-चलते वह मास्टर के घर पर पहुँचे। कोई दिखा नहीं तो उन्होने आवाज लगाई जिसे सुनकर उसका लड़का बाहर निकला। देखने में वह पहले से ठीक-ठाक नजर आ रहा था लेकिन कमजोरी अभी भी बनी हुई थी।
तुम्हारे अब्बा कहाँ है बेटा।
डा. साहब ने उससे पूछा।
बड़े शहर गये हैं। अम्मी कह रही थी कुछ सामान लाना था।
डा. साहब अनुमान नहीं लगा सके कि कौन सा सामान लाने के लिये मास्टर बड़े शहर गया है। अगले कुछ दिनों में वह सउदी जाने वाला है तो इस समय उसे किस सामान की जरूरत पड़ गई।
कब तक आयेंगे वह।
पता नहीं, कल परसों तक आ जायेंगे।
ठीक है आयेंगे तो बता देना कि डा. साहब आये थे।
कहकर डा. साहब वापस हो लिये। कुल मिला-जुलाकर तीसों साल पुराना स्थान उनसे छूटने वाला था। उससे दूर होने का गम उतना ज्यादा नहीं था जितना कि इस बात का कि उन्हे उस पुरानी सड़क पर क्लिनिक के लिये एक कमरा नहीं मिल सका। परिवर्तन संसार का नियम है और यह वैज्ञानिक भी है। इस बात को उनके जैसा भौतिकतावादी व्यक्ति भली-भाँति समझता था लेकिन परिवर्तन के समय होने वाले विस्थापन का एक नई अवस्था तक पहुँचना भी उतना ही आवश्यक था। इस नियम की सार्थकता तभी थी। विचारों के इसी भँवर में डूबते-उतराते कब वह अपने क्लीनिक पर पहुँच गये उन्हे पता ही नहीं चला। और जब क्लीनिक पर नजर गई तो उन्होने दरवाजे पर रज्जन मिश्रा को खड़े पाया। उन्हे देखते ही वह दाँत दिखाते हुये उनके पास आया।
अच्छा हुआ आप आ गये डा. साहब। आपका ही इन्तजार हो रहा था। कमरा खाली करने की दी हुई तारीख आज समाप्त हो चुकी है इसलिये आज आप अपना सामान निकाल लें तो बहुत कृपा होगी।
कमरा आपका है मिश्रा जी। जब चाहें खाली करवा लीजिये लेकिन आपका बेटा तो अगले महीने आने वाला है ना। फिर इतनी जल्दी क्यों।
वो क्या है ना कि कमरे को उसके हिसाब से थोड़ा सा मेन्टेन कराना है।
रज्जन मिश्रा ने हाथ मलते हुये कहा।
अब देखिये ना आपने इतना सारा रैक लगाया है। कई सालों से कमरे में पेन्ट नहीं लगा है। सारा कुछ कराने में टाइम तो लग ही जायेगा। खैर आप बताइये कमरा कहीं मिला कि नहीं।
मिला तो नहीं खैर कहीं ना कहीं तो इंतजाम हो ही जायेगा। रही इस कमरे की बात तो कल यह खाली हो जायेगा।
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कमरा खाली करने के कुछ दिनों के बाद डा. साहब किसी काम से राजाराम मार्ग पर आये तो देखा कि उस कमरे में अनारकली लेडीज टेलर नाम की दुकान खुल चुकी है। उत्सुकतावश वह उस दुकान में गये तो मालिक की कुर्सी पर मास्टर को बैठे पाया। यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर मास्टर उन्हे देखते ही खड़ा हो गया और नमस्ते करते हुये बोला-
आइये-आइये डा. साहब...तशरीफ लाइये। बड़े दिनों के बाद इधर नजर आये हैं।
डा. साहब दुकान के अन्दर नही गये। बाहर ही खड़े रहे। मास्टर खुद ही बाहर आ गया और उनका हाथ पकड़ते हुये बोला।
बुरा मत मानियेगा डा. साहब। तिवारी जी मकान को बेचना चाहते थे और मैं अपनी दुकान बढ़ाना चाहता था। तिवारी जी को उसके पचीस लाख चाहिये थे...मैने सौदा सत्ताइस लाख में पटवा दिया। बाकी के दो लाख कमीशन के मैने रख लिये। इधर मिश्रा जी आपसे पहले ही खार खाये हुये थे वह किसी तरह आपको अपने कमरे से निकालना चाहते थे। मैने सोचा कि यह कमरा मैं ही क्यों ना ले लूं...जगह भी वही रह जायेगी और ग्राहकों को कोई परेशानी भी नही होगी। यही सोचकर मैंने दो लाख रुपयों में से पचास हजार रूपये इसके सिक्योरिटी के दे दिये और बाकी में दुकान का डेकोरेशन और माल खरीद लाया। यकीन मानिये आपको यहाँ से हटाने में मेरा कोई हाथ नहीं है।
डा. साहब ने कुछ कहा नहीं बस वहाँ से वापस हो लिये।

समाप्त
दस्तक सुरेन्द्र पटेल
17-04-2017

Saturday, April 8, 2017

शिक्षा व्यवसाय क्यो?

