Saturday, August 19, 2017

बाढ़ का कहर

बाढ़ में  डूबा हुआ प्राथमिक विद्यालय
समस्त उत्तर भारत में पिछले कई दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश की वजह से हिमालय से निकलकर उत्तर के मैदान में बहने वाली नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। जगह-जगह तेज बहाव के कारण टूट चुके तटबन्धों से बह रहे पानी ने हजारों गाँवों को समंदर बना दिया है। जिधर देखिये उधर पानी ही पानी नजर आ रहा है। गोरखपुर-बस्ती मंडल के दर्जनों जिले बाढ़ की कहर से सहमे हुये हैं और हजारों जिंदगियाँ दूसरों की कृपा की मोहताज हो गई हैं।
क्या मूसलाधार बारिश बाढ़ की असली वजह है?
कायदे से कहा जाय तो कतई नहीं। बाढ़ की असली वजह बारिश नहीं बहुत हद तक प्रशासन की लापरवाही है। हालाँकि हर साल की तुलना में बारिश इस बार कुछ दिनों के अंतराल में ज्यादा हुई लेकिन इतने बड़े स्तर पर बाढ़ लाने में मात्र इसकी भूमिका को ही रेखांकित नहीं किया जा सकता है। असल में बाढ़ का कहर नदियों के किनारे वाले क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई दे रहा है जिसकी वजह है बंधों का टूटना। नेपाल के पहाड़ी इलाकों से बारिश का पानी नदियों के जरिये उ.प्र. के तराई जिलों जैसे-महराजगंज, सिदधार्थनगर इत्यादि जिलों मे आता है। अचानक हुई आशा के विपरीत ज्यादा बारिश ने नदियों के किनारों पर दबाव बनाया और सालों से कमजोर बन्धे एक-एक कर टूटते गये। 

महराजगंज में बाढ़ की स्थिति-
बाढ़ में डूबी हुई सड़क
महराजगंज जनपद के वे इलाके जो नदियों के किनारे वाले हिस्से में पड़ते हैं वहाँ बाढ़ की विभिषिका ज्यादा देखने को मिल रही है। जनपद के फरेंदा, पनियरा, धानी, नौतनवा, ठूठीबारी इत्यादि क्षेत्रों में बाढ़ अपने चरम स्थिति पर है। सैकड़ों गाँव जलमग्न हैं और उनको राहत पहुँचाने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। रोहिन नदी के आसपास का इलाका पूरी तरह पानी में डूब गया है और गाँव टापू की तरह दिखाई दे रहे हैं। महराजगंज का एकमात्र इंजीनियरिंग कालेज, आई टी एम पूरी तरह से पानी में  डूब गया है। कई लोंगे की मृत्यु हो चुकी है और सैकड़ों मवेशी लापता हैं। महराजगंज-फरेंदा मार्ग, ठूठीबारी-निचलौल-मार्ग, महराजगंज-पनियरा मार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप है। जिलाधिकारी के आदेश पर जनपद के समस्त स्कूल, कालेज 20 अगस्त तक बन्द कर दिये गये हैं।

नगर पालिका की हालत बुरी-

मूसलाधार बारिश की वजह से महराजगंज नगर पालिका की हालत पूरी तरह से खस्ता हो गई है। पानी की उचित निकासी न होने की वजह से कई मुहल्ले पूरी तरह से पानी में डूब चुके हैं। मुख्य सड़कें चलने लायक नहीं हैं और दुकानों में पानी घुँस गया है। व्यापार पूरी तरह से ठप  है।

बाढ़ के बाद बीमारी-

समस्या आगे और भी भयंकर होगी जब पानी उतरने के बाद बाढ़ग्रस्त इलाकों में संक्रामक और मच्छर जनित बीमारियों का प्रकोप बढेगा। प्रशासन को इसका सामना करने के लिये अभी से तैयार होना पड़ेगा क्योंकि आने वाले समय में बीमारियाँ महामारी की तरह फैलेंगी। 


दस्तक सुरेन्द्र पटेल
निदेशक
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Monday, June 19, 2017

