Thursday, February 18, 2010

शाहरुख खान...और आई.पी.एल

आज मैंने एक राष्ट्रीय अखबार के संपादकीय में पढ़ा कि शाहरुख खान ने आई पी एल की नीलामी में किसी भी पाकिस्तानी खिलाड़ी को नही खरीदा, वही शाहरुरख खान जिन्होने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के किसी आई पी एल फ्रेंचाइजी के न खरीदे जाने द्वारा एक विवादास्पद बयान दिया और बाद में उसी बयान के जरिये अपनी फिल्म का मुफ्त प्रमोशन करवा लिया। फिलहाल मुद्दा प्रमोशन का नही है उसके बारे में तो मैंने पहले ही लिख दिया है, आज मुद्दा है कि जिन शाहरूख खान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न खरीदे जाने के लिये अफसोस जाहिर किया था, वही शाहरुख खान एक टीम के मालिक भी हैं, उन्होने भी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नही खरीदा। शाहरुख खान ने किस मुंह द्वारा ये सारा बखेड़ा खड़ा किया कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आई पी एल में खेलना चाहिये। इससे लाख गुना अच्छा ये होता कि वे किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी को खरीद लेते, और अपनी टीम में खिलाते, अपनी भावना के अभिव्यक्ति का इससे तरीका और नही हो सकता था। दुनिया की रीति इससे अलग है, आज कोई काम बिना फायदे के नही होता, या काम के उद्देश्य के पहले फायदे का गुणा भाग हो जाता है। अरिंदम चौधरी ने मैंनेजमेंट के छात्रों या फिर आम लोगों के लिये भी, एक किताब लिखी है, नाम है-काउंट योर चिकन्स बिफोर दे हैच....। मैने किताब तो नही पढ़ी है, पर इसका शार्षक मजेदार, अंदर क्या है, क्या फर्क पड़ता है। आज चारों ओर सभी लोग चिकंस को हैच से पहले ही काउंट करने में लगे हुयें हैं। सारा मामला फायदे का है।

अब आते हैं पाकिस्तानी खिलाड़ियों के ऊपर कि क्यों किसी भी टीम ने उनको नही खरीदा, खैर इस पर चर्चा हम बाद में करेंगे।

थ्री इडियट्स और आमिर खान का दावा...

थ्री इडियट्स बहुत अच्छी फिल्म है, इसमें कोई शक नही। मनोरंजक तरीके से आज की शिक्षा पद्धति पर प्रहार करती यह फिल्म राजकुमार हिरानी की पिछली फिल्मों, मुन्नाभाई एम बी बी एस और लगे रहो मुन्नाभाई की अगली कड़ी है, जिसका उद्देश्य स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक संदेश देना है। मजेदार बात यह है कि फिल्म के हीरो, निर्माता तथा राजकुमार हिरानी स्वयं, थ्री इडियट्स में प्रस्तुत किये गये संदेश से कितने प्रेरित हैं और उन सिद्धातों को अपने जीवन में कितना उतारते है।

फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि, कामयाबी के पीछे नही, काबिलियत के पीछे भागो, कामयाबी झख मारकर तुम्हारे पीछे आयेगी। आमिर खान, राजकुमार हिरानी तथा विधु विनोद चोपड़ा ने इस सिद्धांत को कितनी शिद्दत से अपने उसी फिल्म के प्रमोशन के संदर्भ में उतारा है, सोचने लायक है। आमिर खान इस फिल्म के प्रमोशन के लिये बाकायदा रूप बदलकर बनारस की गलियों में घूमें, बाकायदा एक प्रतियोगिता आयोजित करके कि जो उनको ढ़ूंढ़ लेगा वह उनके साथ समय बितायेगा। आमिर खान एक मामले में जीनियस है, वो अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिये उतनी ही मेहनत करते हैं जितनी मेहनत एक डायरेक्टर अपनी फिल्म बनाने में करता है।

अगर आमिर खान काबिलियत पर विश्वास करते हैं तो उन्हे अपने अजीबो गरीब तरह के प्रमोशन कैंपेन्स को अलविदा कर देना चाहिये और अगर कामयाबी पर विश्वास करते हैं तो उन्हे चतुर से हार मान लेनी चाहिये।

Wednesday, February 17, 2010

आदत....

