Saturday, August 19, 2017

इस्तीफा (कहानी)

इस्तीफा
1.
सेन्ट मेरी स्कूल के प्रांगण में आज विषाद की एक अस्वाभाविक सी दरार दिखाई दे रही थी जिसके गहराई का दर्द बच्चों के साथ-साथ परिचारकों के चेहरे पर साफ-साफ महसूस किया जा सकता था। एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था  हर एक क्लासरूम में जो कहीं से भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता था। विद्यालय प्रशासन को ऐसा पिन ड्राप साइलेंस वाला माहौल तैयार करने में नाकों चने चबाने पड़ जाते, लेकिन आज बिना किसी आदेश अथवा प्रार्थना के पहली बार समुद्र में तूफान से पहले की शान्ति देखने को मिल रही थी। अचानक ही इस माहौल में खलल डाला विद्यालय के प्रबंधक मिस्टर फ्रांसिस की रुकती हुई कार ने,जिसके ब्रेक की आवाज पूरे वातावरण में एक चीख की भाँति गूँज उठी। हमेशा की तरह ही मिस्टर फ्रांसिस तेजी से अपने कार से उतरे और लंबे-लंबे डग भरते हुये फ्रंट कारीडोर में प्रवेश कर गये। सरसरी निगाह से हर एक क्लासरूम का निरीक्षण करते हुये  शीघ्र ही अपने आफिस में पहुँचकर वे कुर्सी पर बैठने से पहले आदतानुसार चपरासी को घण्टी दबाकर बुलाना नहीं भूले। बैठने से पहले ही चपरासी हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया।
-विद्यालय में इतना सन्नाटा क्यों हैं राधेश्याम।
मिस्टर फ्रांसिस ने अपना कोट उतारा और  राधेश्याम ने उसे लपककर हैंगर पर टाँगते हुये धीरे से जवाब दिया।
-विवेक सर आज जाने वाले हैं ना...।
-हाँ आज उनका विद्यालय में अंतिम दिन है, लेकिन इस सन्नाटे से उनके जाने का क्या संबंध।
मिस्टर फ्रांसिस ने  इस घटना को  कोई तवज्जो नहीं दिया लेकिन चेहरे पर अचानक ही आ गई उलझन की रेखा को वे जाने-अनजाने छुपा नही सके। राधेश्याम  ने एक बार उनके चेहरे की ओर देखा और मिस्टर फ्रांसिस ने अपना चेहरा एक फाइल में छुपा लिया। राधेश्याम बाहर निकलने के लिये धीरे से मुड़ा और जाने से पहले अचानक ही कुछ याद आ जाने की वजह से फिर से मिस्टर फ्रांसिस की ओर मुखातिब हुआ।
-काफी लाऊँ सर।
फाइल में मुँह गड़ाये हुये मिस्टर फ्रांसिस ने धीरे से अपना चेहरा उठाया और राधेश्याम की ओर देखते हुये तंद्रा से जागते हुये बोले।
-अँ...हाँ...।
राधेश्याम जाने के लिये मुड़ा पर अचानक ही मिस्टर फ्रांसिस ने फिर से कहा ।
-रहने दो राधेश्याम, आज काफी पीने का मन नही हैं।
राधेश्याम चला गया और मिस्टर फ्रांसिस उस कमरे में अकेले रह गये, ठीक उसी तरह से जब कुछ सालों पूर्व एक साथ कई अध्यापकों के जाने के बाद रह गये थे। पूरे विद्यालय में कोई ऐसा अध्यापक नहीं था जिसे जिम्मेदारी दी जा सके। पूरे विद्यालय में अस्त-व्यस्तता का माहौल बन गया था जिसका फायदा उठाने के लिये कई लोग ताक में बैठे थे। यहाँ तक कि विद्यालय के बाहर अफवाहों का बाजार भी गर्म हो गया  था। अचानक ही मिस्टर फ्रांसिस की नजर खिड़की के बाहर फूलों की काँट छाँट कर रहे माली पर गई जो बड़ी ही तन्मयता से अपना कार्य कर रहा था। उसकी बड़ी सी कैंची चल रही थी और पौधे की टहनियाँ, पत्ते धीरे-धीरे जमीन पर गिरते जा रहे थे। मिस्टर फ्रांसिस की नजरें गिरी हुई टहनियों पर जाकर टिक गईं जिनकी जरुरत अब उस पौधे को नहीं रह गई थी, या शायद माली को...या फिर मिस्टर फ्रांसिस को।
2.
मिस्टर फ्रांसिस अपने कार्यालय में गहन विचार की मुद्रा में बैठे विद्यालय की वर्तमान परिस्थिति पर विचार कर रहे थे। कुछ दिनों पूर्व विद्यालय के पांच अध्यापक बिना कोई कारण बताये इस्तीफा देकर जा चुके थे और विद्यालय में अध्यापकों की जबरदस्त कमी महसूस हो रही थी। कक्षाएं खाली जा रही थीं और अब तो अभिभावकों की शिकायतें भी आ रही थीं। वैसे तो सेन्ट मेरी कस्बे का एक बहुत ही अच्छा विद्यालय माना जाता था जिसकी गुणवत्ता की धाक पूरे जनपद में थी। मिस्टर फ्रांसिस ने अपनी मेहनत के दम पर सेन्ट मेरी विद्यालय को इस मुकाम तक पहुंचाया था जिसमें प्रवेश दिलाने के बाद अभिभावक निश्चिंत हो जाया करते थे। लेकिन आज उसी सेन्ट मेरी की हालत तूफान में फँसी नाव की भाँति हो गई थी। विचारों के इन्ही भँवर में डूब उतरा रहे मिस्टर फ्रांसिस को बाहर निकाला दरवाजे पर अचानक ही प्रकट हो गये एक छब्बीस-सत्ताइस साल के नवयुवक ने जो अंदर आने की इजाजत माँग रहा था। मिस्टर फ्रांसिस ने उसे अंदर बुलाया और उसका परिचय पूछा।
-सर मेरा नाम विवेक त्रिपाठी है।
युवक ने बैठते हुये कहा। मिस्टर फ्रांसिस ने ध्यान से उसे देखा। साँवले रंग के विवेक को एक बार देखने से कोई विशेष बात नजर नहीं आती थी। हाँ इतना तो जरूर था कि उसका कद 6 फुट से थोड़ा ही कम था और सेहत के मामले में भी वह सामान्य से कुछ ज्यादा ही नजर आता था।
-सर मुझे पता चला है कि आपके विद्यालय में अध्यापकों के लिए रिक्तियाँ हैं।
-जी हैं तो...पर आपको कैसे पता चला।
मिस्टर फ्रांसिस ने उत्सुकता मिश्रित आश्चर्य से पूछा।
-संजय जी ने बताया।
संजय श्रीवास्तव उस अध्यापक का नाम था जिसने विद्यालय में शिक्षकों को भड़काने का मुख्य काम किया था। मिस्टर फ्रांसिस के चेहरे पर शिकन की रेखाएं उभरीं। विवेक ने उनके चेहरे के बदलते हुये भाव को गौर से देखा और सफाई देते हुये कहा।
-मेरा संजय जी से कोई विशेष संबंध नही है, बस इतना ही कि मैं उन्हे जानता हूँ। मिस्टर फ्रांसिस सुनकर थोड़े से सामान्य हुये।
-आपकी क्वालिफिकेशन क्या है।
-हिस्ट्री से एम ए किया है। ग्रेजुएशन में हिस्ट्री के साथ अंग्रेजी भी थी।
कहकर विवेक ने अपने बैग से प्रमाणपत्रों की फाइल निकालकर मिस्टर फ्रांसिस को पकड़ा दी। मिस्टर फ्रांसिस ने फाइलों पर एक नजर डालकर तुरंत ही अगला सवाल दाग दिया।
-बी.एड. नहीं किया आपने।
-कभी जरूरत महसूस नही हुई। जिस क्षेत्र में जाना चाहता था उसमें बी.एड. की कोई अहमियत नहीं थी।
-किस क्षेत्र में जाना चाहते थे।
मिस्टर फ्रांसिस ने आँखें सिकोड़ते हुये पूछा।
-मेरा सपना हमेशा से  ही सिविल सर्विस में जाने का था। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। दो साल दिल्ली में रहने के बाद आज आपके सामने प्रस्तुत हुआ हूँ।
विवेक के चेहरे पर अचानक ही उदासी के बादल मँडराने लगे और वह मिस्टर फ्रांसिस की आँखों में देखते हुये बोला।
-सर मुझे इस नौकरी की बहुत ज्यादा जरुरत है। एक्सपीरियेंस के मामले में भी मैं आपको निराश नहीं करूंगा, दो साल तक एक विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया है और ट्यूशन का तो बहुत लंबा अनुभव है। 
एक बार तो मिस्टर फ्रांसिस ने विवेक की बातों का कोई जवाब नहीं दिया। शायद वह विवेक की जरुरत को उसकी आँखों की गहराई से मापने की कोशिश कर रहे थे। मिस्टर फ्रांसिस जैसे लोग कभी भी किसी के सामने अपनी आवश्यकता का पिटारा खोलकर उसे अपने ऊपर हावी होने का मौका नहीं देना चाहते हैं संभवतः इसीलिये मिस्टर फ्रांसिस ने विवेक की धड़कन को अपनी चुप्पी से बढाना उचित समझा। विवेक के चेहरे पर ना जाने कितने भाव आकर चले गये और मिस्टर फ्रांसिस ने उनको जाया नहीं जाने दिया।
-तो मेरी न्युक्ति के बारे में क्या विचार है सर।
-अँ..हाँ..हाँ...आपकी न्युक्ति...आप अपना नंबर छोड़ दीजिये। फोन करके बता दिया जायेगा।
अपने ही विचारों में खो जाने की मिस्टर फ्रांसिस की ये बहुत पुरानी आदत थी। यह आदत थी या फिर एक तरह का तरीका जिसमें सामने वाला अपने आपको महत्वहीन महसूस करता था, कह नहीं सकते थे। विवेक उठा और मिस्टर फ्रांसिस को धन्यवाद करके बाहर निकल गया। मिस्टर फ्रांसिस ने उसके बाहर जाते ही उसकी शिक्षण प्रमाणपत्रों वाली फाइल उठा ली, और ध्यानपूर्वक देखने लगे। विवेक हाईस्कूल से लेकर एम ए तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था। इसके अतिरिक्त उसके पास ना जाने कितने प्रकार के अन्य गतिविधियों से संबंधित प्रमाण पत्र थे जो उसकी काबिलियत को दर्शाते थे। फाइल रखकर मिस्टर फ्रांसिस कुछ सोचने लगे।
3.
विवेक लाइब्रेरी में बैठा कोई फाइल देख रहा था कि अचानक एक छोटा सा लड़का दौड़ता हुआ आया। विवेक ने उसकी ओर देखा।
-सर, आशुतोष का सर फट गया है। शालिनी ने अपने स्केल से उसके सिर पर मार दिया है।
