Monday, June 3, 2019

राहुल गाँधी और 21वीं सदी का ब्रिटिश काल

दैनिक जागरण में 2 जून को छपी खबर

-दस्तक सुरेन्द्र पटेल
जहाँ आग जलती है, धूँआ वहीं से उठता दिखाई देता है।
राहुल गाँधी का दूसरा नाम पप्पू ऐसे ही नहीं पड़ गया। वो पप्पू जो सा.... कभी डांस नहीं कर सकता। वो पप्पू जो कभी पास नहीं हो सकता। वो पप्पू जो कहता कुछ और है, और मतलब उसका कुछ और निकल जाता है। राहुल गाँधी के वक्तव्य और व्यक्तित्व की यही पहचान है। बात चाहे संसद में आँख मारने की हो, प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाना हो, आलू से सोना बनाना हो, राहुल गाँधी कुछ भी कह दें, भारत को हँसने का एक मौका तो मिल ही जाता है।
ताजातरीन उदाहरण उनके एक और वक्तव्य के बारे में हैं जिसमें उन्होने 1 जून को कहा कि भारत में मौजूदा हालात ब्रिटिशकाल जैसे हैं।

राहुल गाँधी की तुलना कांग्रेस बनाम ब्रिटिशकाल-
हाल ही में भारत में सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव हुये और परिणाम कांग्रेस और सहयोगी दलों के खिलाफ गया। क्यों गया बजाय इस पर मंथन करने के कांग्रेस और राहुल गाँधी तरह तरह सवाल उठाते रहे। कभी ई वी एम, तो कभी चुनाव आयोग, कभी जनता को  दोष मढ़ने के बाद राहुल गाँधा ने अब कहा है कि कांग्रेस के समय ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई है। वह ब्रिटिश काल जब उसके सदस्य लेजेस्टिव काउंसिल में बहुत कम हुआ करते थे, और उन्हे सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिये काउंसिल में लड़ना पड़ता था।  इसके अलावा उन्होने यह भी कहा कि संसद में उनके 52 सदस्य भाजपा 300 से ज्यादा सदस्यों के लिये काफी हैं। एक एक इंच के लिये कांग्रेस के सदस्य अपनी जान लड़ा देंगे।

क्या वाकई भारत में ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ हैं-
राहुल गाँधी के बयान पर यदि गौर किया जाय तो निम्नलिखित सवाल जेहन में आते हैं-
1-15 अगस्त 1947 में आजादी के बाद भारत में  72 सालों में लगातार सत्रहवीं बार लोकसभा के चुनाव संपन्न हुये हैं जिसमें भारत की जनता को उसके द्वारा चुनी हुई सरकार की प्राप्ति हुई है। ब्रिटिश काल में ऐसा नहीं था। सांवैधानिक सुधारों के बाद भारतीय प्रतिनिधित्व मिलने के बाद भी चुने हुये सदस्यों को यह अधिकार नहीं था कि वे वायसराय के बनाये हुये कानूनों में कोई फेरबदल कर दें। सीधे तौर पर कह सकते हैं कि भारतीय प्रतिनिधित्व हाथी के दाँत की तरह था।
2-अगर राहुल गाँधी के बयान को कुछ देर के लिये मान भी लिया जाय तो ब्रिटिश काल में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुन कर काउंसिल में भेजती थी जो उनका प्रतिनिधित्व करते थे। वर्तमान में वैसी परिस्थितियाँ अगर सामने हैं तो जनता ने कांग्रेस को सिरे से खारिज क्यों कर दिया। यदि कांग्रेज ने भारतीय जनता की नुमाँइदगी की मोनोपाली 1885 से ही ले रखी है ( जो सिर्फ उसे लगता है) तो जवाहर लाल नेहरू के बाद कांग्रेस को हर चुनाव में हाँथ पाँव क्यों मारने पड़ते है। यह कहानी राजीव गाँधी तक तो किसी तरह चली लेकिन आज कांग्रेस की क्या हालत है, पूरी दुनिया जानती है। कांग्रेस यह समझने के लिये क्यों तैयार नहीं।
3-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ वाकई सामने होती तो जनता सरकार के खिलाफ बगावत क्यों नहीं कर रही है। सरकार कैसी भी हो, पाँच साल में उसे अपना हिसाब देना ही पड़ता है, लेकिन इस बार तो सारे रिकार्ड टूट गये। जब जवाहर लाल नेहरू के बाद पहली बार किसी पार्टी ने अपने दम पर दूबारा सत्ता में वापसी की है।
4-यदि ब्रिटिश काल जैसी परिस्थितियाँ सामने है, तो तथाकथित महागंठबंधन में कांग्रेस को साथ क्यों नहीं लिया गया। सभी को एक साथ  मिलकर ब्रिटिशकाल से लोहा लेने के लिये तैयार हो जाना चाहिये था।
राहुल गाँधी को चुनाव प्रचार के दौरान अपने एक बयान की वजह से सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप से माफी भी माँगनी पड़ी थी। अगर वो ऐसा नहीं करते तो शायद उन्हे जेल की हवा भी खानी पड़ सकती थी।

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे-
हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जिस प्रकार शुतुरमुर्ग शिकारी को देखकर अपनी गर्दन रेत में डाल लेता है। यह समझते हुये कि शिकारी उसे नहीं देख रहा है। कांग्रेस और राहुल गाँधी का बर्ताव ठीक उसी प्रकार है। ई वी एम-ई वी एम चिल्लाने पर चुनाव आयोग सख्त हुआ तो अपनी झुंझलाहट उतारने के लिये राहुल गाँधी नया पैंतरा आजमा रहे हैं। ठीक यही हालत 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुई थी जब कांग्रेस अपनी हार की वजहों को ढू़ढने के बजाय सारा दोष दूसरों पर मढ़ने पर आमादा थी। इस बार भी नतीजा वही है, और राहुल गाँधी का रवैया भी।