विराट एण्ट कंपनी


अपेक्षायें प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं।
अपेक्षाओं का दबाव
एक छोटी सी कहानी जो मैं अक्सर सुनाता हूँ, आपको भी सुनाना चाहता हूँ।
एक छोटे से गाँव में रूई धुनने वाला धुनिया रहता था। गाँव में छोटे-मोटे रजाई गद्दे बनाकर उसका और परिवार का गुजारा नही हो पा रहा था इसलिये वह शहर चला गया। शहर भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, मुंबई। एक परिचित के साथ वह घूमने के लिये यूँ ही बन्दरगाह चला गया जहाँ एक गोदाम में उसने पहाड़ जैसे रूई के गट्ठर देखे। जहाँ तक नजर जाती थी बस उसे रूई ही रूई दिखाई देती थी। देखते ही देखते उसे चक्कर आया और वह बेहोश हो गया। गोदाम के अंदर हल्ला मच गया। थोड़ी देर में वहाँ भीड़ जुट गई और देखते ही देखते उसे हास्पिटल पहुँचा दिया गया। डाक्टर को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्योंकि उसकी शरीर पूरी तरह से ठीक था और धड़कन सामान्य रूप से चल रही थी। सभी लोग उसके परिचित की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहे थे। डाक्टर ने विस्तार से उससे पूरी बात सुनी और उसे धुनिये की बीमारी के बारे में पता चल गया। वह बाहर गया और थोड़ी देर में कमरे के बाहर शोर मच गया कि “रूई के गोदाम में आग लग गई-रूई के गोदाम में आग लग गई....” काफी देर तक यह शोर आस-पास गूँजता रहा और सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं जब उन्होने देखा कि धुनिया बड़बड़ाते हुये उठा- “बहुत अच्छा हुआ कि रूई के गोदाम में आग लग गई वरना सारी रूई मुझे ही धुननी पड़ती...मैं तो मर जाता”
ठीक यही स्थित भारतीय क्रिकेट टीम के सामने अक्सर उपस्थित होती रहती है। हर बार वह अपने ऊपर बेजा अपेक्षाओं का इतना अधिक दबाव ले लेती है कि रेशम के कीड़े की भाँति अपने द्वारा ही बनाये गये रेशम में उलझकर दम तोड़ देती है। और बात जब भारत-पाकिस्तान मैच की हो तो यह दबाव युद्ध स्तर का हो जाता है जहाँ शुरुआती पिछड़ाव पूरा युद्ध हरवा देता है।
जब भारत दूसरी इनिंग में बल्लेबाजी करने उतरा तो रोहित शर्मा से लगायत, शिखर धवन, विराट कोहली, युवराज सिंह और महेन्द्र सिंह धोनी शायद यही सोचकर उतरे कि सारा दारोमदार उन्ही के ऊपर है और अगर वह आउट हो गये तो भारत मैच हार जायेगा। और अगर भारत मैच हार जायेगा तो उनकी तो छोड़ो, देशवासियों का दिल टूट जायेगा। एक अरब लोगों को पाकिस्तान से हारने का दुख वर्षों तक सालता रहेगा। अब क्या कहें ऐसे देशवासियों और क्रिकेट प्रेमियों को जिनका दिल, मासूम बच्चियों और औरतों से बर्बर बलात्कार और हत्या से नहीं टूटता। उनका दिल तब नहीं टूटता जब पैसे के अभाव में अस्पताल में कोई गरीब दम तोड़ देता है और उसके परिवार वालों को शव कंधे पर लादकर ले जाना पड़ता है। उनका दिल तब भी नहीं टूटता है जब गुंडे ताकत और धनवान पैसे के दमपर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं। लेकिन उनका दिल भारत के क्रिकेट मैच हार जाने पर जरूर टूट जाता है और पाकिस्तान से हारने पर तो उनको हार्ट अटैक आ जाता है।
बार-बार ऐसा क्यों हो जाता है क्रिकेट खिलाड़ियों से हम इतनी उम्मीद क्यों लगाकर रखते हैं। क्यों उसी शाम को कदांबी श्रीकान्त और हाकी टीम के जीतने की खबर भारत के हारने की खबर के नीचे दब जाती है। इसकी एकमात्र वजह है क्रिकेट की ब्राडिंग और खिलाड़ियों को सुपर हीरो की तरह पेश करना। भारत में दस साल पहले तक कोई ऐसा खेल नहीं था जिसपर भारतीय गर्व कर सकें। हाकी की प्रतिष्ठा कई दशकों पहले ही मिट्टी में मिल चुकी थी। इसके अलावा कोई और खेल था ही नहीं जिसमें भारतीय चुनौती गंभीरतापूर्वक ली जाती। क्रिकेट में भी ऐसा कुछ था नहीं...वो तो 1983 का वर्ड कप था जिसमें भाग्य के सहारे भारतीय टीम ने दो बार के चैंपियन वेस्टइंडीज को हरा दिया। किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और कहा तो यहाँ तक गया कि यदि अगले 100 मैच भारतीय टीम वेस्टइंडीज के साथ खेलती तो उसके एक भी मैच जीतने की उम्मीद नहीं थी। भाग्य के सहारे जीत का सिलसिला 2011 में महेन्द्र सिंह धोनी की अगुवाई में टूटता हुआ दिखाई दिया और वर्तमान टीम हर मायने से पुरानी टीम से बेहतर है। वह चैंपियन्स ट्राफी जीतने की दावेदार थी लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई।
जब विश्वास रूपी नाव में भय रूपी छेद हो जाता है तो नाव के डूबने का समय तो नहीं लेकिन परिणाम तभी तय हो जाता है। कल समाचार चैनलों को शायद कोई खबर ही नहीं मिली सिवाय भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच के कवरेज के। महासंग्राम, सदी का मुकाबला, रणभूमि, जीता है जीतेंगे....और भी ना जाने क्या क्या शीर्षकों से समाचार दिखाये जा रहे थे। और जब भारत हार गया तब भी वह भिन्न-भिन्न शीर्षकों से समाचार दिखा रहे होंगे। एक बात तो साफ है...किसी की हार हो किसी की जीत हो, कोई मरे-कोई जिये, कहीं फसल अच्छी हो-कहीं सूखा पड़ जाये, कुछ भी हो, मीडिया की पाँचों उंगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में रहता है।