विवेक ने फाइल जल्दी से मेज पर रखा और खड़ा हो गया। विवेक को सेन्ट मेरी में आये हुये छह महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया था लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं बीता था जब किसी विद्यार्थी को कोई समस्या नही हुई हो और उसके समाधान के लिये विवेक को याद ना किया गया हो। विवेक स्वभाव से बहुत ही दयालु था जो किसी की सहायता करने के लिये हमेशा उद्यत रहता था। वहीं दूसरे अध्यापक बच्चों की समस्याओं को छोटा जानकर उसे अपने स्तर का नहीं मानते थे और उनको विवेक के पास भेज दिया करते थे।  इसका प्रतिफल यह हुआ कि धीरे-धीरे विवेक बच्चों के बीच में एक अलग स्थान बनाता गया और दूसरे अध्यापकों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या की भावना घर करती गई। विवेक दौड़ता हुआ कक्षा तीन में पहुँचा जहाँ पर दो तीन बच्चे आशुतोष को ले आने का प्रयास कर रहे थे। कक्षाध्यापक, जिनका नाम राजीव गुप्ता था पास में ही खड़े होकर ऐसा दिखाने का प्रयास कर रहे थे कि देखने वाले को यह बिल्कुल ना अहसास हो कि वह इन सबमें नहीं पड़ना चाहते हैं। लेकिन उनके द्वारा किये जाने वाले सारे प्रयासों का केन्द्रबिन्दु अपने कपड़ों को गंदा होने से बचाना था। विवेक आशुतोष के पास पहुँचा और उसे अपने हाथों में उठाकर नीचे लाइब्रेरी में ले आया। तबतक चपरासी और दाई भी वहाँ आ चुके थे।  विवेक ने उसके घाव को साफ किया और मलहम लगाकर तत्कालिक रूप में एक पट्टी बाँध दी। दाई आशुतोष के सिर के ऊपर हवा करने लगी। इतना सब कुछ हो जाने के बाद कुछ अध्यापक और आये जिन्होने आशुतोष के बारे में बात करनी शुरु कर दी।
-अरे सर जाने दीजिये बहुत शरारती लड़का है।
-दिन भर धामचौकड़ी मचाता रहता है।
-क्या कर रहे थे जी, कक्षा में दौड़ रहे थे क्या।
अचानक एक साथ हुये इतने सवालों का जवाब देना आशुतोष के लिये मुश्किल था, इसलिये उसने बस इतना कहा कि शालिनी ने उसे मार दिया था। अध्यापकों को उसकी बात पर यकीन ही नही हुआ। उधर विवेक ने मिस्टर फ्रांसिस को फोन लगाया। थोड़ी देर में उधर से आवाज आयी।
-गुड मार्निंग सर।
-सर यहाँ पर एक लड़के के सिर में चोट लग गई है। डाक्टर के पास ले जाना पड़ेगा।
-चोट...चोट कैसे लगी। अध्यापक क्या कर रहे थे।
-सर एक लड़की ने उसे स्टील के स्केल से मार दिया था।
-वहीं तो मैं कह रहा हूँ कि उस कक्षा में अध्यापक आखिर कर क्या रहे थे। मैंने कितनी बार कहा है कि पढ़ाते समय ध्यान पूरी क्लास पर होना चाहिये। अध्यापक वही है जो एक-एक बच्चे की हरकतों पर नजर रखता है। पर यहाँ तो अध्यापक ऐसे पढ़ाते हैं कि कक्षा में बच्चे मारपीट कर रहे हैं और उन्हे नजर ही नही आता।
मिस्टर फ्रांसिस थोड़े से शब्दों में अपनी बात ना कह पाने की समस्या से काफी लंबे समय से परेशान थे, लेकिन वह परेशानी अब विवेक के चेहरे से झलक रही थी।
-सर ये बातें बाद में हो जायेंगी, पहले इस बच्चे का कुछ किया जाये। डाक्टर को दिखाना बहुत जरूरी है। फिलहाल तो मैने पट्टी बाँध दी है लेकिन यह काफी नही है। एक छोटे से बच्चे के लिहाज से चोट ज्यादा है।
-मैं यहाँ से गाड़ी भेजता हूँ। आप साथ चले जाइयेगा।
-मेरी क्लास है सर...। चन्द्रमोहन सर फिलहाल खाली हैं। उन्हे भेज दिया जाय।
-वो नहीं हैंडिल कर पायेंगे आप ही चले जाइये। मैं गाड़ी भेजता हूँ।
उधर से फोन कट गया। विवेक ने एक बार  फोन को देखा और फिर उसे अपनी जेब में रख लिया। हर बार यही होता था। कहीं किसी बच्चे को कुछ होता था तो डाक्टर को दिखाने के लिये विवेक को ही जाना पड़ता था। भले ही उसकी क्लास छूट जाये या फिर उसका कोर्स  अधूरा रह जाये या फिर कापियाँ ना चेक हो पायें। इसके अलावा और भी ना जाने कितने काम थे जिन्हे बिना किसी के कहे विवेक अपना कर्तव्य जानकर कर दिया करता था। कोई कार्यक्रम कराना हो, कोई अन्य क्रिया कलाप कराना हो, कोई प्रतियोगिता करानी हो, या फिर कोई फंक्शन कराना हो, विवेक उसे अपनी जिम्मेदारी समझकर कर दिया करता था। इतने समय में विवेक ने स्वतंत्रता दिवस, शिक्षक दिवस बाल दिवस इत्यादि के अतिरिक्त कक्षा दस के विदाई समारोह का आयोजन करवाया था। इन सारे कार्यक्रमों के लिये उसने किसी भी अध्यापक की कोई मदद नही ली। सारा काम उसने विद्यार्थियों से मिलकर करवाया। यही वजह थी कि अध्यापकों के मन में उसके प्रति  ईर्ष्या की भावना और भी बढती गई।  इस संबंध में मिस्टर फ्रांसिस ने भी कई बार उसे टोक दिया था कि किसी भी कार्यक्रम के आयोजन में अन्य अध्यापकों की मदद भी ले ली जाये। इसके पीछे मिस्टर फ्रांसिस का यह तर्क था कि विद्यालय को किसी एक अध्यापक के ऊपर निर्भर नही होना चाहिये। उनकी बातों पर ध्यान देकर ही विवेक ने हमेशा कार्यक्रम के पूर्व अध्यापकों को उसके बारे में बताना प्रारंभ किया लेकिन सहायता लेने के संदर्भ में उसने कभी किसी को मुँह खोलकर नही कहा। इसके पीछे उसका तर्क था कि जिसे मदद करनी होगी वह स्वयं ही आगे आ जायेगा। इतने देर में जीप विद्यालय में आ गई और चपरासी की मदद से विवेक ने आशुतोष को उसमें चढ़ाया और खुद भी बैठ गया।
4.
शाम के साढ़े सात बज रहे थे। मिस्टर फ्रांसिस अपने कमरे में  बैठे कुछ काम कर रहे थे कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई और उन्होने आने वाले को अंदर आने के लिये कहा। दरवाजा खोलकर विवेक अंदर आया।
-गुड इवनिंग सर।
-गुड इवनिंग...बैठिये।
विवेक एक कुर्सी खींच कर बैठ गया और मिस्टर फ्रांसिस भी अपना ध्यान अपने काम से हटाकर विवेक की ओर देखने लगे। विवेक ने इधर-उधर देखते हुये  बात शुरू की।
-सर जैसा कि आप जानते हैं कि सेन्ट मेरी के अतिरिक्त फिलहाल तो मेरा कोई करियर नही है। इसीलिये मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ कोशिश करता हूँ, विद्यालय की भलाई के लिये, विद्यार्थियों की भलाई के लिये।
-हूँ...।
मिस्टर फ्रांसिस ने बिना प्रभावित होते हुये कहा। विवेक ने बात जारी रखी।
-मेरे परिवार के बारे में तो आप जानते ही हैं, सारा दारोमदार मेरे ऊपर है।
विवेक अपनी हथेलियों को आपस में हल्के फुल्के ढंग से रगड़ने लगा। मनोविज्ञान के पंडित मिस्टर फ्रांसिस को समझते देर नहीं लगी कि विवेक कोई आशा लेकर यहाँ उपस्थित हुआ है। उन्होने अपने आपको तैयार कर लिया कि उसकी माँग का क्या जवाब देना है।
-आपने न्युक्ति के समय मुझसे यह कहा था कि जल्दी ही काम के अनुसार आपकी तनख्वाह बढ़ा दी जायेगी। मेरा काम तो आप देख ही चुके हैं। पूरे साल मैने अपने पारिश्रमिक के लिये कुछ नहीं कहा क्योंकि मुझे पता है कि आपने कहा है तो जरूर कुछ करेंगे। अभी मैं यह विनती करने के लिये उपस्थित हुआ हूँ कि पारिश्रमिक वृद्धि के संदर्भ में मेरे पिछले साल किये गये कार्यों को जरूर ध्यान में रखा जाय और थोड़ी कृपा करके इतनी वृद्धि अवश्य कर दी जाये कि मेरा काम सुचारु रूप से चल सके। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि अगला साल मेरे कार्यों के संदर्भ में और भी ज्यादा याद किया जायेगा।
-मुझे आपके कार्यों के बारे में पता है सर, पर शायद आपको नहीं पता कि यहाँ पर हर साल अध्यापकों के पारिश्रमिक में वृद्धि होती है और वह वृद्धि मामूली नही बल्कि अच्छी खासी होती है।
-ठीक है सर। मैं तो बस आपके ही सहारे ही हूँ। अच्छा तो मैं चलूँ।
-ठीक है...।
विवेक निकलने के लिये मुड़ा पर अचानक ही मिस्टर फ्रांसिस को कुछ याद आया और उन्होने विवेक को वापस बुलाया।
-विवेक जी...एक डिजाइन करवाना था।  हाँलाकि मैने कभी विद्यालय का प्रचार नहीं करवाया पर इस साल कई लोगो ने इसके लिये टोका। उनका कहना है कि प्रचार के लिये ना सही, स्कूल के बारे में बताने के लिये ही कस्बे में कुछ बोर्ड लगवा दें।
-सही है सर...सभी विद्यालय के बोर्ड लगते हैं, बस सेन्ट मेरी ही उनके बीच में गायब रहता है।
-इसीलिये मैने सोचा कि इस बार कुछ बोर्ड लगवा दिये जायें।
मिस्टर फ्रांसिस ने अपनी फाइल से एक कागज निकाला और विवेक को दे दिया।
-इसमें डिटेल्स हैं। देख लीजियेगा। डिजाइन बढ़िया होना चाहिये।