कोई भी व्यवसाय पूँजी के बिना शुरू नही हो सकता और एक स्कूल खोलने के लिये पूंँजी की कुछ ज्यादा ही आवश्यकता है। इसलिये किसी हद तक यह सही भी है कि शिक्षा आजकल व्यवसाय का जरिया बन चुकी है। ऐसा क्यों हैं यह जानने के लिये कुछ बिन्दुओं पर गौर करना समीचीन है-
1-अभिभावक बच्चे का दाखिला कराने में स्कूल की गुणवत्ता से ज्यादा स्कूल के भवन की ऊँचाई, विद्यालय का कैंपस, आकर्षक रंग रोगन देखना पसंद करते हैं।
2-क्लासरूम में पढ़ाई के माहौल से ज्यादा उपलब्ध सुविधाओं पर उनकी नजर ज्यादा रहती है। जैसे कि स्मार्टक्लास, इंटरेक्टिव बोर्ड, सी सी टी वी कैमरा इत्यादि।
3-स्कूल से निकले हुये विद्यार्थियों की सफलता प्रतिशत की बजाय वह विद्यालय में पढ़ रहे बच्चों की गिनती करना ज्यादा पसंद करते हैं। उनकी धारणा है कि विद्यालय में नामांकित छात्रों की संख्या उसकी गुणवत्ता की पहचान है।
4-वह मानते हैं कि छोटे विद्यालयों में पढाई का माहौल बढ़िया नही होता और उनके बच्चे पीछे रह जायेंगे।
5-अनेक प्रकार के यूनिफार्म, सप्ताह में कई बार बदले जाने वाले जूते, रंग-बिरंगे टी-शर्ट और क्रियेटिविटी क्लासेज के नाम पर ली जा रही अतिरिक्त फीस उन्हे यकीन दिलाने में सफल रहती है कि विभिन्नता और इसके लिये ली जाने वाली फीस उनके बच्चे के आगे बढ़ने की गारंटी है।
6-दूसरों के सामने अपने बच्चे का मँहगा विद्यालय और मँहगी फीस के बारे में बताते हुये वो गर्व महसूस करते हैं।
7-कुल मिला-जुलाकर शिक्षा "Need" नही 'Want" बन गई है जिसकी वजह से यह व्यवसाय की ओर अग्रसर है।

ध्यान से सोचें की एक शिक्षित व्यक्ति जो बच्चों को बेहतर ज्ञान और अच्छा नागरिक बनाना चाहता है और विद्यालय के माध्यम से वह यह काम करना चाहता है लेकिन उसके पास पूँजी नही है तो वह उस स्तर का विद्यालय खोल ही नहीं पायेगा जिसमें अभिभावक अपने बच्चे को पढ़ाना चाहे।  वहीं दूसरी ओर एक पूँजीपति जिसका शिक्षा से कोई लेना देना नही, जिसका एक ही मकसद है, पैसा कमाना वह वन टाइम इन्वेस्टमेन्ट करता है और उपरोक्त सुविधाओं के बदले  मोटी फीस वसूल करता है और अभिभावक खुशी-खुशी अपने बच्चे का एडमिशन वहाँ कराके बाद मे सिस्टम को दोष देने लगते हैं।
 बच्चे को शिक्षित करने के लिये बुनियादी चीजें-
1-एक क्लासरूम जिसमे पूरे सत्र निर्बाध रूप से पठन-पाठन चल सके।
2-एक बोर्ड जिसपर पढ़ाया जा सके।
3-बैठने और लिखने-पढने के लिये सुविधाजनक डेस्क और बेंच।
4-और एक योग्य अध्यापक जो बच्चों को उनके हिसाब से पढ़ाये।

जरूरत सुख-सुविधाओं वाले बड़े भवन की नहीं  सीखने-सिखाने वाले एक विद्यालय की है। अगर शिक्षा आवश्यकता तक सीमित है तो सेवा है नही तो चाहत में बदलने के बाद यह व्यवसाय बनने की ओर उत्तरोत्तर अग्रसर है।

दस्तक सुरेन्द्र पटेल


Sunday, October 5, 2014

BANG BANG!