संसद में लड़ने के बजाय जनता के बीच जायें-
राहुल गाँधी अगले चुनाव में अगर कांग्रसे का अस्तित्व खत्म होने से बचाना चाहते हैं, तो उन्हे संसद में हल्ला गुल्ला मचाने के बजाय जनता के बीच में जाना चाहिये। बुनियादी काम करने चाहिये। लोगों को यह संदेश देना चाहिये कि वह महज मनोरंजन की वस्तु नहीं बल्कि भारत की चिंताओं को समझने वाले राजनेता है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध संसद में नहीं बल्कि आम जनता के बीच में करना चाहिये।

छुट्टियाँ कैसिल करके काम पर लग जायें-
जहाँ तक संभावना है, राहुल गाँधी छुट्टियाँ मनाने के लिये विदेश जरूर जायेंगे। लेकिन उन्हे ऐसा नहीं करना चाहिये। छुट्टियाँ तो और भी मन जायेंगी, लेकिन ये पाँच साल अगर फिर भाजपा को कोसने में लगा दिया तो कांग्रेस का क्या होगा, कल्पना से परे होगा।
सबसे दुखद भारत के लिये होगा, क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सबसे बड़ी है। काश राहुल गाँधी ऐसा कर सकते।


Saturday, June 1, 2019

मोदी 2.0



Modi 2.0 के लिए इमेज परिणाम























दस्तक सुरेन्द्र पटेल/
सत्रहवीं लोकसभा के परिणाम के पश्चात हर अखबार, टी.वी. चैनल, फेसबुक, ट्विटर इत्यादि जनसंचार माध्यमों पर एक चीज जो सामान्यतः देखी जा रही है वह मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल। मजे की बात है कि हमेशा से लकीर का फकीर रहा भारतीय मीडिया इसे मोदी 2.0 बता रहा है। मीडिया जो बता रहा है भारतीय जनता वही देख रही है, सुन रही है और समझ रही है।

मोदी 2.0 क्यों?
जहाँ तक मुझे याद है कि 2.0 दक्षिण भारत के निर्देशक शंकर द्वारा निर्देशित की गई फिल्म रोबोट का सीक्वल थी। जिस फिल्म ने भारतीय सिनेमाई इतिहास में साँइंस फिक्शन फिल्मो, जिनका निर्माण न के बराबर होता है, को कई कदम आगे ले जाकर खड़ा कर दिया। शंकर की इस फिल्म का टाइटिल भी आई. टी. फील्ड से जुड़ा हुआ है जहाँ साफ्टवेयर के अपडेटड वर्जन को प्वाइंट समथिंग के अनुसार बताया जाता है। उदाहरण के लिये कोई कंपनी जब किसी साफ्टवेयर का निर्माण करती है तो उसे बीटा वर्जिन कहती है। मार्केट के इनपुट मिलने के बाद उसका कंज्यूमर वर्जन बनाया जाता है और समय दर समय उसके अपडेटेड वर्जन सामने आते है। जिसको वह 2.0, 2.0.1, 2.1.1, 2.1.2 इत्यादि नाम दिया करती है। 
इस हिसाब से देखा जाय तो शंकर की सीक्वल फिल्म का नाम 2.0 किसी हद तक तो सही था। क्योंकि उसका हीरो एक रोबोट है, और सीक्वल फील्म में वह और भी ज्यादा अपडेटेड होकर सामने आता है, इसको 2.0 कहा जा सकता है। 
सवाल यह है कि मोदी 2.0 कहाँ तक उचित है।
1-क्या मोदी को एक रोबोट की तरह पेश किया जा रहा है।
2-क्या दूसरे कार्यकाल में मोदी के शारीरिक, मानसिक स्वरूप में कुछ अपडेट हुये हैं।
3-क्या मोदी के सामने भारत को विनाश से बचाने का एक ही मौका जिसमें उनके चूकने के बाद भारत की बर्बादी तय है।
4-क्या मोदी किसी साइंटिस्ट द्वारा निर्मित किये गये एक उत्पाद हैं।
5-क्या मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं जो भारत की हर समस्याओं का समाधान है।
6-क्या भारत सिर्फ एक व्यक्ति के नाम का मोहताज हो गया है।

क्या इसे मीडिया पर सिनेमा काे प्रभाव के तौर पर देखा जाना चाहिये-
इसके पहले भी देखा जा चुका है कि अलग-अलग विषयों, अवसरों और घटनाओं पर मीडिया सिनेमा का इस्तेमाल प्रतीकों के रूप में किया करता है। परिणाम आने से पहले जब एक्जिट पोल के नतीजे दिखाये जा रहे थे तो उस समय पूरा मीडिया बाहुबली और सिंघममय हो गया था। सारे चैनलों पर बाहुबली और सिंघम के म्यूजिक ट्रैक, एनिमेशन की बाढ़ आ गई थी। चुनाव के पहले भी मीडिया प्रतीकों के रूप में अलग-अलग सिनेमाई चरित्रों को पेश कर चुका है। जहाँ तक सवाल इन्हे इस्तेमाल करने का है, इसका प्रयोग सिर्फ उत्सुकता बढ़ाने के लिये किया जाता है। और अगर ऐसा है तो यह बिल्कुल गलत है क्योंकि खबर में उत्सुकता का तत्व मौजूद नहीं है और आप उसमें उत्सुकता का तड़का एनिमेशन, म्यूजिक, प्रतीको का बेवजह प्रयोग करके बढ़ाते हैं तो निश्चित तौर पर आप भटक रहे हैं। दुख की बात है कि हर चैनल, मीडिया हाउस भटकाव की राह पर है। एक-एक खबर और फुटेज कई-कई बार चलाना इसकी बानगी भर है।

अंत में-
मोदी 2.0 संज्ञा देने के पीछे मीडिया की सोच, समझ और मंतव्य क्या है, यह तो वही लोग बता सकते हैं। लेकिन सिनेमा का उद्देश्य मनोरंजन मात्र करना है और राजनीति, सुरक्षा, समाज, जनता मनोरंजन की विषय वस्तु नहीं है। मीडिया को चाहिये की वह बने बनाये भोेजन को खाने के लिये ना लपके, बल्कि खुद अपना भोजन बनाये। सिनेमाई प्रतीकों का इस्तेमाल कहीं न कहीं वास्तविक चरित्र को उन चरित्रों के आगे छोटा बना देता है। मोदी 2.0 सामने आने पर कहीं न कहीं शंकर की 2.0 की याद हो ही जाती है, जो निश्चित तौर पर मोदी के सामने कुछ भी नहीं है। 