मित्रों, जब कभी भी हम किसी नये परिवेश में प्रवेश करते हैं, नये लोगों से मिलते हैं, नई चीज देखते हैं तो पहली-पहली बार हम कोई ना कोई प्रतिक्रिया करते हैं, यह मानवीय आचरण है। यही होता है जब हम किसी अनचाही वस्तु, घटना या फिर व्यक्ति से मिलते हैं। हो सकता है कि वह वस्तु, घटना या व्यक्ति हमें पसंद ना हो और हम किन्ही कारणों विशेष से उसपर प्रतिक्रिया ना दे सकें तो इसका मतलब यह नही कि हम प्रतिक्रिया देना नही चाहते बल्कि इसका मतलब यह है कि हम किसी ना किसी कारण से अपनी प्रतिक्रिया नही दे सकते है। इसके कई कारण हो सकते हैं, मसलन हमपर किसी का दबाव हो या फिर हमें यह डर हो कि हमारी प्रतिक्रिया का ना जाने कैसा असर हो।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि कभी कभी हमारे सामने परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जब हमें कोई चीज पसंद नही होती और हम चाहते हैं कि उसे रोकें पर हम रोक नही पाते, क्योंकि हममें वो क्षमता नही होती। उदाहरण के लिये, किसी बच्चे का बाप प्रतिदिन शराब पीकर आता है और उसकी माँ को भद्दी गालियाँ देता है, वह लड़का और उसके दूसरे भाई बहनों के साथ-साथ उसकी मां भी अपने पति के इस आचरण के विरुद्ध आक्रोशित होते होंगे पर कुछ कर नही पाते होंगे, क्यों....क्योंकि वे लाचार हैं क्योंकि वो बाप शाम के पहले उनके दो वक्त के रोटी का बंदोबस्त करता है, इसके साथ साथ वे उसके विरुद्ध कोई कदम भी नही उठा सकते क्योंकि वह उनके परिवार का संबल है, पर इस वजह से उसकी दुष्टता और निर्दयता कम नही हो जाती और ना ही उसके परिवार वाले उसके उस व्यवहार से खुश होते होंगे, नतीजन...धीरे धीरे उनको उस गंदे व्यवहार की आदत हो जाती है....मैं यही कहना चाहता हूं, जब हम किसी गलत कार्य, व्यवहार और व्यक्ति को यह जानते हुये कि यह गलत है, बर्दाश्त करते जाते हैं तो धीरे-धीरे वह गलत कार्य, व्यवहार और व्यक्ति हमारी आदत में शुमार हो जाता है और कालांतर में हमें वो सारी चीजें हमारी जिंदगी का एक हिस्सा लगने लगती हैं। ये एक खतरनाक स्थिति होती है जब हम गलत चीज को अपनी जिंदगी का हिस्सा मानने लगते हैं।

अब जरा सोंचे, कि क्या हम आतंकवाद को कई दशकों से बर्दाश्त करते करते उसके आदी तो नही बनते जा रहे, क्या प्रतिदिन की आतंकवादी घटनाओं के बारे में समाचार पत्रों में खबरें पढ़ना हमारी आदत में तो शुमार नही होता जा रहा है। शायद हाँ....

अगर ऐसा है तो हम सोच सकते हैं कि हमारी हालत क्या है.....

आदत व्यक्ति के पुरुसार्थ की कमी से उत्पन्न हुई एक नाजायज स्थिति है जिसकी उपस्थिति से व्यक्ति कमजोर हो जाता है और वो गलत चीजों को अपनी जिंदगी का हिस्सा मानने लगता है। आतंकवाद, भ्रष्टाचार जमाखोरी, देशद्रोह इत्यादि इन सभी गलत चीजों को बर्दाश्त करते करते हम उसके आदी हो चुके हैं....इसका मतलब है...........