फिलहाल कोई कुछ भी कहे, भारतीय टीम चैंपियन्स ट्राफी जीत सकती थी, यदि वह हार गई है तो इसकी एकमात्र वजह है....दबाव। 10 विकेट मात्र दस गेंदों पर ही गिरते हैं...और एक गेंद को गेंदबाज के हाथ से निकलने और बल्ले पर पहुँचने में सेंकेन्ड भी नहीं लगता है...उसके बीच में यदि बैट और बाल के अतिरिक्त उसे कुछ भी दिखाई-सुनाई दिया तो आउट होना तय है। भारतीय टीम इसी दस सेकेण्ड में हारी...बाकी तो पूरे टूर्नामेन्ट में वह विजेता की तरह खेली।
दस्तक सुरेन्द्र पटेल
निदेशक माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स

Monday, June 5, 2017

चाभी और ताला

जीवन का अमूल्य सिद्धान्त

यदि कोई चाभी किसी ताले को नहीं खोल पाती तो इसका अर्थ यह नही कि वह चाभी गलत है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि हमने उसे सही ताले में नहीं लगाया। हमारा प्रयास यहीं खत्म नहीं होना चाहिये, बल्कि निरंतर जारी रहना चाहिये, तब तक, जब तक कि वह सही ताले को खोल ना ले। याद रखें कि चाभी की सार्थकता तभी तक है, जब तक कि वह अपने अभीष्ट ताले को खोल ना ले। यदि वह ऐसा नहीं कर पाती  तो वह मात्र एक लोहे का टुकड़ा है जिसका कोई प्रयोजन नहीं।
जरा सोचिये अगर वह चाभी अपने सही ताले में को खोल सके तो क्या पता, उसके पीछे क्या हो? रुपया, पैसा, दौलत, ज्ञान, यश और सम्मान और ना जाने क्या-क्या। चूँकि ताला किसी कीमती वस्तु की हिफाजत के लिये ही लगाया जाता है इसलिये ये निश्चित है कि कुछ ना कुछ कीमती तो मिलेगा ही। अफसोस कि ज्यादातर चाभियाँ बिना अपने अभीष्ट ताले को खोले ही निष्प्रयोजनीय होकर नष्ट हो जाती हैं। यह उस चाभी की बर्बादी है।