Saturday, January 6, 2018

कोहरा-2


जिस चीज पर आपको सबसे अधिक विश्वास हो और वह ऐन मौके पर दगा दे जाय तो आपके सामने हाथ मलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। यही हुआ हमारे साथ, जब विजय ने गाड़ी आगे चलाने से हाथ खड़े कर दिये। मैंने कार कभी कोहरे भरे रास्ते पर नहीं चलाई थी। हाँलाकि जब विजय गाड़ी चला रहा था तब मेरे दिमाग में यह बात थी कि मुझे भी ऐसे समय में गाड़ी चलाने का अनुभव कर लेना चाहिये। लेकिन कोहरे की भयानकता के देखकर स्टीयरिंग पकड़ने का साहस नहीं हुआ। लेकिन अब जबकि उसने हार मान ली थी गाड़ी चलाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।
गोलू ने गाड़ी चलाने की पेशकश की लेकिन मुझे उसपर जरा सा भी विश्वास नहीं था क्योंकि उसे रात में बाइक चलाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता था। खैर मैने भगवान का नाम लेते हुये स्टीरिंग पकड़ा और गाड़ी गियर में डाला। खैर गियर का कोई ज्यादा काम नहीं था क्योंकि गाड़ी दो नंबर से ज्यादा चल ही नहीं सकती थी। दो नंबर में भी एक्सीलेटर पर पाँव ऐसे रखना था कि गाड़ी कहीं बुरा ना मान जाये और नखरे दिखाने वाली बहुरिया की तरह भाग खड़ी ना हो। अगर ऐसा होता तो गाड़ी के गड्ढे में गिरने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
कार के हेडलाइट की पीली रोशनी हाँफते-काँपते ज्यादा से ज्यादा 5 मीटर तक पहुँच पा रही थी, लेकिन उस पाँच मीटर में सड़क मात्र कुछ फीट नजर आ रही थी। आगे बस कोहरा नजर आ रहा था। जाहिर है गाड़ी कहाँ जा रही है कुछ यकीन से कह पाना मुश्किल था। मुझे उस इंडिगो के ड्राइवर का चेहरा याद आ गया जो दरवाजे के शीशे से अपना चेहरा निकालकर सड़क देकने का प्रयास कर रहा था और अपनी गाड़ी दूल्हे के लेकर द्वारपूजा में बारातियों के पीछे धीरे-धीरे चल रहा था। मैने गोलू से कहा कि वो सड़क के किनारे के बारे में मुझे लगतार बताता रहे। अगर मैं सड़क के किनारे से एक फीट भी हटूं तो मुझे सावधान कर दे।
यकीन मानिये गाड़ी चलाने समय नजरें सड़क को इस तरह ढ़ूँढ रही थीं जिस तरह बूढ़े लोग अपना चश्मा। रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था और चलना जरूरी था। खैर इसी तरीके से चलते हुये हम कप्तानगंज तक आये। रेलवे क्रासिंग पर आकर सड़क के घुमाव का अंदाजा न लगने के कारण मैं गाड़ी सीधी ही लेकर चला जा रहा था। सामने एक कार खड़ी थी उससे अंदाजा मिला की आगे रास्ता नहीं है। अमित कार से बाहर निकला और उसके पीछे-पीछे धीरे-धीरे मैं बैरियर तक पहुँचा। ट्रेन गई और हम परतावल जाने वाली सड़क पर आये। वहाँ से थोड़ी राहत मिली क्योंकि सड़क के बीच में और किनारे सफेद पट्टियाँ बनी हुई थी जिससे सड़का का अंदाजा पूरी तरह मिल रहा था। गाड़ी की स्पीड तेज हुई और कहीं कहीं वह 60 तक पहुँच गई। अमित को कई बार टोकना पड़ गया।  कप्तानगंज से परतावल आने में ज्यादा देर नहीं लगी और इसी चक्कर में हम परतावल चौराहे को क्रास करके पनियरा रोड पर आगे बढ़ गये। अचानक से रास्ता पतला हुआ तो सभी चौंक गये। कप्तानगंज से परतावल चौराहे तक रास्ता पूरा चौड़ा है। एक बार फिर अमित गाड़ी से बाहर निकला और पता चला कि हम आगे बढ़ गये हैं। गाड़ी मोड़कर मैं वापस परतावल चौराहे पर आया और वहाँ से महराजगंज रोड पर गाड़ी बढ़ा दी। महराजगंज गोरखपुर रोड और भी चौड़ा था और किनारे तथा बीच वाली पट्टियाँ और भी ज्यादा चटक थीं इसलिये उस घने कोहरे में भी गाड़ी चलाने में विशेष परेशानी  नहीं हुई और हम जल्दी ही महराजगंज पहुँच गये।

कोहरे में गाड़ी चलाते वक्त सावधानियाँ
1-बायीं तरफ किसी को सड़क का किनारा देखने के लिये जरूर बिठायें।

2-आगे चलने वाली गाड़ी पर ज्यादा भरोसा ना करें, क्योंकि वह अचानक से ब्रेक लगा सकता है।
3-स्पीड हमेशा कम रखें।
4-बैक-साइड इंडिकेटर आन करके चलें।
5-म्यूजिक आफ कर दें। यह आपका ध्यान भटका सकता है।
6-गाड़ी में बैठने वाले सभी लोगों का ध्यान सड़क पर ही रहे। सिर्फ ड्राइवर के भरोसे ना रहें।
7-कोशिश करें कि कोहरे वाली रात में उस सड़क का चुनाव करें जिसपर पट्टियाँ लगी हों।