Saturday, February 13, 2010

किस्सा एक फिल्म के प्रमोशन का

किस्सा एक फिल्म के प्रमोशन का


अखबारों में कल तक यह खबर थी कि मल्टीप्लेक्स सुरक्षा के दृष्टिकोण से मुंबई में माई नेम इज खान नही दिखायेंगे क्योंकि शिवसेना ने धमकी दी थी कि जिन मल्टिप्लेक्सों में फिल्म रिलीज होगी वहाँ नुकसान के जिम्मेदार मालिक स्वयं होंगे। आज की खबर यह है कि मल्टीप्लैक्सों में भी फिल्म रिलीज हुई और शत् प्रतिशत कलेक्शन हुआ। यही नही सप्ताह भर के टिकट एडवांस बुक हो चुके हैं। शाहरुख खान बर्लिन से मुंबई वासियों को उनकी फिल्म देखने के लिये धन्यवाद दे रहे हैं, यहाँ तक कि रितिक रोशन भी लोगों से फिल्म देखने की अपील कर रहे हैं। इस पूरे मुद्दे पर अगर कोई बेवकूफ बना है तो वह है जनता और किसी को फायदा हुआ है तो वह हैं करण जौहर और शाहरुख खान। शाहरुख खान आत्ममुग्ध हो सकते हैं कि वे सुपरस्टार हैं और जनता उनकी फिल्म लाख बंदिशों के बाद देख सकती है, करण जौहर भी ये खयाली पुलाव पका सकते हैं कि उन्होंने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है, लेकिन इसका दूसरा पहलू हास्यास्पद और खतरनाक है। अगर आमिर खान गजनी फिल्म को प्रमोट करने के लिये नाई बनकर बाल काट सकते हैं, थ्री इडियट्स को प्रमोट करने के लिये बनारस में भेष बदलकर घूम सकते हैं तो शाहरुख खान अपनी फिल्म को प्रमोट करने के लिये शिवसेना के छद्म विरोध का सहारा नही ले सकते हैं, और वो भी तब जब उनकी फिल्म का विषय ही शिवसेना का मुख्य नगाड़ा है। फिल्म रिलीज हो चुकी है शिवसेना यह कह चुकी है कि जिन्हे खाहरुख से प्रेम हो वे फिल्म देख सकते हैं, तो ये सोचने वाली बात है कि आखिर इसका मतलब क्या हुआ। ये सारा खेल एक हिंदी फिल्म की कहानी जैसा ही है, जो शायद इस प्रकार हो-

बालीवुड का एक पहुंचा हुआ निर्देशक, जिसकी फिल्मे यथार्थ पर होती ही नहीं, और जो फिल्म सिर्फ डालर कमाने के लिये बनाता है, एक फिल्म बनाने के लिये सोचता है, हमेशा की तरह यथार्थ से परे। इंडस्ट्री में स्थति बहुत ज्यादा बदल चुकी है, नये-नये निर्देशक नये-नये विषयों पर बहुत अच्छी फिल्में बना रहे हैं और जो कमाई के साथ-साथ समाज को संदेश भी दे रही हैं। हमारा निर्देशक ऐसे विषय सोच ही नही पाता या फिर उसे विश्वास नही है। उसके सामने समस्या आती है कि इस बार फिल्म क्या बनाई जाये, क्योंकि आफ्टर आल कमाना तो उसे डालर ही है और वैसे भी डालर पचास रुपये का है। वो सोचता है कि क्या बनाये जाये, फिर उसे आइडिया आता है कि डालर वाले देश में नौ साल पुरानी एकमात्र आतंकवादी घटना पर फिल्म बनाई जाये, डालर कमाने वाले नान रिलायेबल इंडियन बहुत पसंद करेंगे। वो बुलाता है अपने ब्रह्मास्त्रों दो ऐसे हीरो और हिरोइन को जिनके बिना वो किसी फिल्म की कल्पना कर ही नही सकता। संयोग से फिल्म का नेम और हीरो का सरनेम एक ही है, खान....। फिल्म बनाने से पहले ही निर्देशक को इसे हिट करने और प्रमोट करने का आइडिया भी आ जाता है। वो कांटेक्ट करता है शहर की एक ऐसी राजनीतिक पार्टी को जिसका कोई एजेंडा ही नही है और जिसका अस्तित्व ही भोले भाले बाहर से आये मजदूरों के विरोध पर टिका है। वह उनको अपनी फिल्म का विरोध करने के लिये कहता है ताकि देश और देश के बाहर फिल्म का जबरदस्त प्रचार हो सके। समस्या आती है कि वह पार्टी फिल्म का विरोध कैसे करे, क्योंकि बिना आग के धूंआ तो निकलेगा नही। बिल्ली के भाग से छींका टूट ही जाता है, या यूं कहें कि हिम्मते मरदां तो मद्ददे खुदा, देश में क्रिकेट की गाडफादर संस्था का एक देश के क्रिकेटरों से विवाद हो जाता है और दोनों तरफ के क्रिकेटरों में वाकयुद्ध शुरु हो जाता है। निर्देशक को और आइडिया आता है और वह अपने फिल्म के हीरो से इस वाकयुद्ध में शामिल हो जाने के लिये कहता है ताकि राजनीतिक पार्टी को उसका विरोध करने का मौका मिल सके। सारी योजना बन गयी और अपना हीरो, जो क्रिकेट के नये और बाजारू संस्करण का हिस्सा भी है क्रिकेट और भाईचारे की माला जपते हुये इस युद्ध में कूद जाता है, जबकि उसे मालूम है कि उसके किसी भी स्टेटमेंट का कोई भी मतलब निकाला जा सकता है और उसे किसी भी मामले में घसीटा जा सकता है। वो एक अंतर्विरोधी देश के खिलाड़ियों के बारे में टिप्पणी करता है और बस खेल शुरु हो जाता है, एक फिल्म जो अभी रिलीज नही हुई, उसके प्रमोशन का।