 

कल रात बैंग बैंग देखा, नाइट ऐंड डे की कापी है, थोड़ा सा मसला बार्न अल्टीमेटम से भी लिया गया है। रितिक रोशन टाम क्रूज को को कापी करने में काफी हद तक सफल रहे हैं....कैटरीना कैमरून डियाज के पास भी नहीं फटक पाईं....। फर्स्ट हाफ ज्यादा प्रभावकारी है, सेकेण्ड हाफ रबर बैण्ड है। रितिक रोशन को डाल्फिन कम, शार्क की तरह समंदर में डाइव करते देखना पैसा वसूल है। कोहीनूर के आसपास लिखी गई कहानी में कोई नूर नही हैं। एक्शन लोकेशन, फोटोग्राफी ठीक ठाक हैं। कैटरीना का कैरियर ज्यादा लंबा खिंचने में संदेह के बादल मंडरा रहे हैं।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Monday, August 18, 2014

सिंघम रिटर्न्स

कहानी: 'सिंघम रिटर्न्स' कहानी है बाजीराव सिंघम की जो कि मुंबई पुलिस का डीसीपी है। इससे पहले आपने फिल्म के प्रीक्वल 'सिंघम' में बाजीराव को अपराधियों के छक्के छुड़ाते देखा होगा। इस फिल्म में भी वह ऐसा ही करते हुए नजर आता है।

इस बार सिंघम और उसके साथी पुलिसवालों का पाला पड़ा है महाभ्रष्ट बाबा (अमोल गुप्ते) और उसके चेलों से जो जनता को मूर्ख बना रहे हैं। बाबा का पर्दाफाश करने में कई बार सिंघम को मुंह की भी खानी पड़ती है, मगर वह हार नहीं मानता।

क्या वह आदर्शवाद का चोला ओढ़े इस भ्रष्ट बाबा के चंगुल से भोली भाली जनता को मुक्त  करा पाता है? फिल्म की कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।

'सिंघम' से कितनी अलग है 'सिंघम रिटर्न्स'?
कारें हवा में उड़ना, ब्लास्ट होना, रोहित शेट्टी की फिल्मों में यही देखने को मिलता है। सिंघम रिटर्न्स में भी उनकी वही चिरपरिचित शैली देखने को मिली है। वही पुराने फॉर्मूले हैं जो हम 'सिंघम'में देख चुके हैं।

फिल्म का लुक और फील भी 'सिंघम' के जैसा ही है। 'सिंघम रिटर्न्स' पहले भाग में थोड़ी स्लो और कहीं-कहीं बोरिंग हो जाती है मगर इंटरवल के बाद फिल्म रफ्तार पकड़ लेती है और आप बोर नहीं होते।

कैसा है निर्देशन?

निर्देशन के मामले में रोहित कुछ नया नहीं कर पाए। पुरानी फिल्मों के सारे हिट फॉर्मूले ही उन्होंने इसमें अपनाये हैं। जबरदस्त एक्शन, रोमांस, और एंटरटेनिंग फिल्में बनाने वाले रोहित को अब जरूरत है कुछ नया करने की वरना वो एक ही शैली में सिमटकर रह जाएंगे। हालांकि, फैमिली के साथ सुकून से बैठकर देख सकने वाली फिल्में बनाने में रोहित को कोई पीछे नहीं छोड़ सकता मगर तब भी वह इसे बरक़रार रखते हुए कुछ नए एक्सपेरिमेंट करें तो उनकी फिल्में और बेहतर हो सकती हैं और सिंघम रिटर्न्स के साथ भी कुछ ऐसा ही है।

कैसी है अजय-करीना की एक्टिंग?
इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म का सारा दारोमदार अजय के कन्धों पर है। वह इस फिल्म की बैकबोन हैं। सिंघम में उनके रोल को दर्शकों ने इतना पसंद किया था कि इस फिल्म में भी उनके किरदार से एक्सपेरिमेंट करने या बदलाव करने में रोहित हिचकिचा गए।

एक्शन सीन्स में अजय बेहद जंचे हैं और उनकी एक्टिंग भी अच्छी है। करीना कपूर के लिए फिल्म में करने लायक कुछ नहीं है। करीना के हिस्से जितने भी सीन्स आए, उसमें वो जमी हैं। अजय के साथ उनकी केमिस्ट्री फ्रेश नजर आती है मगर पटकथा में करीना को जगह ही नहीं मिली। अमोल गुप्ते ने विलेन के रोल में उन्होंने जान डाल दी है। अमोल का साथ देने के लिए फिल्म में दमदार अभिनेता के तौर पर मौजूद जाकिर हुसैन ने भी कमाल का अभिनय किया है। फिल्म के सपोर्टिंग किरदार भी जमीन हैं।

बड़ा सवाल-क्या देखनी चाहिए फिल्म?