8-हाइवे पर चलने से बचें। 

Saturday, December 30, 2017

कोहरा

हम सभी देवरिया जाते हुये

कल शाम को अमित, गोलू और विजय के साथ मुझे अचानक देविरया जाना पड़ा। महराजगंज से देवरिया की सबसे कम दूरी भी लघभग 80 किमी होगी। हमने जल्दी पहुँचने के लिये महराजगंज टू देवरिया वाया परतावल-कप्तानगंज-हाटा का रास्ता चुना। हम लोग दोपहर 1.30 बजे के बाद निकले। निकलने से पहले मैं श्रवण पटेल जी के कार्यालय पर थोड़ी देर रूका था। वहाँ ठंडक, कोहरा और एक्सीडेंट के बारे में बात होने लगी। दिसंबर के आखिरी हफ्ते में कोहरे का प्रकोप वैसे भी कुछ ज्यादा है। सब लोगों ने अपने हिसाब से कमेंट किये। मुझे अंदाजा था कि कोहरा वाकई में बड़ी समस्या हो सकता है। वैसे भी जाड़े के आगमन के साथ  व्हाट्स अप पर तमाम ऐसी वीडियोज देखने को मिली थीं जिसमें कोहरे की वजह से हाइवेज पर एक्सीडेंट्स दिल दहला देने वाली श्रृंखला मौजूद थी। फिलहाल मैं वहाँ से निकला और 1.15 बजे अमित के घर के सामने पहुँचा। वह अभी अपने क्लीनिक से नहीं आया था सो मैं वहीं गाड़ी में इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद वह आया और हम 1.30 बजे वहाँ से निकले। रास्ते में शिकारपुर हमें गोलू और विजय को भी लेना था।

इतने खराब मौसम में दोपहर बाद निकलने की वजह-
दोपहर बाद निकलने के वक्त ही यह पता था कि वापसी में 6-7 तो बज ही जायेंगे यानि कि वापसी का पूरा सफर घने कोहरे के बीच में तय करना था। यह अपने आप में काफी चैलेंजिग था क्योंकि कोहरे की चादर इस वक्त इतनी घनी हो रही थी कि पैदल चलने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था। उससे पहले विजय ने कुछ दिन पहले शोहरतगढ़ से रात में वापसी की अपनी कहानी भी सुनाई थी जिसमें उसे गाड़ी चलाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। अमित ने पहले ही हथियार डाल दिये थे कि वह कोहरे में गाड़ी नहीं चला पायेगा। शायद उसे पहले के अनुभव डरा रहे थे, या वह कुछ ज्यादा सतर्क था, यह वही बता सकता था। खैर इन सारी बातों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात क्या थी जिसने हम चारों को देवरिया जाने के लिये विवश कर दिया था।
वह वजह थी कि पछले कई दिनों से गोलू सेकेण्ड हैंड बोलेरो खरीदने की जिद कर रहा था। बोलेरो खरीदने की उसकी चाहत सुषुप्त ज्वालामुखी की तरह थी जो रूक-रूककर महीने दो महीने में जाग उठती थी। लेकिन कुछ दिनों से उसकी यह चाहत लावा, राख और धूल के साथ भूकंप भी ला रही थी जिसकी वजह से मुझे उसकी चाहत पूरा करने के मैदान में अपने दोस्त के साथ उतरना पड़ा। कई गाड़ियाँ देखने और गोरखपुर में दो दिन पहले एक अच्छी गाड़ी हाथ से निकल जाने की टीस गोलू के मन में माइग्रेन की तरह बार बार परेशान कर रही थी। इस चक्कर में उसने एक दिन खाना भी नहीं खाया मानो अपनी प्रेयसी से ना मिलने का दर्द किसी प्रेमी द्वारा अपनी भूख पर उतारा जा रहा हो।
इसी चक्कर में मैने कल सुबह से लगातार तीन घण्टे ओलेक्स पर बिताकर सैकड़ो बोलेरो गाड़ियाँ देखी और उसकी पसंद की एक बोलेरो जो देवरिया में थी उसे खरीदने की योजना बनाई गई। आनन फानन में रूपयों की व्यवस्था की गई और मैने अमित को कहा कि वह भी देवरिया चले। ऐसा करने के पीछे की वजह थी कि उसकी देवरिया में रिश्तेदारी थी और वक्त आने पर वह काम आ सकता था।

यात्रा की शुरूआत-
गाड़ी मैं ड्राइव कर रहा था क्योंकि मैं विजय जो हम सबमें सबसे अच्छा ड्राइवर था (जो पेशे से एक ड्राइवर ही है) उसे अपनी ड्राइविंग दिखाना चाहता था। मैं सबसे नया चलाने वाला था और सबसे कम अनुभव रखता था। खैर बिना किसी दिक्कत में मैंने गाड़ी हाटा तक चलाई और उसके बाद विजय ने स्टेयरिंग सँभाल ली। 3.30 बजे के आसपास हम देवरिया पहुँचे। जिस आदमी के पास गाड़ी थी उसका घर शहर के बाहर था। जाकर पता चला कि वो सेकेण्ड हैंड गाड़ियों का बिजनेस करता था और उसके बगल में उसके भाई  का भी आफिस था। जिस गाड़ी को हम देखने गये थे वह दिखने में ही बेकार लग रही थी। खैर दूसरे डीलर के पास जाने पर भी कोई खास फायदा नहीं हुआ। उसके पास कई बोलेरो गाड़िया थीं लेकिन कोई डील हो नहीं पायी। निकलने की तैयारी करते-करते 6 बज गये। और फाइनली कुछ खा पीकर निकलने के वक्त 6.30 बज रहे थे।