 विवेक की कंप्यूटर और डिजाइनिंग की जानकारी की वजह से मिस्टर फ्रांसिस अक्सर उसे इस प्रकार के कार्य दे दिया करते थे जिसे कराने में उन्हे मार्केट में जाना पड़ता और काम भी उस तरह से नही हो पाता जिस प्रकार से विवेक कर दिया करता था। इस तरह के ना जाने कितने कार्य विवेक ने विद्यालय और मिस्टर फ्रांसिस के लिये किये थे। अपनी लगन और कर्तव्यनिष्ठा के बदले में विवेक पारिश्रमिक में थोड़ी सी वृद्धि चाहता था तो उसे कहीं से भी गलत नहीं कहा जा सकता था।
5.
विवेक बाजार में खड़ा सब्जी खरीद रहा था जब उसके पास सेन्ट मेरी विद्यालय के ही एक अन्य अध्यापक शैलेष कुमार का फोन आया। नंबर देखने के बाद उसने फोन उठाया।
-हाँ शैलेष कैसे हो...।
-ठीक हूँ  सर जी। आप कैसे हैं। मेरी भी इन्क्रीमेन्ट हुई है।
-कितनी।
विवेक ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, क्योंकि उसे पता था कि सारे अध्यापकों के वेतन में एक हजार रुपये की वृद्धि हुई है, सिवाय उसके। मिस्टर फ्रांसिस ने उसके अनुरोध को स्वीकार करते हुये उसके वेतन में डेढ़ हजार रुपये की वृद्धि की थी। हाँलाकि ये वृद्धि विवेक के आशानुरुप नही थी लेकिन उसने यह सोचकर संतोष कर लिया कि बाकी अध्यापकों की तुलना में उसकी वृद्धि ज्यादा ही थी। इसीलिये जब शैलेष ने खुश होकर अपने इंक्रीमेन्ट के बारे में बताया तो उसकी उत्सुकता बढ़ गई। शैलेष ने जब जवाब दिया तो विवेक के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई। एक बार तो उसे विश्वास ही नही हुआ कि मिस्टर फ्रांसिस ने वाकई उसके साथ ऐसा किया है। शैलेष के वेतन में भी डेढ़ हजार की इंक्रीमेन्ट की गई थी।  विवेक की आँखों के सामने पिछला साल किसी पहिये की भाँति अचानक ही घूम गया। उसे अपनी मेहनत, अपनी लगन और विद्यार्थियों के चहुँमुखी विकास के लिये किये जाने वाले प्रयास याद आने लगे, जो उसने बिना किसी के कहे ही किये थे। स्वतंत्रता दिवस पर झण्डा बाँधने के सवाल पर सारे अध्यापकों का मुँह छिपाना रहा हो या फिर वार्षिक पुरस्कारों के आयोजन की पूर्व संध्या पर रात के बारह बजे विद्यालय कैंपस में में साउण्ड और लाइट की व्यवस्था कराना रहा हो, एक-एक करके सभी विवेक के सामने आने लगे, जैसे कल ही की बात हो। उसे दुख इस बात का नहीं था कि शैलेष की तनख्वाह डेढ़ हजार बढी है, उसे दुख इस बात का था कि शैलेष की तनख्वाह उसके बराबर ही बढी है जबकि कार्य के मामले में शैलेष उसके सामने कहीं नही टिकता। विवेक ने निश्चय किया कि इस बारे में वह मिस्टर फ्रांसिस से बात जरुर करेगा कि आखिर किस वजह से शैलेष की तनख्वाह उसके जितनी बढ़ी है।
किसी तरह से सब्जी वगैरह खरीद कर विवेक वापस घर आया लेकिन रास्ते भर वह इस सोच से छुटकारा नहीं पा सका। घर पहँचते ही उसने तुरंत ही मिस्टर फ्रांसिस को फोन लगाया। काल कनेक्ट होते ही उधर से आवाज आयी।
-गुड इवनिंग सर।
-गुड इवनिंग सर। आपसे एक बात कहनी थी।
विवेक ने थोड़े दबे स्वर में कहा।
-हाँ-हाँ कहिये।
-सर मेरी बात को एक शिकायत के तौर पर मत लीजियेगा और इसे अन्यथा भी मत लीजियेगा। जैसा कि आप जानते हैं कि स्वभाव से ही मैं प्रतिक्रियावादी रहा हूँ। ऐसे किसी मसले पर, जिससे में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित होता हूँ, बिना प्रतिक्रिया दिये नहीं रह सकता।
-कोई बात नहीं, आप बेहिचक कहिये।
-सर मैने सुना है कि शैलेष सर का वेतन भी मेरे जितना ही बढ़ा है।
-ठीक सुना है आपने।
-उसी सिलसिले में बात करनी थी। सर मैने पिछले साल ना जाने कितने कार्य किये बेहिसाब समय भी दिया ताकि विद्यालय और विद्यार्थी दोनों का भला हो सके। फिर ऐसा क्यों हुआ कि शैलेष के द्वारा किये गये कार्यों को मेरी श्रेणी में रख दिया गया। जबकि असलियत तो यह है कि शैलेष ने मेरे चौथाई भी काम नहीं किया है।
-सर वेतन में वृद्धि तो सबकी एक हजार ही होनी थी लेकिन आपके कार्यों को देखते हुये आपके वेतन में कुछ ज्यादा वृद्धि करने की योजना पूर्व में ही थी। जहाँ तक शैलेष के वेतन वृद्धि की बात है तो वह भी मेरे द्वारा दिये गये सारे कार्यों को निष्ठापूर्वक कर लेते हैं। इसलिये मैने सोचा कि उनके वेतन में भी कुछ ज्यादा वृद्धि हो जाये।
-सर..शैलेष आपके द्वारा दिये जाने वाले कार्यें को ठीक तरीके से पूरा कर लेते हैं लेकिन मेरा क्या, मैं तो वह काम भी निष्ठापूर्वक करता हूँ जो आप नहीं कहते। सबसे पहले विद्यालय में आता हूँ और सबसे बाद में जाता हूँ। विद्यार्थियों में विकास की नई-नई संभावनायें तलाश करता रहता हूँ और उसके लिये प्रयास भी करता हूँ। क्या शैलेष मेरे जितना कार्य करते हैं।
-सर कार्य करना अच्छी बात है लेकिन यह कहना कि आप ही सबसे ज्यादा कार्य करते हैं, अच्छी बात नही हैं। शेलेष की वृद्धि इसलिये भी की गई है कि बाकी अध्यापकों को यह संदेश जा सके कि वह भी इस तरीके की इंक्रीमेन्ट के हकदार हो सकते हैं, बशर्ते उन्हे मेहनत करनी होगी।
-आपने दूसरे अध्यापकों को प्रेरणा देने की बात तो सोची लेकिन मेरी प्रेरणा का क्या होगा, शैलेष के वेतन में अपने बराबर की वृद्धि देखकर मेरे मन पर क्या बीत रही होगी।
-देखिये सर ऐसा नहीं है कि वृद्धि सिर्फ आपकी ही होती। अगर दूसरे अध्यापक अपनी कार्यशैली सुधार लें तो अगले साल उनकी भी इतनी ही वृद्धि हो जायेगी। कार्य कौन ज्यादा कर रहा हौ और कौन कम, वृद्धि इसके आधार पर नहीं होती। एक क्राइटेरिया बना दिया गया है जिसके हिसाब से काम करने वाले की इंक्रीमेन्ट तय है।
-उन लोगों का क्या जिनका कार्य उस क्राइटेरिया में सिमट ही नहीं पाता।
-सर आप समझ नहीं पा रहे हैं, आप सबसे ज्यादा कार्य करते हैं इसमें कोई शक नही, लेकिन सिर्फ आपकी तनख्वाह सबसे ज्यादा बढ़ा दी जाये...अध्यापकों में गलत संदेश जायेगा। मुझपर पक्षपात का आरोप भी लग सकता है।
-लेकिन काम ...
-सर काम तो सभी करते हैं। कोई ज्यादा तो कोई थोड़ा कम। अब इस हिसाब से तनख्वाह बँटनी शुरु हो जाये तो ना जाने कितनी श्रेणियाँ बन जायेंगी। विद्यालय है, कोई कारखाना नही। मैं सारे अध्यापकों को समान मानता हूँ और नहीं चाहता कि कहीँ से भी मेरे ऊपर पार्शियलिटी का आरोप लगे।
विवेक उसी विद्यालय में दक्षिण भारत के अध्यापकों के वेतन के बारे में सोचने लगा जो स्थानीय अध्यापकों के मुकाबले कहीं ज्यादा थी। अब विवेक को लगने लगा कि ज्यादा बात करने से कुछ नहीं होगा, सिर्फ अपनी जुबान ही खाली होगी। आगे उसने सिर्फ इतना ही कहा-
-ठीक है सर आप जो कह रहे हैं ठीक ही होगा। लेकिन मुझे हमेशा इस बात का अफसोस होगा कि मेरी मेहनत को नजरअंदाज कर दिया गया।
कहकर उसने फोन काट दिया और अपने भविष्य के बारे में सोचने लगा। सेन्ट मेरी में एक और दिन भी रहना उसके लिये असह्य हो रहा था। विवेक के लिये सबसे बुरी बात यह थी कि उसने वेतन बढ़ाने के लिये मिस्टर फ्रांसिस से गुजारिश की थी जो एक तरह से बेकार ही गई।  विद्यालय और विद्यार्थियों से विवेक को एक विशेष प्रकार का लगाव हो गया था जिसे एक झटके में त्यागना उसके लये मुश्किल था इसीलिये इस्तीफा देने के बारे में उसने पूरी रात सोचा।
मिस्टर फ्रांसिस की नजर अभी भी जमीन पर गिरी हुई टहनियों और फूल पत्तों पर थी जिसमें उन्हे विवेक की छवि नजर आ रही थी। कमरे के वातावरण में उन्हे घुटन सी महसूस होने लगी और वे बाहर निकल आये। सामने से विवेक आता दिखाई दिया। उसने पास आकर मिस्टर फ्रांसिस को विश किया और जाने की इजाजत माँगी।
-तो आखिर आप जा ही रहे हैं।
-किसी ने रोका भी तो नहीं सर इसलिये लगता है कि मेरी जरूरत नही हैं विद्यालय को, वरना मुझे इस तरह नहीं जाने दिया जाता।
-जाने का निर्णय आपका था विवेक जी, इसमें कोई क्या कर सकता है।
-कुछ नहीं सर...। वैसे भी विद्यालय का भविष्य अब उज्ज्वल है।
-सेन्ट मेरी विद्यालय का भविष्य हमेशा ही उज्ज्वल रहा है विवेक जी। इसकी नींव इतनी मजबूत है कि किसी के आने या जाने का कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आप बताइये, क्या करने का इरादा है अब।
-किसी और के लिये काम ना करना, फिलहाल तो यही इरादा है। बाकी भगवान की मर्जी देखते हैं क्या होता है।
कहकर विवेक मिस्टर फ्रांसिस को नमस्कार करके गेट से बाहर निकल गया।