'सिंघम रिटर्न्स' एक एवरेज फिल्म है जिसमें जबरदस्त एक्शन है। साथ ही कलाकारों की बढ़िया एक्टिंग भी है। रोहित शेट्टी की फिल्मों पर पैसा खर्च करना वैसे भी घाटे का सौदा तो होता नहीं है इसलिए इस फिल्म को एक बार देख सकते हैं। फिल्म से ज्यादा उम्मीद न लगाएं और इसे सिर्फ एन्जॉय करें तो बेहतर है। जिन लोगों को 'सिंघम' पसंद आई थी, वह तो बेशक इस फिल्म को बहुत पसंद करेंगे।
साभार-दैनिक भास्कर

Sunday, December 22, 2013

धूम 3

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम।
धूम 3 को देखकर थियेटर से निकलने के बाद पहला विचार जो दिमाग में आया वह यही था। देशभर के 4500 सिनेमाघरों में रिलीज करके, ऊँची कीमत पर टिकट बेचे जाने का जो गेम यशराज फिल्म्स ने खेला उससे दर्शक फिल्म देखने सिनेमाघर जरूर गया लेकिन बाहर आते समय सिर धुनने के अतिरिक्त कोई चारा उसके पास नहीं था।
फिल्म में ना कोई कहानी है ना कोई सस्पेन्स जो थोड़ा बहुत है उसे निर्देशक ने अगले ही दृश्य में खुद ही बता दिया है। जिस 
प्रकार औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती उसी प्रकार फिल्म के निर्देशक के पेट में फिल्म का कोई सस्पेंस या मिस्ट्री नहीं पचती ऊपर से तुक्का यह कि पूरी फिल्म में मिस्ट्री की बात की गई है।
फिल्म के तकनीकी पक्ष को छोड़ दें तो फिल्म में ऐसा कुछ भी नही जिसे याद रखा जाये। चरित्रों की बात करें तो आदित्य चोपड़ा ने पहले से ही तय कर रखा था कि आमिर के अलावा किसी को स्कोप ही नहीं देना है। पूरी फिल्म में आमिर ही आमिर हैं रही सही कसर उनके डबल रोल ने पूरी कर दी। एक आमिर किसी फिल्म को पचा जाते हैं यहाँ तो दो दो आमिर हैं तो किसी के लिये कुछ बचने की संभावना थी ही नही। लेकिन आदित्य को यह सोचना चाहिये था कि कोई फिल्म केवल एक या दो किरदार की बदौलत नहीं बढ़िया बनती। फिल्म को बढ़िया बनाने के लिये और भी चरित्रों की जरुरत पड़ती है। धूम में ऐसे किरदार हैं भी लेकिन उनपर आमिर के डर से ज्यादा मेहनत नहीं की गई। सबसे ज्यादा नाइंसाफी अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा के साथ की गई है। कैटरीना कैफ से भी कोई हमदर्दी नही दिखाई गई। विदेशी किरदारों का काम शायद शोरूम में रखे आइटम की तरह पोस्टर में छापने के लिये ही किया गया है। कम से कम विक्टरिया के किरदार को बढ़ाया जा सकता था।
म्यूजिक के नाम पर सिर्फ धूम का बैकग्राउण्ड स्कोर ही सुनाई देता है और याद रहता है। हाँ फिल्म के टाइटिल में आमिर द्वारा किया गया टैप डांस दर्शनीय है। स्टंट के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ स्पेशल इफैक्ट है जो अक्सर बोरिंग लगते हैं। सबसे बड़ी कमी फिल्म का बैकग्राउण्ड अमेरिका में होना है। धूम जैसी चोरी का पता हालीवुड का लोकल पुलिसवाला ही आसानी से लगा सकता है उसके लिये भारत से जय और अली को बुलाने की जरुरत नहीं पड़ती।

और क्या लिखूँ बस इतना ही कि इस लेख को पढ़कर अगर एक भी पाठक थोड़ा सा पेशेन्स दिखाकर फिल्म के डीवीडी रिलीज होने तक इंतजार कर सके तो इसका लिखना सार्थक हो जायेगा।

दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Wednesday, June 5, 2013

जिया खान

जिन्दगी में किसी मुकाम पर पहुँचना उतना कठिन नहीं है जितना कि उस पर लंबे समय तक टिके रहना। असल में यह एक पड़ाव नहीं बल्कि एक सफर है जिसपर ज्यादा दूर चलने की इच्छा आपकी काबिलियत पर निर्भर करती है। भारत में तीन चीजें सबको दिखाई देती हैं, क्रिकेट, राजनीति और बालीवुड। सबसे ज्यादा शोहरत किसी क्षेत्र में हैं तो वह है...फिल्म। लाइमलाइट की चकाचौंध में खुद को हमेशा आगे रखने की कोशिश कई बार फिल्मी सितारों के मन में आत्मघाती प्रवृत्ति का निर्माण कर देती है। सितारे अक्सर इस कोशिश में लगे रहते हैं कि दुनिया प्रतिदिन उनके बारे में जाने और पढ़े और यह तभी होता है जब कोई सितारा लगातार फिल्मों में काम करता रहे।
अभिनेता इस मामले में ज्यादा खुशकिस्मत होते हैं क्योंकि उन्की फिल्मी पारी लंबी खिंच ही जाती है। लेकिन बात जब अभिनेत्रियों की आती है तो चीजें इतनी आसान नही रहती।

जिया खान की आत्महत्या इस बहस को और आगे तक ले जायेगी कि वो कौन सी वजह थी जिसने 25 साल की उम्र में उन्हे आत्महत्या करने पर मजबूर किया। 



दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Saturday, May 11, 2013

अश्विनी कुमार की विदाई-सवाल बाकी हैं.... !


बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम।
आखिरकार अश्विनी कुमार (पूर्व कानून मंत्री) और पवन बंसल (पूर्व रेल मंत्री) को जाना ही पड़ा। राजनीति के बिसात पर और ज्यादा फजीहत झेलने की अपेक्षा, सोनिया गाँधी ने अश्विनी कुमार के सेवियर मनमोहन सिंह की बात न मानने का फैसला किया। परिवर्तन संसार का नियम है और राजनीति इसके नियमों से अलग नही। लेकिन इन दो केन्द्रीय मंत्रियों के जाने से अंतहीन सवालों का दौर शुरू हो जाता है जिसके बारे में भारतीय जनता को अवश्य सोचना चाहिये।
हमारे देश में संविधान और कानून को सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है जिसकी अवमानना करने का गंभीर अपराध अश्विनी कुमार ने किया है। लेकिन जो सवाल सबसे बड़ा है उसके बारे में मंथन जरूर होना चाहिये और संभव हो सके तो जाँच भी। क्या अश्विनी कुमार ने स्वयं ही सी बी आई रिपोर्ट देखी थी, या फिर किसी और के कहने पर। जाहिर सी बात है कि कोलगेट मामले में अश्विनी कुमार नहीं फँसे थे, और न ही इसके पहले उनका ऐसा कोई रिकार्ड भी था। तो फिर अश्विनी कुमार ने सी बी आई की रिपोर्ट देखने की गलती क्यों की। वे इतने नासमझ भी नहीं हो सकते हैं कि उन्होने ये मान लिया हो कि इस घटना का किसी को पता नहीं चलेगा। सी बी आई से कोलगेट मामले की जाँच करने के लिये खुद माननीय उच्चतम न्यायालय ने किया था और यह सख्त ताकीद की थी कि उन्हे रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दी जाये ताकि कैग के द्वारा लगाये गये आरोंपों की जाँच हो सके। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा पहली बार है जब किसी सरकार ने उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना करके इस कदर नैतिकता की सीढ़ियों से गिरकर ओछा व्यवहार किया हो।
अश्विनी कुमार ने अपनी बलि देकर सरकार को बचाया है, उस सरकार को जिसके दो बार के कार्यकाल में भारत विकास के रास्ते में दशकों पीछे चला गया है। राष्ट्रमंडल घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला और कोलगेट घोटाला जैसी बडी घटनाओं को छोड़ दें तो ना जाने कितने और घोटाले फाइलों में बंद पड़े मिलेंगे। ये वे घोटालें हैं जो इसी सरकार के रहते सामने आये हैं। अब सबका ध्यान अश्विनी कुमार और पवन बंसल पर है, पुरानी घटनायें हाशिये पर चली गई हैं। यू पी ए सरकार इस मामले में सिद्धहस्त है। आने वाले समय में उसे इसका जवाब देना पड़ेगा।


दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...