असली चैलेंज-
कोहरा अपना रंग दिखा रहा था लेकिन शहर में लाइट और चारों तरफ गाड़ियों की आवाजाही में उसकी भयानकता का अंदाजा नहीं हो रहा था। वापसी में विजय ही गाड़ी चला रहा था जिसे सबसे ज्यादा अनुभव था। जैसे ही हम शहर से बाहर आये उसकी सारी काबिलियत दाँव पर लग गई क्योंकि कोहर इतना घना था कि आगे दो मीटर भी नहीं दिखाई दे रहा था। गाड़ी की स्पीड 20 के आसपास थी और विजय उल्लू की तरह विंड स्क्रीन पर नजरें गड़ाये ड्राइविंग कर रहा था। पीछे बैठे मुझे और अमित को तो कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था।
घने कोहरे में ड्राविंग-रियल चैलेंज (एक खतरा)
इससे पहले मैंने कोहरे में गाड़ी चलाने का अनुभव आज के लघभग 15 साल पहले लिया था जब मैं और मेरा दोस्त सेराज खुटहाँ से जनवरी की रात साढ़े नौ बजे वापस आ रहे थे और कोहरा बादल की तरह सड़क पर लहरा रहा था। उस वक्त मैंने सेराज के कहने पर बाइक की हेडलाइट आफ करके उसे बहुत धीरे चलाया था और इस तरह हमने लघभग 10 किमी की दूर तय की थी। लेकिन कल का कोहर उससे भी घना था। एक तो सड़क अनजान थी, दूसरे वह बहुत पतली थी, तीसरे बन्द गाड़ी में सड़क का अंदाजा बिलकुल भी नहीं लग रहा था।
हाटा की तरफ से देवरिया की तरफ आने वाली कई गाड़ियाँ मिलीं लेकिन देवरिया से हाटा की तरफ जाने वाली कोई गाड़ी दिखने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसा लग रहा था कि उस समय सिर्फ हम ही लोग हाटा की ओर जा रहे थे। उस समय डर जैसी कोई बात दिमाग में नही थी लेकिन कहीं कोई अनहोनी ना घट जाये इसका अंदेशा दिमाग में न बरसने वालों बादलों की तरह रह-रहकर घुमड़ रहा था। काफी देर बाद अकेले चलते हुये एक इंडिगो गाड़ीं दिखाई दी जो इतनी धीरे चल रही थी कि वह अगर उसी रफ्तार से चलती तो हाटा पहुँचने में उसे चार घण्टे लग जाते। खैर विजय ने गाड़ी उसके आगे की और वह हमारी गाड़ी के पीछे आने की कोशिश करने लगा। विजय अपने पूरे अनुभव से गाड़ी चला रहा था इसलिये वह थोड़ी तेज चलाते हुये इंडिगो को काफी पीछे छोड़कर आगे निकल गया। खैर हाटा पहुँचने के कुछ किमी दूर एक निसान गाड़ी तेजी से आयी और हम उसके पीचे लग गये। शायद वह लोकल ड्राइवर था जो सड़क से परिचित था। उसके पीछे-पीछे हम हाटा तक आये और वहाँ पर अमित, गोलू और विजय ने अँडा खाया। उस समय लघभग आठ बज रहे थे। यानि कि हमें हाटा तक पहुँचने में 1.30 घण्टे से ज्यादा का समय लग गया था। ओस का घनत्व और भी ज्यादा बढ रहा था और अभी तीन चौथाई रास्ता बाकी था।

असली कठिनाई अभी बाकी थी-
जब गाड़ी हाटा से बाहर निकली तो कोहरा चादर की तरह गाडी के सामने लहरा रहा था जैसे हमसे कहने की कोशिश कर रहा हो कि जहाँ हो वहीं रूक जाओ,वरना कोई दुर्घटना हो सकती है। कई बार विजय सड़क का अनुमान लगाये बिन दूसरी तरफ बिलकुल किनारे चला जा रहा था। आगे बैठा गोलू उसे कभी-कभार बता रहा था कि वह सड़क के कितना किनारे है क्योंकि लाल रंग के साइड लाइट जलने से सड़क के किनारे का थोड़ा आभास हो रहा था। लेकिन गोलू ने अपनी तरफ का शीशा चढ़ा रखा था और इस वजह से उसे सड़क ठीक से नहीं दिखाई दे रही थी। विजय की परेशान थोड़ी कम करने के लिये मैंने कुछ सोचा और मैंने पिछले दरवाजे की शीशा नीचे कर दिया और सिर बाहर निकाल कर सड़क का किनारा देखने लगा। ऐसा करने से मुझे किनारा तो दिखने लगा लेकिन तेज हवा और कोहरे की वजह से चेहरे पर बहुत ज्यादा ठंडक लग रही थी। मैने इससे बचने के लिये अपने मुँह पर रुमाल बाँधा, और जैकेट के सिर वाले हिस्से को सिर पर टाइट लगाकर बाँध लिया। मैं इसके बाद सिर निकालकर विजय को सड़क के किनारे के बारे में बताने लगा। यहाँ तक कि सड़क की सूचनाओं वाले साइन बोर्ड भी जिसपर घुमाव के बारे में जानकारी के साथ और साइन बने हुये होते हैं। इस तरह मैं विजय के लिये को पायलट की भूमिका निभाने लगा और विजय थोड़ी राहत के साथ गाड़ी चलाने लगा।
मुसीबतों का अन्त यही नहीं हुआ पता नहीं किस वजह से विजय को गाड़ी चलाने मे दिक्कत होने लगी और उसके सिर में तेज दर्द होने लगा। आगे बैठा गोलू बार-बार उसे चेतावनी दे रहा था कि अगर उसे कोई परेशानी है तो बताये, वह खुद गाडी चला देगा। लेकिन मुझे पता था रात में गाड़ी चलाना उसके बश की बात नहीं थी क्योंकि वह पहले ही बता चुका था कि रात में उसे ठीक से दिखाई नहीं देता है। अमित पहले ही हाथ खडे कर चुका था। यह सही था कि विजय को गाड़ी चलाने में परेशानी हो रही थी और अंत में उसने हथियार डाल भी दिये। कप्तानगंज अभी आधी दूरी पर था और हमारा ड्राइवर आगे गाड़ी चलाने में समर्थ नहीं। गाड़ी वहीं रोक दी गई और विजय ड्राइविंग सीट से हट गया।

क्रमशः...........................

Wednesday, December 27, 2017

N.P.A. (नान परफार्मिंग एसेट)

खबर बहुत चिंतित करने वाली है कि भारतीय बैंको का एन.पी.ए. यानि कि नान परफारमिंग एसेट लगातार बढ़ता ही जा रहा है। कहा तो यह जा रहा है कि बैंको का फँसा हुआ जी.डी.पी.के 2 प्रतिशत से ऊपर हो चला है। कुछ दिन पहले अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार बैंकों का एन.पी.ए. 7.34 लाख पहुँच गया है। जिसमें सरकारी बैंको का एन.पी.ए. दो तिहाई से ज्यादा है।