सुरेन्द्र पटेल, 02 सितंबर, 2012

बाढ़ का कहर

बाढ़ में  डूबा हुआ प्राथमिक विद्यालय
समस्त उत्तर भारत में पिछले कई दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश की वजह से हिमालय से निकलकर उत्तर के मैदान में बहने वाली नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। जगह-जगह तेज बहाव के कारण टूट चुके तटबन्धों से बह रहे पानी ने हजारों गाँवों को समंदर बना दिया है। जिधर देखिये उधर पानी ही पानी नजर आ रहा है। गोरखपुर-बस्ती मंडल के दर्जनों जिले बाढ़ की कहर से सहमे हुये हैं और हजारों जिंदगियाँ दूसरों की कृपा की मोहताज हो गई हैं।
क्या मूसलाधार बारिश बाढ़ की असली वजह है?
कायदे से कहा जाय तो कतई नहीं। बाढ़ की असली वजह बारिश नहीं बहुत हद तक प्रशासन की लापरवाही है। हालाँकि हर साल की तुलना में बारिश इस बार कुछ दिनों के अंतराल में ज्यादा हुई लेकिन इतने बड़े स्तर पर बाढ़ लाने में मात्र इसकी भूमिका को ही रेखांकित नहीं किया जा सकता है। असल में बाढ़ का कहर नदियों के किनारे वाले क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई दे रहा है जिसकी वजह है बंधों का टूटना। नेपाल के पहाड़ी इलाकों से बारिश का पानी नदियों के जरिये उ.प्र. के तराई जिलों जैसे-महराजगंज, सिदधार्थनगर इत्यादि जिलों मे आता है। अचानक हुई आशा के विपरीत ज्यादा बारिश ने नदियों के किनारों पर दबाव बनाया और सालों से कमजोर बन्धे एक-एक कर टूटते गये। 