यह सिद्धान्त मानव जीवन पर शत-प्रतिशत लागू होता है। जीवन में हम कोई लक्ष्य तय करते हैं और कभी-कभी उसे प्राप्त नहीं कर पाते और निराश होकर बैठ जाते हैं। यह आपके पुरुषार्थ की बर्बादी है। क्या हुआ अगर आपका प्रयास सफल नहीं हुआ। असफलता के कई कारण हो सकते हैं लेकिन थक-हारकर बैठ जाने का कोई कारण नहीं। इसलिये अगर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त करने में असफलता मिली हो तो हो सकता है कि आप उस लक्ष्य के लिये नहीं बने हों, और आपका लक्ष्य कहीं और इन्तजार कर रहा हो। 

Friday, June 2, 2017

चन्द्रास्वामी


समय एक जैसा नहीं रहता। गुजरते हुये जमाने के साथ इंसान की ताकत और प्रभाव खत्म होता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब वह मौत के कगार पर खड़ा अपने जीवन का अंत देखता है और बेबस, लाचार होकर सब कुछ यहीं छोड़कर चला जाता है। अच्छा भी और बुरा भी।
1996 का वो दौर जब पी.वी.नरसिम्हा राव प्रधान मंत्री , चन्द्रास्वामी उनके सलाहकार और मैं कक्षा 8 वी का छात्र हुआ करता था। पढ़ने लिखने का शौक तब था इसलिये पत्रिकायें उस समय भी मँगाकर पढ़ता था। उस समय आजकल के जैसे सनसनी फैलाने वाले न्यूज चैनल्स नहीं हुआ करते थे। खबरों के लिये दूरदर्शन का समाचार, पढ़ने के लिये अखबार और पाक्षिक समाचार पत्रिकायें जैसे माया और इंडिया टुडे हुआ करते थे। उस समय इंडिया टुडे खबरों के लिये विश्वस्त पत्रिका हुआ करती थीऔर उसमें प्रधामंत्री नरसिम्हा राव के बारे में काफी कुछ लिखा जाता था।
ऐसा माना जाता था कि चन्द्रास्वामी नरसिम्हा राव के सलाहकार थे। चन्द्रास्वामी उन्हे कौन सी सलाह देते थे, धार्मिक, राजनैतिक या फिर कूटनीतिक, इसके बारे में वही दोनों बेहतर तरीके से बता सकते हैं लेकिन दुख की बात है कि अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं रहे। नरसिम्हा राव के प्रधाममंत्री पद से हटते ही चन्द्रास्वामी पर अनेकों मामले दर्ज हो गये और उन्हे जेल भी जाना पड़ा। यह वह वक्त था जब उनके सितारे गर्दिश में जाने लगे थे और 23 मई 2017 को उनकी मौत के बाद भारतीय राजनीति का एक ऐसा अध्याय बन्द हुआ जिसे आज के समाचार चैनल या फिर राजनीतिक पार्टियाँ खोलने में हिचकिचा रहे हैं।
चन्द्रास्वामी का जन्म राजस्थान के बहरोर में एक छोटे से व्यापारी धर्मचंद जैन के घर पर हुआ था। उनके पिता सूद पर पैसे उठाते थे। उनके जन्म के बाद उनका परिवार हैदराबाद बस गया जहाँ 16 साल की उम्र में उनकी दिलचस्पी तंत्र-मंत्र में होने लगी और उन्होने घर छोड़ दिया। इसके बाद वह जैन धर्मगुरू महोपाध्याय अमरमुनि के संपर्क में आये। 23 साल की उम्र में काशी आये और फिर कुछ समय बिहार में भी रहे।
कुछ लोगों का मानना है कि चन्द्रास्वामी को तंत्र-मंत्र और ज्योतिष की कोई जानकारी नहीं थी और वह दूसरे से प्राप्त सूचना के आधार पर कुण्डली विवेचन करते थे। वे नागार्जुन सागर प्रोजेक्ट में स्क्रैप डीलर का काम करने लगे जहाँ धोखाधड़ी का मामला उजागर होने के बाद उसे छोड़ने के लिये बाध्य हुये।