ये कहानी फिल्म की नही फिल्म के प्रमोशन की है, हमारे निर्देशक के प्री प्लानिंग की है, काश कि वो इतना प्लानिंग अपने फिल्म के स्क्रिप्ट को लेकर करता, तो वो एक अच्छी फिल्म बना सकता था।

खतरनाक बात यह है कि भविष्य में फिल्मों की प्रमोशन के लिये ना जाने कैसे कैसे तरीके अख्तियार किये जायेंगे।

Thursday, January 21, 2010

दर्दनिवारक गोलियों पर टिकी है जिंदगी.

म्योरपुर, सोनभद्र,

उन ग्रामीणों की जिंदगी में दर्द निवारक गोलियों के सिवा कुछ नही हैं। दर्द से बेहाल लोग पेनकिलर के सहारे ही जीते हैं। जिले के चार ब्लाकों में फ्लोराइड के कहर से दो हजार से ज्यादा लोग विकलांग हो चुके हैं। पेनकिलर दवाओं, डेक्लो प्लस, बूफ्रेन डेकोपिन निमुस्लाइड के नाम बच्चों बूढों की जुबान पर हैं। फ्लोराइड की वजह से फ्लोरोसिस के शिकार ग्रामीणों की हड़्डियों में ताकत नही बची है। सरकार के आधे अधूरे प्रयासों से लोगों की जिंदगी नरक बन गयी है। दर्द निवारक गोलियाँ सौगात में दूसरी जानलेवा बिमारियाँ दे रही हैं।

यह दर्दनाक किस्सा, जिले के म्योरपुर ब्लाक के कुसुम्हा, रास पहरी, जरहा, चेटवा, मनवसा, जोरूखाड़, चोपन ब्लाक के नेरूइया दामर, रोहनिया दामर, पड़रच, नई बस्ती, पड़वा, कोतवारी गाँवों का है। बभनी और दुदही ब्लाक ब्लाक में भी कुछ गाँव फ्लोराइड का दंश झेल रहे हैं। कुसुम्हा, रोहनिया दामर, जैसे कुछ गाँव में एक परिवार के सभी सदस्य विकलांगता का दंश झेल रहे हैं। अकेले कुसुम्हा गाँव तीन से चार सौ लोग फ्लोरोसिस पीड़ित हैं। यहीं के रामभजन ने कहा कि उसकी हड्डियाँ कमजोर होने से शरीर में भयंकर दर्द उठता है। उसने कहा कि अगर हम गोली नहीं खायेंगे तो जिंदा नही बचेंगे। हालात यह है कि पीड़ित एक दिन में दो से तीन दर्द निवारक गोलियाँ खा रहे हैं। एक दवा विक्रेता ने बताया कि पिछले दो से तीन सालों में दर्द निवारक दवाओं की बिक्री आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। सी एम ओ डा जी के कुरील का कहना है कि इस रोग में दर्द निवारक गोलियाँ कारगर तो हैं लेकिन अधिक प्रयोग से बुरा प्रभाव पड़ता है। आठ वर्ष पूर्व चार ब्लाकों के दो दर्जन गाँवों में फ्लोरिसिस के प्रकोप का पता चलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने पीड़ितों के लिये अच्छे इलाज के लिये कार्ड बनाये गये।