महराजगंज में बाढ़ की स्थिति-
बाढ़ में डूबी हुई सड़क
महराजगंज जनपद के वे इलाके जो नदियों के किनारे वाले हिस्से में पड़ते हैं वहाँ बाढ़ की विभिषिका ज्यादा देखने को मिल रही है। जनपद के फरेंदा, पनियरा, धानी, नौतनवा, ठूठीबारी इत्यादि क्षेत्रों में बाढ़ अपने चरम स्थिति पर है। सैकड़ों गाँव जलमग्न हैं और उनको राहत पहुँचाने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। रोहिन नदी के आसपास का इलाका पूरी तरह पानी में डूब गया है और गाँव टापू की तरह दिखाई दे रहे हैं। महराजगंज का एकमात्र इंजीनियरिंग कालेज, आई टी एम पूरी तरह से पानी में  डूब गया है। कई लोंगे की मृत्यु हो चुकी है और सैकड़ों मवेशी लापता हैं। महराजगंज-फरेंदा मार्ग, ठूठीबारी-निचलौल-मार्ग, महराजगंज-पनियरा मार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप है। जिलाधिकारी के आदेश पर जनपद के समस्त स्कूल, कालेज 20 अगस्त तक बन्द कर दिये गये हैं।

नगर पालिका की हालत बुरी-

मूसलाधार बारिश की वजह से महराजगंज नगर पालिका की हालत पूरी तरह से खस्ता हो गई है। पानी की उचित निकासी न होने की वजह से कई मुहल्ले पूरी तरह से पानी में डूब चुके हैं। मुख्य सड़कें चलने लायक नहीं हैं और दुकानों में पानी घुँस गया है। व्यापार पूरी तरह से ठप  है।

बाढ़ के बाद बीमारी-

समस्या आगे और भी भयंकर होगी जब पानी उतरने के बाद बाढ़ग्रस्त इलाकों में संक्रामक और मच्छर जनित बीमारियों का प्रकोप बढेगा। प्रशासन को इसका सामना करने के लिये अभी से तैयार होना पड़ेगा क्योंकि आने वाले समय में बीमारियाँ महामारी की तरह फैलेंगी। 


दस्तक सुरेन्द्र पटेल
निदेशक
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Monday, June 19, 2017

विराट एण्ट कंपनी


अपेक्षायें प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं।
अपेक्षाओं का दबाव
एक छोटी सी कहानी जो मैं अक्सर सुनाता हूँ, आपको भी सुनाना चाहता हूँ।
एक छोटे से गाँव में रूई धुनने वाला धुनिया रहता था। गाँव में छोटे-मोटे रजाई गद्दे बनाकर उसका और परिवार का गुजारा नही हो पा रहा था इसलिये वह शहर चला गया। शहर भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, मुंबई। एक परिचित के साथ वह घूमने के लिये यूँ ही बन्दरगाह चला गया जहाँ एक गोदाम में उसने पहाड़ जैसे रूई के गट्ठर देखे। जहाँ तक नजर जाती थी बस उसे रूई ही रूई दिखाई देती थी। देखते ही देखते उसे चक्कर आया और वह बेहोश हो गया। गोदाम के अंदर हल्ला मच गया। थोड़ी देर में वहाँ भीड़ जुट गई और देखते ही देखते उसे हास्पिटल पहुँचा दिया गया। डाक्टर को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्योंकि उसकी शरीर पूरी तरह से ठीक था और धड़कन सामान्य रूप से चल रही थी। सभी लोग उसके परिचित की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहे थे। डाक्टर ने विस्तार से उससे पूरी बात सुनी और उसे धुनिये की बीमारी के बारे में पता चल गया। वह बाहर गया और थोड़ी देर में कमरे के बाहर शोर मच गया कि “रूई के गोदाम में आग लग गई-रूई के गोदाम में आग लग गई....” काफी देर तक यह शोर आस-पास गूँजता रहा और सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं जब उन्होने देखा कि धुनिया बड़बड़ाते हुये उठा- “बहुत अच्छा हुआ कि रूई के गोदाम में आग लग गई वरना सारी रूई मुझे ही धुननी पड़ती...मैं तो मर जाता”
ठीक यही स्थित भारतीय क्रिकेट टीम के सामने अक्सर उपस्थित होती रहती है। हर बार वह अपने ऊपर बेजा अपेक्षाओं का इतना अधिक दबाव ले लेती है कि रेशम के कीड़े की भाँति अपने द्वारा ही बनाये गये रेशम में उलझकर दम तोड़ देती है। और बात जब भारत-पाकिस्तान मैच की हो तो यह दबाव युद्ध स्तर का हो जाता है जहाँ शुरुआती पिछड़ाव पूरा युद्ध हरवा देता है।
जब भारत दूसरी इनिंग में बल्लेबाजी करने उतरा तो रोहित शर्मा से लगायत, शिखर धवन, विराट कोहली, युवराज सिंह और महेन्द्र सिंह धोनी शायद यही सोचकर उतरे कि सारा दारोमदार उन्ही के ऊपर है और अगर वह आउट हो गये तो भारत मैच हार जायेगा। और अगर भारत मैच हार जायेगा तो उनकी तो छोड़ो, देशवासियों का दिल टूट जायेगा। एक अरब लोगों को पाकिस्तान से हारने का दुख वर्षों तक सालता रहेगा। अब क्या कहें ऐसे देशवासियों और क्रिकेट प्रेमियों को जिनका दिल, मासूम बच्चियों और औरतों से बर्बर बलात्कार और हत्या से नहीं टूटता। उनका दिल तब नहीं टूटता जब पैसे के अभाव में अस्पताल में कोई गरीब दम तोड़ देता है और उसके परिवार वालों को शव कंधे पर लादकर ले जाना पड़ता है। उनका दिल तब भी नहीं टूटता है जब गुंडे ताकत और धनवान पैसे के दमपर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं। लेकिन उनका दिल भारत के क्रिकेट मैच हार जाने पर जरूर टूट जाता है और पाकिस्तान से हारने पर तो उनको हार्ट अटैक आ जाता है।
बार-बार ऐसा क्यों हो जाता है क्रिकेट खिलाड़ियों से हम इतनी उम्मीद क्यों लगाकर रखते हैं। क्यों उसी शाम को कदांबी श्रीकान्त और हाकी टीम के जीतने की खबर भारत के हारने की खबर के नीचे दब जाती है। इसकी एकमात्र वजह है क्रिकेट की ब्राडिंग और खिलाड़ियों को सुपर हीरो की तरह पेश करना। भारत में दस साल पहले तक कोई ऐसा खेल नहीं था जिसपर भारतीय गर्व कर सकें। हाकी की प्रतिष्ठा कई दशकों पहले ही मिट्टी में मिल चुकी थी। इसके अलावा कोई और खेल था ही नहीं जिसमें भारतीय चुनौती गंभीरतापूर्वक ली जाती। क्रिकेट में भी ऐसा कुछ था नहीं...वो तो 1983 का वर्ड कप था जिसमें भाग्य के सहारे भारतीय टीम ने दो बार के चैंपियन वेस्टइंडीज को हरा दिया। किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और कहा तो यहाँ तक गया कि यदि अगले 100 मैच भारतीय टीम वेस्टइंडीज के साथ खेलती तो उसके एक भी मैच जीतने की उम्मीद नहीं थी। भाग्य के सहारे जीत का सिलसिला 2011 में महेन्द्र सिंह धोनी की अगुवाई में टूटता हुआ दिखाई दिया और वर्तमान टीम हर मायने से पुरानी टीम से बेहतर है। वह चैंपियन्स ट्राफी जीतने की दावेदार थी लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई।
जब विश्वास रूपी नाव में भय रूपी छेद हो जाता है तो नाव के डूबने का समय तो नहीं लेकिन परिणाम तभी तय हो जाता है। कल समाचार चैनलों को शायद कोई खबर ही नहीं मिली सिवाय भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच के कवरेज के। महासंग्राम, सदी का मुकाबला, रणभूमि, जीता है जीतेंगे....और भी ना जाने क्या क्या शीर्षकों से समाचार दिखाये जा रहे थे। और जब भारत हार गया तब भी वह भिन्न-भिन्न शीर्षकों से समाचार दिखा रहे होंगे। एक बात तो साफ है...किसी की हार हो किसी की जीत हो, कोई मरे-कोई जिये, कहीं फसल अच्छी हो-कहीं सूखा पड़ जाये, कुछ भी हो, मीडिया की पाँचों उंगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में रहता है।