क्या है एन.पी.ए. (नान परफार्मिंग एसेट)
बैंक विभिन्न मदों में व्यक्तियों अथवा संस्थाओं को कर्ज देते हैं जिनपर अदा किये जाने वाला ब्याज बैंक की कमाई होता है। यह ब्याज इंस्टालमेंट के रूप में होता है। जब किन्ही कारणों से बैंक की इंस्टालमेंट अथवा ब्याज समय से जमा नहीं हो पाता तो इसे बैड लोन कहा जाता है। 90 दिनों की अवधि के बाद इसे एन.पी.ए. यानि कि नान परफार्मिंग एसेट कहा जाता है। यह वह लोन होता है जिसके वापस मिलने की आशा खत्म हो जाती है अथवा बहुत कम हो जाती है।

विश्लेषण-
रिजर्व बैंक आफ इंडिया द्वारा प्रदान किये गये आकड़ों के अनुसार जून माह 2017 तक बैंकों द्वारा कुल 6802129 करोड़

कुल 6802129 करोड़ रूपये लोन दिया गया था जिसमें से 601215 करोड़ रुपये एन.पी.ए. के रूप में फँस गया है। इसमें सरकारी और प्राइवेट कुल मिलाकर 49 बैंक शामिल हैं। यदि आँकड़ों पर नजर डालें तो इंडियन ओवर सीज बैंक की हालत सबसे खराब है जिसने 149217 करोड़ रूपये लोन दिये और उसके 30239 करोड़ रुपये एन.पी.ए. के रूप में फँस गये। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो इसका कुल 20.26 प्रतिशत रूपया एन.पी.ए. के रूप में फँसा है। इसके बाद नंबर आता है यूको बैंक का जिसका 115166 करोड़ रूपये में  21495 करोड़ रूपये, बैंक आफ इंडिया, जिसके 274391 करोड़ रूपये में से 43935 करोड़ रूपये , पंजाब नेशनल बैंक जिसके 356958 करोड़ रूपये में से 55003 करोड़ रूपये एन.पी.ए. के रूप में फंसे हैं।
अगर बात करें सबसे ज्यादा फँसे हुये एन.पी.ए. की तो इसमं सबसे पहला नंबर आता है स्टेट बैंक आफ इंडिया का जिसके 1193325 करोड़ रूपये में से 93137 करोड़ रूपये एन.पी.ए. के रूप में फँसा है।
किस क्षेत्र में कितना रूपया फंसा है, अगर इसपर नजर डालें तो पायेंगे कि धातु एवं इस्पात उद्योग की हालत सबसे खराब है। इस क्षेत्र में कुल दिये गये लोन 4.33 लाख करोड़ रुपये में 1.49 लाख करोड़ो रूपये एन.पी.ए. के रूप में फँसा है। इसके बाद नंबर आता है वस्त्र उद्योग एवं पेय पदार्थ उद्योंगों का जिसका एन.पी.ए. रेट 18 प्रतिशत के आसपास है।

सरकार के कदम-
सरकार ने एन.पी.ए. की रिकवरी के लिये SARFAESI (सिक्यूरिटाइजेशन एंड रिकन्शट्रक्शन आफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड इंफोर्समेंट आफ सिक्योरिटी इन्टरेस्ट) एक्ट बनाया है जिसका काम इस तरह के लोन न चुकाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के अधिकार वाली परिसंपत्तियों का अधिग्रहण करके कर्ज की वसूली करना है। लेकिन यह प्रक्रिया इतनी मद्धिम गति से आगे बढ़ रही है कि यह कब पूरी होगी, कह पाना मुश्किल है।
एक उदाहरण-
विजय माल्या बैंको का 6000 करोड़ रूपया लेकर लंदन भाग गया है लेकिन उसे भारत लाने और उससे कर्ज वसूली की प्रक्रिया बहुत जटिल और धीमी है। एक विजय माल्या से वसूली करने में इतनी कठिनाइयाँ आ रही हैं तो देश में ऐसे सैकड़ों विजय माल्या बैठे हैं।

देश पर असर-
देश और विदेश स्तर के कई जानकार लोगों और संस्थाओं का कहना है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। चुनाव के समय में राजनीतिक दलों द्वारा किसानों की कर्जमाफी का वादा और बाद में हजारों करोड़ रुपये का कर्ज माफ करना भी इसी के अंतर्गत आता है। कहना न होगा कि बैंकों के एन पी ए में किसान कर्जमाफी का भी बड़ा योगदाना है।
2009 में संप्रग सरकार ने 71000 करोड़ रुपये माफ किये थे। अभी हाल में उत्तर प्रदेश में संपन्न हुये चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किसानो के 36000 करोड़ से ज्यादा रूपये के कर्ज माफ किये। किसानों का माफ किया जाने वाला कर्ज किसी न किसी रूप में देश की अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुँचा रहा है। कहाँ सरकार को किसानों और छोटे व्यापारियों की आय बढ़ाने का प्रयास करना चाहिये। मूलभूत व्यवस्था और बुनियादी स्तर पर विकास का प्रयास करना चाहिये किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाती। सत्ता प्राप्ति की सबसे आसान सीढ़ी के रूप में वह कर्जमाफी को चुनती है और देश को आगे बढ़ाने के बजाय दो कदम और पीछे ले जाती है।



दस्तक सुरेन्द्र पटेल निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Sunday, December 24, 2017