क्यों बढ़ी है फ्लोराइड की मात्रा-

केमिकल इंजीनियर और विश्व बैंक के सलागकार दुनू राय का कहना है कि एल्यूमिनियम कंपनी बाक्साइट से अधिक बाक्साइट निकालने के लिये फ्लोराइड का इस्तेमाल करती हैं। बाद में चिमनियों के सहारे उड़ने वाला फ्लोराइड चालीस किलोमीटर के क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ता है।


अमर उजाला- 18 जनवरी, 2010

Tuesday, January 19, 2010

Thand, Kiske Liye?

कहा जा रहा है कि इस साल ठंड बहुत पड़ रही है, इसने पिछले दस साल के रिकार्ड को तोड़ दिया है। कोहरे और धुंध की वजह से ट्रेनों और प्लेनों की यात्रा में विलंब हो रहा है। खैर पहली बात तो रिकार्ड बनते ही हैं टूटने के लिये और पिछले कुछ सालों की मौसम की फाइलें उठाकर देखें तो पता चलेगा कि रिकार्ड तो अभी और टूटने बाकी हैं। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम रूठी हुई भाभी बन गया है।

हम बात कर रहे थे ठंडी की...वाकई ठंडी बढ़ी तो है लेकिन किसके लिये, सही है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम कुछ ज्यादा ही अनियमित हो गया है, लेकिन सिर्फ आम आदमी के लिये, नही तो विकसित देश क्योटो प्रोटोकाल पर सहमत क्यों नही होते। अमेरिका जो सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करता है वह क्योटो प्रोटोकाल के संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिये राजी ही नही है। क्यों...क्या उसे इस धरती पर नही रहना है, या फिर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा उसके लिये नही है, है, लेकिन वह इस तथ्य को विकासशील देशों के ऊपर थोपना चाहता है कि हम विश्व के बेताज बादशाह हैं, हम जो करेंगे वह आदर्श होगा और जो सोचेंगे वह नीति। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे कि दिल्ली या गुड़गाँव में कड़ाके की ठंडी में सड़क के किनारे खड़े कुछ फुटपाथ पर पलने वाले बच्चे थर-थर काँप रहे हैं और वहीं दूसरी ओर सड़के के किनारे खड़े कुछ अमेरिकन सोच वाले लोग अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मजे में आइसक्रीम खा रहे हैं और ठंडा पी रहे हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि पैसे से मौसम को भी अपने अपने अनुकूल बना लिया गया है। वो ठंडी में भी मजे करते हैं और गर्मी में भी। पर बेचारा गरीब क्या करे वह तो हर तरफ से मारा-मारा फिरता है। वह खाने की भी व्यवस्था मुश्किल से कर पाता है तो वह सर्दी से बचने की व्यवस्था कहां से करेगा। वह तो भला हो प्रकृति का कि उसने इंसानों में प्रकृति के साथ अनुकूलन की एक नायाब व्यवस्था कर रखी है नही तो पैसे वाले प्रकृति को भी पैसे से खरीदकर गरीबों पर अत्याचार करने के लिये विवश कर देते। जो लोग सड़के के किनारे आइसक्रीम खा रहे हैं जरा उनके जैकेट स्वेटर जूते वगैरह निकाल दिये जायें और कुछ देर बाद फिर आइसक्रीम खाने के लिये दी जाये तो क्या होगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

Sunday, January 17, 2010

AHSAAS........

अहसास....