फिलहाल कोई कुछ भी कहे, भारतीय टीम चैंपियन्स ट्राफी जीत सकती थी, यदि वह हार गई है तो इसकी एकमात्र वजह है....दबाव। 10 विकेट मात्र दस गेंदों पर ही गिरते हैं...और एक गेंद को गेंदबाज के हाथ से निकलने और बल्ले पर पहुँचने में सेंकेन्ड भी नहीं लगता है...उसके बीच में यदि बैट और बाल के अतिरिक्त उसे कुछ भी दिखाई-सुनाई दिया तो आउट होना तय है। भारतीय टीम इसी दस सेकेण्ड में हारी...बाकी तो पूरे टूर्नामेन्ट में वह विजेता की तरह खेली।
दस्तक सुरेन्द्र पटेल
निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Monday, June 5, 2017

चाभी और ताला

जीवन का अमूल्य सिद्धान्त

यदि कोई चाभी किसी ताले को नहीं खोल पाती तो इसका अर्थ यह नही कि वह चाभी गलत है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि हमने उसे सही ताले में नहीं लगाया। हमारा प्रयास यहीं खत्म नहीं होना चाहिये, बल्कि निरंतर जारी रहना चाहिये, तब तक, जब तक कि वह सही ताले को खोल ना ले। याद रखें कि चाभी की सार्थकता तभी तक है, जब तक कि वह अपने अभीष्ट ताले को खोल ना ले। यदि वह ऐसा नहीं कर पाती  तो वह मात्र एक लोहे का टुकड़ा है जिसका कोई प्रयोजन नहीं।
जरा सोचिये अगर वह चाभी अपने सही ताले में को खोल सके तो क्या पता, उसके पीछे क्या हो? रुपया, पैसा, दौलत, ज्ञान, यश और सम्मान और ना जाने क्या-क्या। चूँकि ताला किसी कीमती वस्तु की हिफाजत के लिये ही लगाया जाता है इसलिये ये निश्चित है कि कुछ ना कुछ कीमती तो मिलेगा ही। अफसोस कि ज्यादातर चाभियाँ बिना अपने अभीष्ट ताले को खोले ही निष्प्रयोजनीय होकर नष्ट हो जाती हैं। यह उस चाभी की बर्बादी है।

यह सिद्धान्त मानव जीवन पर शत-प्रतिशत लागू होता है। जीवन में हम कोई लक्ष्य तय करते हैं और कभी-कभी उसे प्राप्त नहीं कर पाते और निराश होकर बैठ जाते हैं। यह आपके पुरुषार्थ की बर्बादी है। क्या हुआ अगर आपका प्रयास सफल नहीं हुआ। असफलता के कई कारण हो सकते हैं लेकिन थक-हारकर बैठ जाने का कोई कारण नहीं। इसलिये अगर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त करने में असफलता मिली हो तो हो सकता है कि आप उस लक्ष्य के लिये नहीं बने हों, और आपका लक्ष्य कहीं और इन्तजार कर रहा हो। 

Friday, June 2, 2017

चन्द्रास्वामी


समय एक जैसा नहीं रहता। गुजरते हुये जमाने के साथ इंसान की ताकत और प्रभाव खत्म होता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब वह मौत के कगार पर खड़ा अपने जीवन का अंत देखता है और बेबस, लाचार होकर सब कुछ यहीं छोड़कर चला जाता है। अच्छा भी और बुरा भी।
1996 का वो दौर जब पी.वी.नरसिम्हा राव प्रधान मंत्री , चन्द्रास्वामी उनके सलाहकार और मैं कक्षा 8 वी का छात्र हुआ करता था। पढ़ने लिखने का शौक तब था इसलिये पत्रिकायें उस समय भी मँगाकर पढ़ता था। उस समय आजकल के जैसे सनसनी फैलाने वाले न्यूज चैनल्स नहीं हुआ करते थे। खबरों के लिये दूरदर्शन का समाचार, पढ़ने के लिये अखबार और पाक्षिक समाचार पत्रिकायें जैसे माया और इंडिया टुडे हुआ करते थे। उस समय इंडिया टुडे खबरों के लिये विश्वस्त पत्रिका हुआ करती थीऔर उसमें प्रधामंत्री नरसिम्हा राव के बारे में काफी कुछ लिखा जाता था।
ऐसा माना जाता था कि चन्द्रास्वामी नरसिम्हा राव के सलाहकार थे। चन्द्रास्वामी उन्हे कौन सी सलाह देते थे, धार्मिक, राजनैतिक या फिर कूटनीतिक, इसके बारे में वही दोनों बेहतर तरीके से बता सकते हैं लेकिन दुख की बात है कि अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं रहे। नरसिम्हा राव के प्रधाममंत्री पद से हटते ही चन्द्रास्वामी पर अनेकों मामले दर्ज हो गये और उन्हे जेल भी जाना पड़ा। यह वह वक्त था जब उनके सितारे गर्दिश में जाने लगे थे और 23 मई 2017 को उनकी मौत के बाद भारतीय राजनीति का एक ऐसा अध्याय बन्द हुआ जिसे आज के समाचार चैनल या फिर राजनीतिक पार्टियाँ खोलने में हिचकिचा रहे हैं।
चन्द्रास्वामी का जन्म राजस्थान के बहरोर में एक छोटे से व्यापारी धर्मचंद जैन के घर पर हुआ था। उनके पिता सूद पर पैसे उठाते थे। उनके जन्म के बाद उनका परिवार हैदराबाद बस गया जहाँ 16 साल की उम्र में उनकी दिलचस्पी तंत्र-मंत्र में होने लगी और उन्होने घर छोड़ दिया। इसके बाद वह जैन धर्मगुरू महोपाध्याय अमरमुनि के संपर्क में आये। 23 साल की उम्र में काशी आये और फिर कुछ समय बिहार में भी रहे।
कुछ लोगों का मानना है कि चन्द्रास्वामी को तंत्र-मंत्र और ज्योतिष की कोई जानकारी नहीं थी और वह दूसरे से प्राप्त सूचना के आधार पर कुण्डली विवेचन करते थे। वे नागार्जुन सागर प्रोजेक्ट में स्क्रैप डीलर का काम करने लगे जहाँ धोखाधड़ी का मामला उजागर होने के बाद उसे छोड़ने के लिये बाध्य हुये।

नरसिम्हा राव से नजदीकी-
वह 1971-73 का दौर था जब चन्द्रास्वामी और नरसिम्हा राव की नजदीकियाँ जगजाहिर हुई। उसके पहले राजनीतिक गलियारों में उनकी पहुँच का रास्ता सिद्धेश्वर प्रसाद से शुरू हुआ जब वो 1962 में लोकसभा सांसद बनकर दिल्ली आये। उनके सर्वेन्ट क्वार्टर में दो लोग रहा करते थे एक चतुर्भुज गौतम और दूसरे चन्द्रास्वामी। बाद में चतुर्भुज गौतम चन्द्रशेखर के निजी सचिव बने। धीरे-धीरे चन्द्रास्वामी कांग्रेसी नेताओं के घरों के चक्कर लगाने और उनकी कुण्डलियाँ बनाने लगें। इस तरह से राजनीति और अंधविश्वास के जोड़-तोड़ के गणित के माहिर बन गये। अपने पीले वस्त्र, रुद्राक्ष की माला, बड़ी दाढ़ी मूछ, लंबे बाल के सम्मिलित प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्होने राजनीतिक गलियारें में अपनी अच्छी पकड़ बना ली।
वक्त के साथ सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशी राजनेताओं, शासनाध्यक्षों और हथियार के सौदागरों से चन्द्रास्वामी की बहुत अच्छी जमने लगी। एक वक्त ऐसा था जब उनके संबन्ध ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर, और सउदी अरब के सबसे बड़े हथियारों के व्यापारी अदनान खशोगी तक से थे। बालीवुड का राजनीति, पैसे और पावर से पुराना नाता रहा है इसलिये वहाँ के कुछ चमते सितारे चन्द्रास्वामी के भक्त थे जिनमें राजेश खन्ना और आशा पारेख जैसे नाम शामिल थे।
अदनान खशोगी से सबन्धों की बुनियाद पर ही भारत में हथियारों का सबसे बड़ा घपला बोफोर्स हकीकत में बदल सका, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