सुहेब इलियासी और इंडियाज मोस्ट वांटेड


सुहेब इलियासी अंजू के साथ
यह उन दिनों की बात है जब मैं हाइस्कूल का छात्र हुआ करता था और यदा कदा घरों में टेलीविजन सेट देवता की मूर्ति की तरह विराजमान थे। मनोरंजन के नाम पर दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किये जाने वाले धारावाहिक थे और शनिवार-रविवार को ईंद के चाँद की तरह दिखाये जाने वाले फिल्म। उस दौर में जब अपराध-भ्रष्टाचार टीवी पर सनसनी नहीं हुआ करते थे तब दूरदर्शन पर एक साप्ताहिक अपराध कार्यक्रम शुरू हुआ जिसका नाम “इंडियाज मोस्ट वांटेड” था। टी.वी. पर जो व्यक्ति इसकी एंकरिंग करता था वह देखने में स्मार्ट, खुशमिजाज और अपराध पर पैनी नजर रखने वाला था। उस कार्यक्रम ने कुछ ही प्रसारणों में पूरे भारत में अपनी एक पहचान बना ली। कहा तो ये जाने लगा कि इस कार्यक्रम के प्रसारण में पुलिस को कई ऐसे अपराधियों को पकड़ने में सफलता मिली जो काफी समय से उनकी गिरफ्त से दूर थे। हमारे जैसे किशोरों के लिये जो, सिविल परीक्षा की तैयारी के सपने देखते थे,सुहेब इलियासी एक नायक की तरह था।
यू टर्न
धारावाहिक के प्रसारण के दरम्यान ही अचानक सन् 2000 में खबर आयी की इलियासी की पत्नी अंजू की हत्या हो गई है और सुहेब को पुलिस ने अपनी ही पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। अफवाहें उड़ीं की सुहेब को फंसाया गया है और हमारे जैसे बच्चों ने उनपर यकीन भी कर लिया। यकीन करने के अपने अधकचरे पूर्वाग्रह थे जिनमें सबसे वजनदार यह था कि; चूँकि सुहेब ने भारत के सबसे बड़े अपराधियों को पकड़वानें में मदद की थी इसलिये सत्ता के गलियारों में माफिया के जरिये पहुँचने वाले लोगों ने नाराज होकर उसे फँसा दिया। काफी दिनों तक यह चर्चा चलती रही और धीरे-धीरे यह मामला पर्दे के पीछे चला गया लेकिन कानून अपना काम करता रहा।
पूरा मामला-
सुहेब के पिता का नाम जमील इलियासी था जो आल इंडिया इमाम  आर्गेनाइजेशन के मुखिया थे। सुहेब की मुलाकात अंजू से जामिया मिलिया इस्लामिया कालेज में हुआ जहाँ दोनो मास कम्यूनिकेशन में पढ़ाई कर रहे थे। दोनों में नजदीकियाँ बढ़ीं और मामला शादी तक पहुँचा। दोनों के परिवारों ने नाराजगी जताई और नतीजन दोनों लंजन चले गये। उन्होने 1994 में कानूनी शादी की। 1995 में अंजू ने एक बेटी आलिया को जन्म दिया। सुहेब को लंदन के एक टी वी शो क्राइमस्टापर्स से इंडियाज मोस्ट वांटेड बनाने का खयाल आया और उसे पूरा करने के लिये दोनों भारत आये। शो के पायलट एपीसोड्स में इसकी एंकरिंग अंजू ने की लेकिन आन एयर होने के बाद सुहेब इसकी एंकरिंग करने लगा। इसके बाद अंजू वापस अपने भाई के पास कनाडा चली गई। शो चलता रहा और इसी बीच सुहेब ने अंजू से वापस भारत आ जाने की गुहार लगाई और अपनी कंपनी का नाम आलिया प्रोडक्शन रखा। इस कंपनी के 25 प्रतिशत शेयर सुहेब ने अंजू के नाम पर कर दिये। अंजू के वापस आने के बाद दोनों ने दिल्ली में एक फ्लैट खरीदा जिसको अंजू ने पूरे मन से सजाया। दोनों अपनी बेटी के साथ उसमे रहने लगे और वहीं पर 10 जनवरी 2000 को अंजू को जख्मी हालत में हास्पिटल पहुँचाया गया और उसकी मौत हो गई। शुरुआती दौर में सुहेब ने इसे आत्महत्या का मामला बताया और पुलिस ने इसे मान भी लिया। अंजू के घरवालों ने भी सुहेब को निर्दोष मान लिया था।
केस में अहम मोड़-
इसी बीच रश्मि जो अंजू की बड़ी बहन थी और कनाडा में रहती थी उसने वापस आकर पूरे केस को सुहेब के खिलाफ कर दिया। उसने अंजू की पर्सनल डायरी पुलिस के सुपुर्द की जिसमें अंजू ने सुहेब के बारे में पूरे विस्तार से बताया था। यहीं नही मौत से पहले रश्मि ही वह शख्स थी जिससे अंजू की अंतिम बार बात हुई थी। रश्मि ने कई ऐसी बाते बताईं जिसे अंजू ने सिर्फ उसे बताया था। उसने बताया कि अंजू किसी तरह से सुहेब से तलाक चाहती थी। इसके बाद पुलिस ने अपनी थ्योरी बदली और सुहेब के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया। केस चलता रहा और अंततः 20 दिसंबर 2000 में बीस साल बाद अंजू को न्याय मिला और अदालत ने सुहेब को अंजू की हत्या का दोषी मानते हुये उम्रकैद की सजा सुना दी।
नियत में खोट-
सुहेब ने जिस कार्यक्रम के जरिये पूरे भारत में वाहवाही बटोरी मूलतः वह चोरी थी। उस वक्त में किसी को यह अंदाजा नहीं हुआ कि यह कार्यक्रम इंग्लैंड के कार्यक्रम क्राइमस्टापर्स की नकल थी। जिस अंजू से उसने सारे घरवारों से लड़कर शादी की वह शादी के कुछ महीनों के बाद ही अपनी बहन के साथ कनाडा रहने चली गई। जिस कार्यक्रम के लिये उसने अपराधियों के बारे में जाँच पड़ताल की, उनकी कार्यशैली को करीब से देखा और शायद अंजू की हत्या करने की प्रेरणा उसी से मिली।