हम लोगों को प्रतिदिन कहते सुनते हैं कि मैं तुम्हारी खुशियों या गमों को महसूस करता हूं। खुशियों के बारे में तो नही कह सकते क्योंकि उनके महसूस करने का विधान ही अलग है लेकिन अगर बात गमों की करें तो यह नामुमकिन है कि किसी दूसरे के दुखों को कोई दूसरा महसूस कर पाये। इस तथ्य को सीधे सीधे शब्दों में कहा जाये तो, किसी का सुख महसूस करना आसान है। इसका साधारण सा तरीका है कि उसके खुशियों में शरीक हो जाओ...खाओ, गाओ, मौज मनाओ। कहते हैं, कि इसी से तो खुशियाँ दुगुनी होती हैं।

लेकिन अगर गम बाँटना हो तो...कैसे बाँटें, उसे सांत्वना देकर...या फिर उसे पुरानी खुशियों की याद दिलाकर, शायद नहीं, क्योंकि यदि हम सांत्वना देने का प्रयास करेंगे तो हम उसके वर्तमान दुखों की याद करायेंगे जो उसके दुखों में वृद््धि ही करेंगे, और यदि हम उसके बीते हुये अच्छे पलों की याद कराकर उसे खुशी प्रदान करने की कोशिश करेंगे तो स्थिति और भी जटिल हो जायेगी क्योंकि जब आदमी पर दुखों का पहाड़ टूटता है तो खुशी के पल भी उसे कष्ट प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ भारतीय वैवाहिक परंपरा में दूल्हे के खाना खाने या फिर दूल्हे के पिताजी के आगमन से संबधित शुभ अवसरों पर गाली देने का रिवाज है, मतलब खुशी के समय पर गालियाँ भी अच्छी लगने लगती है और दुख के अवसर पर अच्छी बातें भी खराब।

तो बात हो रही थी, किसी के सुख या फिर दुख को महसूस करने की। मेरा मानना है कि हम किसी के सुख या फिर दुख को महसूस नही कर सकते। मैं इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा जो आजकल मैं बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूं, स्मरणीय है कि मैं महसूस कर रहा हूँ, इसका मतलब यह नही है कि मैं उसमें शामिल हूँ, एक संवेदनशील द्ष्टा की तरह मैं देख रहा हूँ और उसपर अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ, किंतु इतना अवश्य है कि ये घटना किसी को भी विचलित कर सकती है।

इस समय मैं गुड़गाँव में रह रहा हूं, विकास सर के साथ। हम जहाँ रहते हैं, रहते क्या हैं, बस नहाते हैं और कपड़े चेंज करते हैं, वहाँ की स्थिति थोड़ी अजीब है। मकान के मालिक दो भाई हैं, जिनके मकान में दो भाग हैं। हम दाये वाले भाग में रहते हैं। जिसमें चार कमरे नीचे और एक कमरा ऊपर है। नीचे वाले कमरों में हम