चन्द्रास्वामी ने राम मंदिर निर्माण में भी मध्यस्थता कराई थी और मुलायम सिंह यादव से भी उनके संबन्ध थे। 1982 में मिस इंडिया रही पामेला बोर्डस ने डेली मेल को दिये गये इण्टरव्यू में बताया था कि वह अदनान खशोगी और चन्द्रास्वामी ने अपना हित साधने के लिये उनका इस्तेमाल भी किया था। चन्द्रास्वामी ने पावर, मनी, हथियार और सत्ता का ऐसा काकटेल बनाया जिसमें वो कई साल तक किंग मेकर बने रहे। लेकिन वक्त एक जैसा नहीं रहता 1996 के बाद उनपर ताबड़तोड़ कई मुकदमे दर्ज हुये और उन्हे तिहाड़ जेल जाना पड़ गया। सत्ता से दूर रहने के बाद भी उनके चाहने वाले चारों ओर मौजूद रहे और उन्हे किसी खास किस्म की परेशानी नहीं हुई। अपने मौत के पहले तक वह दिल्ली में अपने आलीशान फार्म हाउस कम आश्रम में रहे और 66 साल की उम्र में उनकी मौत के बाद ही लोग जान सके कि  वह अस्पताल में भर्ती थे और मृत्यु के पहले उनके सारे अंगो ने कार्य करना बंद कर दिया था। 

Sunday, April 30, 2017

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स
पड़री रोड महराजगंज, उ.प्र. 273303
शिक्षा सतत चलने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सीखने वाले की उम्र कोई मायने नहीं रखती। विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि क्या पढ़ना है बल्कि यह सिखाया जाता है कि कैसे पढ़ना है। दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाता और विद्यालय का अधिकाँश समय इसमें ही बीत जाता है कि बच्चों को कैसे पढ़ना चाहिये। इस कड़ी में अध्ययन के व्यापक क्षेत्र को संकुचित करके मात्र विषयों के रटने तक ही सीमित कर दिया जाता है। यह विद्यार्थियों की क्षमता का वैसा ही दुरुपयोग है जैसे  आइंसटीन को पत्थर तौड़ने का काम दे दिया जाय या फिर रेस में दौड़ने वाले घोड़े को तांगे में जोत दिया जाय। उनकी कल्पनाशीलता को मात्र विषयों को पढ़ने और परीक्षा में कुछ उत्तर देने हेतु तैयार करने तक ही सीमित ना करके उसे ज्ञान के अनंत आकाश के एक छोर से दूसरे छोर को नापने के लिये उन्मुक्त छोड़ दिया जाय।
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल, लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स, पड़री रोड, महराजगंज का एकमात्र उद्देश्य यही है। इस संस्था का उद्देश्य ना तो व्यवसाय, ना ही किसी प्रकार की प्रतिष्ठा अर्जित करना है।
                                   
निदेशक/प्रबंधक
सुरेन्द्र पटेल

लघभग 18 सालों से अध्यापन कार्य से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े रहने वाले सुरेन्द्र पटेल भूगोल विषय से परास्नातक और एडिटिंग में डिप्लोमा हैं। इन्होने लघभग दो दशक से शिक्षा, शिक्षार्थी और अध्यापन को करीब से देखा और समझा है। वर्तमान समय में शिक्षा के बदलते हुये परिवेश और विद्यार्थी के दिलो-दिमाग को बखूबी समझने वाले सुरेन्द्र पटेल भली-भाँति समझते हैं कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी आधारित है। जिसमें बच्चों को पढ़ाई के प्रति जिज्ञासु बनाया जा सकता है बजाय इसके कि उन्हे विषयों को रटने के लिये मजबूर किया जाय। इन्होने शिक्षा के कुछ बेहद जरूरी सिद्धान्त बनाये हैं जिसमें प्रमुख है फाइव सी का सिद्धान्त।
इनकी नजर में अध्यापन बहुत ही चैलेन्जिंग कार्य है। इसमें विद्यार्थियों के सामने आपको अपनी सारी काबिलियत झोंकने की जरूरत होती है जिसके द्वारा आप उन्हे बता सकें कि आपकी उपयोगिता गूगल गुरू से कहीं ज्यादा है। एक अच्छा अध्यापक क्रिकेट में आलराउंडर की तरह होता है जो बैंटिंग, बालिंग और फील्डिंग तीनों जिम्मेदारी अच्छे तरीके से निभा सके। सुरेन्द्र पटेल विषयों के संदर्भ में न सिर्फ भूगोल, इतिहास, अंग्रेजी, हिन्दी, कला, कंप्यूटर बल्कि संगीत के क्षेत्र में आर्गन, सैक्सोफोन, बाँसुरी, खेल के संदर्भ में क्रिकेट, वालीबाल, शतरंज, बैडमिन्टन, लेखन के क्षेत्र में निबंध, कहानी, कविता इत्यादि में विशेष योग्यता रखते हैं।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल

आपके पाल्य के लिये सबसे सही जगह क्यों?
यह एक ऐसा विद्यालय जहाँ आपके बच्चे को वे सारी सुविधायें मिलती हैं जो उसे सर्वांगीण विकास करने में सहायक होती हैं। इसके साथ ही साथ उसे अपने आपको निखारने का पूरा मौका मिलता है न सिर्फ एकेडमिक लेवल बल्कि क्रियेटिव लेवल पर भी। क्लासेज में उसकी बेसिक चीजों जैसे लिखावट और उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा विद्यालय में अनेक ऐसी सुविधायें प्रदान की जाती हैं जो उसके विद्यार्जन और व्यक्तित्व विकास के लिये आवश्यक हैं।

1-फाइव सी
विद्यार्थियों के ओवरआल डेवलपमेन्ट के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल इस सिद्धानत को फालो करता है जिसमें-
1.      क्यूरियसिटी
2.      क्रियेटिविटी
3.      कान्टिन्यूटी
4.      कान्फडेन्स
5.      कम्यूनिकेशन
पर ध्यान दिया जाता है। क्यूरियसिटी बच्चे की पहली अवस्था होती है जिसमें वह किसी चीज के प्रति जिज्ञासु बनता है। जिज्ञासा उसे अगले पड़ाव यानि क्रियेटिविटी की तरफ ले जाती है जिसमें वह उसे जानने या समझने के लिये अपने नजरिये का विकास करता है। उसके बाद कान्टिन्यूटी की अवस्था आती है जिसमें वह अपने नजरिये को अभ्यास के धरातल पर ले जाता है और उसे लगातार जारी रखता है जबतक कि उसे उसमें प्रवीणता ना हासिल हो जाये। इसके बाद कान्फडेन्स की स्थिति आती है जिसमें वह अपने द्वारा अर्जित किये गये ज्ञान को परखता है और खुद में आत्मविश्वास का संचार करता है जो उसे कम्यूनिकेशन के अंतिम अवस्था तक ले जाती है जिसमें वह अपने ज्ञान व कौशल को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है और सफल व्यक्ति बनता है।

2-इंग्लिश मीडियम
वर्तमान विश्व में अंग्रेजी विचारों के अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपने ज्ञान को दूसरों के सामने प्रस्तुत कर सकता है। देखा गया है कि विद्यार्थी जब अपने शहर व जिले से बाहर निकलता है तो

अंग्रेजी न बोल पाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती है। इससे पार पाने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में अंग्रेजी कम्यूनिकेशन का एक बेहतर माहौल बनाया गया है जिसमें बच्चा अंग्रेजी न सिर्फ पढ़ पाता है बल्कि उसे व्यवहार में भी लाता है।

3-को-एजुकेशन
पूरे विश्व में लैंगिक समानता समाज के विकास के लिये सबसे बड़ी जरूरत में से एक बन गई है। आजकल हर जगह महिलायें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे चल रही हैं। विद्यालय में यह सोच विकसित करने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में को एजुकेशन की व्यवस्था लागू की गई है जिसमें लड़के और लड़कियाँ साथ पढ़ते हैं और विकास के रास्ते तलाश करते हैं।