जरूरी नहीं कि इंसाफ की बात करने वाला इंसाफपसंद भी हो।

Friday, October 27, 2017

पोस्टर और बच्चे

पोस्टर और बच्चे
अक्टूबर जाने वाला है, नवंबर दस्तक देने वाला है और इसी के साथ मौसम भी अपना मिजाज बदल रहा है। हवा में ठंडक महसूस हो रही है और सुबह-सुबह ओस की हल्की चादर पसर रही है। बदलते हुये मौसम के तेवरों के उलट नेताओं के पसीने छूट रहे हैं क्योंकि निकाय चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चक्रव्यूह का पहला द्वार तोड़ने के लिये संभावित प्रत्याशी हर प्रकार के पैतरें आजमा रहे हैं। सभी अपनी पसंद की पार्टियों से टिकट प्राप्त करने के लिये जिलाध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष  से मिलने की तिकड़म भिड़ा रहे हैं। जिस पार्टी का टिकट गूलर का फूल हो गया है वह है भारतीय जनता पार्टी। एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है और टिकट पर कुंडली मारकर बैठे हुये विभिन्न प्रकार के अध्यक्ष बाजार में आम खरीदने वाली कुशल गृहिणी की भाँति हर दुकान पर जाकर आमों की गुणवत्ता को जाँच परखने की पूरी कोशिश कर रही हैं। आम कितना बड़ा है, कितना पका है, कितना पीला है, कितना लाल है, दवा से पकाया गया है कि डाल का पका है, कब तोड़ा गया है, ताजा है कि पुराना और भी न जाने क्या क्या....। बेचारे आम आजतक इसी गफलत में थे कि बिकने के लिये आम होना ही काफी है। सपने में भी नहीं सोचा था कि क्वालिटी के लिये उनकी परेड भी हो जायेगी। गच्चा खा गये यहीं पर। पानी पी-पी कर कोस रहे थे मोदी के उस सलाहकार पर जिसने उन्हे विदेशों में इतनी यात्राये करवा दी जितनी एक आम आदमी अपने ससुराल के भी नहीं लगाता। मोदी जहाँ गये, अपने आम की मिठास ले गये और देखा देखी पार्टी के कर्ता-धर्ताओं ने आम की गुणवत्ता जाँच करनी शुरू कर दी। इतना तो इन आमों को भी नहीं पता कि कब बौर से बौरा गये और डाली से टूटने की जिद में पेड़ से ही बगावत कर दी।
फिलहाल टिकट चाहे किसी को भी मिले, घमासान अभी से मचा हुआ है। हमारा चुनाव लड़ना किसी पार्टी के टिकट का मोहताज नहीं है, ऐसा समझने वालों ने अभी से रणभेरी बजा दी है। जिसका सबसे पहला असर घरों की दीवारों पर पड़ा है। दीवाली में अच्छा-खासा खर्चा किया घर की रंगाई पुताई में और दुलहन के हाथ की मेंहदी के रंग उतरने से पहले ही दनादन पतरू, कतवारू के पोस्टर दीवार पर चिपक गये मानो सोलह श्रृंगार की हुई किसी नवयुवती के चेहरे पर हैन्डीप्लास्ट चिपका दिया गया हो। बेचारे सीधे-सादे लोग किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते उस दब्बू विद्यार्थी की तरह जो मास्टर साहब से दूसरे द्वारा की गई गलती के लिये धोबी के गदहे जैसे हमेशा धो दिये जाते हों। क्या पता कल इसी में से कोई कस्बे का चेयरमैन हो जाये तो क्या होगा। खैर बड़े तो ठहरे बड़े, हर काम सोच विचारकर करते हैं और करने से पहले फायदे नुकसान का गुणा भाग अवश्य लगा लेते हैं। किन्तु........बच्चों को कौन टाल सकता है, उनको कौन मना कर सकता है और मना करने के बाद वो मानेंगे कि नहीं, इसकी कोई गारन्टी नही है। इधर पोस्टर लगे, उधर बच्चों की टोली ने उसको फाड़ दिया। ऊँची से ऊँची जगह लगा दीजिये, ज्यादातर पोस्टरों की नियति बुरी तरह फटना ही होती है।
अभी मुहल्ले में तड़के सुबह किसी नेताजी का पोस्टर लगा हुआ देखा। ध्यान से देखने पर पता चला कि पोस्टर में चुनाव चिह्न वाली जगह खाली थी। थोड़ा विश्लेषण किया तो लगा कि टिकट तो फाइनल हुआ ही नहीं, शायद इसी वजह से नेताजी ने चुनाव चिह्न वाली गोल जगह खाली छोड़ दी। उनका सारा पोस्टर नीले रंग का था जिससे पता चलता था कि वह किस पार्टी से टिकट की आशा लगाये बैठे हैं। उनकी सोच शायद यह रही कि  जब टिकट फाइनल हो जायेगा तो पार्टी का सिंबल लाकर खाली जगह में फिट कर देंगे, या फिर कुछ और।  खैर पोस्टर उनके भी फटे, असल में सबके फटे।
बच्चों को सबसे ज्यादा मजा पोस्टर में छपे नेताजी की तस्वीर की आँखे निकालने में आता है। अलग-अलग तरीके से निकाली गई तस्वीरों की आँखें बहुत कुछ बयान करती हैं।  मानों इस दुनिया  को देखने के लिये  आँखों की जरूरत ही नहीं है क्योंकि पोस्टर में चेहरा तब भी मुस्कराता रहता है। शायद उसे अपनी निकाली गई आँखों का कोई मलाल नहीं रहता है। वैसे भी पोस्टर की बात थोड़ी देर भूलने के बाद लगता है कि दुनिया में आँख वाले तो ज्यादातर हैं लेकिन दिखाई उनको भी नहीं देता। देखकर भी वो अपनी आँख या तो बन्द कर लेते हैं या अनजान ब जाते हैं। बच्चे कहते हैं कि जरूरत ही क्या है आँख की, जब देखना ही नहीं है या देखकर मुस्करान ही है और संवेदनहीन बनकर दाँत ही दिखाना है तो ऐसी आँख रहे ना रहे, क्या फर्क पड़ता है। आँखे निकाले जाने के बाद पोस्टर के नीचे की दीवार दिखाई देने लगती है जो लाल, पीली और ना जाने किस-किस रंग में रंगी होती  है। ऊपर से इंसान दिखाई एक जैसा देता है लेकिन हकीकत इसके उलट होती है। अंदर ना जाने क्या-क्या छुपाकर रखा है उसने, जाति, धर्म, संप्रदाय, घृणा, नफरत, दक्षिणपंथ, वामपंथ और भी बहुत कुछ। बच्चों को इससे क्या मतलब। उन्हे मजा आता है उन तस्वीरों की आँख निकालने में। फाड़ने में। अपना काम करने के बाद उनके मन में खुशी किलकारी मारने लगती है....अंधा। वह जो नहीं होते हुये भी है....और वह जो होते हुये भी नहीं है। बच्चे इस बात को नहीं समझते और जो समझते हैं वह बच्च नहीं है। पर सबसे बुरी बात कि बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते।

27-10-2017
("दस्तक" सुरेन्द्र पटेल)

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...