रहते हैं। पहले वाले कमरे में एक परिवार रहता हैं जिसमें पति-पत्नी और उनके तीन बच्चे रहते हैं। ये लोग हरियाणा से बिलांग करते हैं। दूसरे वाले कमरे में हम लोग रहते हैं, विकास सर और मैं। तीसरे कमरे में दो लड़के रहते हैं जो किसी कंपनी में काम करते हैं, वे कहाँ के हैं, नही जानता। चौथे कमरे में भी लड़के रहते हैं। सारी पाँचवा कमरा भी है, मैं बताना भूल गया था, जिसमें एक पति-पत्नी रहते हैं जो बिहार के हैं। सर उनको बिहारी और बिहारन कहते हैं। अच्छी बात यह है कि दोनो काम पर जाते हैं, और शायद बहुत खुश भी हैं। अब आते हैं मुख्य कहानी पर, घर का दूसरा हिस्सा, दूसरे भाई का है। उसमें किरायेदार रहते हैं कि नही मैं नही जानता हूँ। दूसरे भाई का परिवार रहता है, यह पता है। मेरे कहानी का पात्र दूसरा भाई और उसकी पत्नी हैं। उनके बच्चे भी हैं पर कितने हैं, कह नही सकता, कभी जानने का मौका नही मिला। या फिर जानने की कोशिश नही की। कहानी का प्लाट यह है कि दिन भर उस घर में क्या होता है नही पता क्योंकि दिन भर हम रहते ही, रहते तो रात में भी नही हैं, लेकिन खाना खाने चले जाते हैं। जैसे ही रात के दस बजे के आसपास का समय होता है, दूसरा भाई घर में प्रवेश करता है, पूरी तरह धुत होकर, शराब के नशे में। आते ही वह अपनी पत्नी को भद्दी-भद्दी गालियाँ देना शुरू कर देता है। और गालियाँ भी ऐसी की गोलियाँ भी शर्मा जायें। वह कुछ सेलेक्टेड गालियों को बार-बार दोहराता है और ना जाने कैसी-कैसी आवाजें निकालता है, कभी लगता है कि वह रो रहा है कभी लगता है कि वह हँस रहा है। कभी लगता है कि किसी को मार रहा है और कभी लगता है कि अपने पैर पटक रहा है। उसकी पत्नी की आवाज कभी सुनाई नही देती और ना ही उसके बच्चों की। बस आवाज आती है तो उसके गालियों की, और यह सिलसिला ना जाने कबसे चल रहा है ना जाने कब तक चलेगा। हम सुनते हैं और बस सुनते हैं, कभी-कभी लगता है कि वो कमरा छो़ड़ दिया जाय, शुरु में तो मैं बर्दाश्त ही नही कर पाता था, और लगता था कि कहाँ आ गये हैं हम, कैसे कैसे लोग हैं संसार में। लेकिन धीरे धीरे ये लगने लगा कि क्या हम इस आदमी के रुप में किसी कैरेक्टर का निर्माण कर सकते हैं कि नही, लगा कि हाँ, निर्माण कर सकते हैं। तबसे उसका चीखना चिल्लाना और गालियाँ देना मैंने कैरेक्टर के रूप में लेना शुरु कर दिया, और मेरे कैरेक्टर का निर्माण शुरू हो गया। मैं उसकी गालियों पर ध्यान देता हूँ और समझने की कोशिश करता हूँ। यह शायद मानवता नही है लेकिन एक कोशिश है, इन परिस्थितियों से सबको अवगत कराने की। उस व्यक्ति की पत्नी पर क्या गुजरती होगी, शायद कोई महसूस नही कर सकता। प्रतिदिन शाम को एक मानसिक अत्याचार, स्ट्रेट फारवर्ड कहें तो मेंटल रेप.....। सुबह यदि वो सामने आ जाती है तो उसके चिह्न उसके चेहरे पर साफ दिखाई देते हैं। एक मुरझाया हुआ चेहरा, जिसपर बेबसी और बिखराव की झुर्रियाँ साफ दिखाई दे जाती हैं। उसकी क्या गलती है शायद उसे नही पता। उसके साथ ऐसा क्यों होता है, वह कभी भी नही जान पायेगी। आमतौर पर ऐसी स्थितियाँ उस घर में उत्पन्न होती हैं जहाँ पर आर्थिक, या फिर नैतिक संकट हो, या फिर अशिक्षा भी एक कारण हो सकती है। लेकिन यहाँ पर ऐसा कोई कारण नही है। उसका परिवार संपन्न तो नही फिर भी आराम से घर चल जाता है। सामने दो दुकाने हैं जिनसे अच्छा खासा किराया आ जाता है। पत्नी अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा से निभाती है, लेकिन फिर भी ये सारी घटनाये होती है। क्यों, पता नही क्यों। इन सारी बातों में एक बात बहुत ही अजीब है कि वह व्यक्ति किसी और से बात करते समय पूरी तरह सामान्य रहता है, अगर वह घर में से गाली ही देकर क्यों ना निकला हो। देखने में भी शराबी या फिर गाली बकने वाला नही लगता। कभी-कभी स्वयं ही कहता है जब उसका सामना सर से हो जाता है कि वह रिसर्च कर रहा है। क्या रिसर्च कर रहा है, उसे ही पता होगा। शायद किसी को कितनी बेरहमी से टार्चर किया जा सकता है, उस विषय पर।

क्या उस पत्नी के दुख को महसूस करके उसे कम किया जा सकता है......उत्तर मिले तो अवश्य बतायें।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...