4-आडियो-विजुअल क्लासेज
कक्षाओं को विद्यार्थी आधारित और विषयों की समझ को सुगम बनाने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में आडियो-विजुअल क्लासेज का व्यवस्था की गई है। इसके लिये कमरों में एल ई डी टीवी और इंटरनेट की व्यवस्था की गई है। एनिमेटेड कंटेन्ट को देखने के बाद बच्चा उसे आसानी से समझता है और लंबे समय तक उसे याद भी रख पाता है।

5-वीडियो लेसन्स
विद्यालय में कोर्स आधारित वीडियो, पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन बनाये जाते है और उन्हे टी वी के माध्यम दिखाया जाता है। इससे न सिर्फ उनका मनोरंजन होता है बल्कि उनका ज्ञान भी बढ़ता है।

6-एडवांस कंप्यूटर लैब
कंप्यूटर की पढ़ाई के लिये विद्यालय में एडवांस कंप्यूटर लैब की व्यवस्था की गई है जिसके द्वारा बच्चों को पाठ्यक्रम में शामिल चीजें तो पढ़ाई ही जाती है बल्कि उन्हे इंटरनेट, मीडिया और एनिमेशन की भी जानकारी दी जाती है।

7-लाइब्रेरी
बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिये एक पुस्तकालय की भी व्यवस्था भी की गई है जिसके द्वारा बच्चों को पाठ्यक्रम से इतर घर ले जाने के लिये मनोरंजक व ज्ञानवर्धक किताबें दी जाती हैं। बच्चे उसे पढ़ते हैं और पुनः विद्यालय को वापस कर देते हैं।

8-साइंस लैब
कक्षा 6 से बच्चों मे वैज्ञानिक अभिरूचि जागृत करने के लिये एक मिनी साइंस लैब की भी व्यवस्था की गई है।

9-फ्री कोचिंग
कोचिंग कल्चर समाप्त करने के लिये विद्यालय में शाम को एक्स्ट्रा क्लासेज चलती हैं जिसकी कोई फीस नही ली जाती है। इसमें विद्यार्थियों के होमवर्क, कठिन विषयों को पुनः पढ़ाना, खेलकूद इत्यादि शामिल हैं।

10-म्यूजिक, योगा क्लासेज
बच्चों में अन्य गुणों को विकसित करने के लिये विद्यालय में म्यूजिक, डांस और क्राफ्ट की कक्षायें चलती हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास का संचार होता है और वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ पाते हैं।






11-अनुभवी अध्यापक
अध्यापन कार्य के लिये विद्यालय में अनुभवी अध्यापकों की न्युक्ति की गई है जो न सिर्फ उच्च शिक्षित हैं बल्कि समझदार और बच्चों की मानसिकता को भली-भाँति समझने वाले हैं।

12-वाहन सुविधा
दूर-दराज के बच्चों को विद्यालय ले आने और ले जाने के लिये विद्यालय में वाहन की व्यवस्था भी की गई है।

13- साउण्ड सिस्टम-
 विद्यालय में निजी साउण्ड सिस्टम और लाउडस्पीकर्स हैं जिसका उपयोग प्रतिदिन असेंबली के दौरान किया जाता है। बच्चे माइक में बोलते हैं जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
अब तक-
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल अपने पहले ही सत्र में अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा उतरा है और अपने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में उन गुणों का विकास करने में सफल हुआ है जो उसे औरों से अलग बनाते हैं। समय-समय पर विद्यालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक, रचनात्मक गतिविधियों का संचालन कराया जाता है जो विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मंच प्रदान करते हैं। इन गतिविधियों का खबरें जिले के प्रमुख अखबारों में सदैव छपती रहती हैं।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
नर्सरी से कक्षा 8 तक
पिछले सत्र में विद्यालय कक्षा चार तक कक्षायें संचालित करता था। इस सत्र में कक्षा 8 तक कक्षायें संचालित की जायेंगी। भविष्य में यह कक्षा 12 तक चलेगा जिससे यह सभी स्तर के विद्यार्थियों की सेवा करने में सक्षम होगा।

सत्र 2017-18 के लिये रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है। सीमित सीटे हैं अतैव शीघ्र करें।
रजिस्ट्रेशन के लिये संपर्क करें-
9125366128/8299844533
लाइक करें- www.facebook.com/mhsmrj
ईमेल करें- milstoneheritage@gmail.com




बाहुबली- 2

bahubali के लिए चित्र परिणाम
दो साल का इंतजार अंततः खत्म हुआ। बाहुबली 2 रिलीज हुई और रिलीज के पहले ही दिन इसने 100 करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया जिसके पास पहुँचते पहुँचते ज्यादातर फिल्में हाफने लगती हैं।
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, यह सवाल सोशल मीडिया में दो सालों तक गूँजता रहा। लोगों की उत्सुकता इस फिल्म के प्रति दीवानगी के हद तक जा पहुँची। यहाँ तक कि मेरे विद्यालय में पढ़ने वाली एक लड़की ने बड़े ही गर्व से बताया कि वह 28 अप्रैल को गोरखपुर जा रही है बाहुबली 2 देखने। किसी फिल्म के प्रति इतना क्रेज, यह बताने के लिये काफी है कि उस फिल्म की कमाई कहाँ तक पहुँचेगी। फिल्म पंडित यह कयास लगा रहे हैं कि यह भारत की पहली फिल्म बन सकती है जो 1000 करोड़ रूपये की कमाई कर सकती है।
निःसन्देह पहली फिल्म हर मायनों में भारतीय फिल्मों से कई साल आगे रही थी। भव्य सेट, रिच कलर, शानदार सिनेमैटोग्राफी, अचंभित करने वाले ग्राफिक्स इन सबने मिलकर एक मायाजाल रच दिया था जिसके भीतर जाने पर दर्शक को कुछ याद नहीं रहता था। बाहुबली के कई सारे दृश्य ऐसे हैं जो अभी तक मानस पटल पर अंकित हैं लेकिन अफसोस कि बाहुबली 2 उस पैमाने पर खरी नहीं उतरी। हालाँकि यह फिल्म भी आम भारतीय फिल्मों से बहुत बेहतर है लेकिन इसमें पहले वाली बात नहीं।

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा इसके जवाब में दर्शक किसी अकल्पनीय ताने-बाने की कल्पना कर रहे थे, लेकिन हकीकत में यह बहुत ही सतही साबित हुआ। शिवगामी देवी द्वारा अपने पुत्रमोह में कटप्पा को यह आदेश देना कि बाहुबली को मार दो अथवा वह उसे मार देंगी, बहुत ही बचकाना रहा। कटप्पा द्वारा बाहुबली को धोखे से मारने की बजाय प्रजा रक्षा के लिये उसके द्वारा खुद मौत के गले लगाने का निर्णय लेना और भी ज्यादा भावनात्मक प्रभाव पैदा करता।
दूसरे हाफ में भल्लाल के षडयंत्र इतने जल्दी-जल्दी घटित होते हैं कि किसी एक को भी एस्टाब्लिश करने का समय ही नहीं मिला।
शिवगामी देवी के चरित्र में इतनी जल्दी यू टर्न आना, अगले कुछ दृश्यों में बाहुबली को मारने का आदेश दे देना, खटकता है।  
जिस बाहुबली को पहली फिल्म में देवता समान दिखाया गया वह दूसरी फिल्म में अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के चलते अपनी जान गँवा बैठा, अखरता है।
पहले फिल्म में अरब से आये हुये एक हथियार के सौदागर का चरित्र दिखाया गया है, जिसे सुदीप ने निभाया था, दूसरे फिल्म में उसके दुबारा लाने की पूरी गुंजाइश थी लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।
पहली फिल्म में युद्ध के दृश्य हालीवुड फिल्मों को भी मात देते थे...वह आकर्षण इस फिल्म में नजर नहीं आया।
पहली फिल्म में महेन्द्र बाहुबली का चरित्र अमरेन्द्र बाहुबली के टक्कर का था, लेकिन इस फिल्म में उसका इस्तेमाल सही तरीके से नही हो पाया।

और भी कई चीजे हैं लेकिन हम अपने कमरे में बैठकर फिल्म मेकिंग को जज नहीं कर सकते। फिल्म बनाने में हजारों लोगों की मेहनत और समय लगता है और बाहुबली को बनाने में तो लाखों की मेहनत लगी होगी। इस फिल्म ने इतिहास बनाया है लेकिन जिससे आशा होती है अगर वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो एक टीस मन में रह ही जाती है। फिलहाल बाहुबली टीम को बधाई...।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...