नरसिम्हा राव से नजदीकी-
वह 1971-73 का दौर था जब चन्द्रास्वामी और नरसिम्हा राव की नजदीकियाँ जगजाहिर हुई। उसके पहले राजनीतिक गलियारों में उनकी पहुँच का रास्ता सिद्धेश्वर प्रसाद से शुरू हुआ जब वो 1962 में लोकसभा सांसद बनकर दिल्ली आये। उनके सर्वेन्ट क्वार्टर में दो लोग रहा करते थे एक चतुर्भुज गौतम और दूसरे चन्द्रास्वामी। बाद में चतुर्भुज गौतम चन्द्रशेखर के निजी सचिव बने। धीरे-धीरे चन्द्रास्वामी कांग्रेसी नेताओं के घरों के चक्कर लगाने और उनकी कुण्डलियाँ बनाने लगें। इस तरह से राजनीति और अंधविश्वास के जोड़-तोड़ के गणित के माहिर बन गये। अपने पीले वस्त्र, रुद्राक्ष की माला, बड़ी दाढ़ी मूछ, लंबे बाल के सम्मिलित प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्होने राजनीतिक गलियारें में अपनी अच्छी पकड़ बना ली।
वक्त के साथ सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशी राजनेताओं, शासनाध्यक्षों और हथियार के सौदागरों से चन्द्रास्वामी की बहुत अच्छी जमने लगी। एक वक्त ऐसा था जब उनके संबन्ध ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर, और सउदी अरब के सबसे बड़े हथियारों के व्यापारी अदनान खशोगी तक से थे। बालीवुड का राजनीति, पैसे और पावर से पुराना नाता रहा है इसलिये वहाँ के कुछ चमते सितारे चन्द्रास्वामी के भक्त थे जिनमें राजेश खन्ना और आशा पारेख जैसे नाम शामिल थे।
अदनान खशोगी से सबन्धों की बुनियाद पर ही भारत में हथियारों का सबसे बड़ा घपला बोफोर्स हकीकत में बदल सका, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

चन्द्रास्वामी ने राम मंदिर निर्माण में भी मध्यस्थता कराई थी और मुलायम सिंह यादव से भी उनके संबन्ध थे। 1982 में मिस इंडिया रही पामेला बोर्डस ने डेली मेल को दिये गये इण्टरव्यू में बताया था कि वह अदनान खशोगी और चन्द्रास्वामी ने अपना हित साधने के लिये उनका इस्तेमाल भी किया था। चन्द्रास्वामी ने पावर, मनी, हथियार और सत्ता का ऐसा काकटेल बनाया जिसमें वो कई साल तक किंग मेकर बने रहे। लेकिन वक्त एक जैसा नहीं रहता 1996 के बाद उनपर ताबड़तोड़ कई मुकदमे दर्ज हुये और उन्हे तिहाड़ जेल जाना पड़ गया। सत्ता से दूर रहने के बाद भी उनके चाहने वाले चारों ओर मौजूद रहे और उन्हे किसी खास किस्म की परेशानी नहीं हुई। अपने मौत के पहले तक वह दिल्ली में अपने आलीशान फार्म हाउस कम आश्रम में रहे और 66 साल की उम्र में उनकी मौत के बाद ही लोग जान सके कि  वह अस्पताल में भर्ती थे और मृत्यु के पहले उनके सारे अंगो ने कार्य करना बंद कर दिया था। 

Sunday, April 30, 2017

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स
पड़री रोड महराजगंज, उ.प्र. 273303
शिक्षा सतत चलने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सीखने वाले की उम्र कोई मायने नहीं रखती। विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि क्या पढ़ना है बल्कि यह सिखाया जाता है कि कैसे पढ़ना है। दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाता और विद्यालय का अधिकाँश समय इसमें ही बीत जाता है कि बच्चों को कैसे पढ़ना चाहिये। इस कड़ी में अध्ययन के व्यापक क्षेत्र को संकुचित करके मात्र विषयों के रटने तक ही सीमित कर दिया जाता है। यह विद्यार्थियों की क्षमता का वैसा ही दुरुपयोग है जैसे  आइंसटीन को पत्थर तौड़ने का काम दे दिया जाय या फिर रेस में दौड़ने वाले घोड़े को तांगे में जोत दिया जाय। उनकी कल्पनाशीलता को मात्र विषयों को पढ़ने और परीक्षा में कुछ उत्तर देने हेतु तैयार करने तक ही सीमित ना करके उसे ज्ञान के अनंत आकाश के एक छोर से दूसरे छोर को नापने के लिये उन्मुक्त छोड़ दिया जाय।
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल, लर्निंग विद सेन्स-एजुकेशन विद डिफरेन्स, पड़री रोड, महराजगंज का एकमात्र उद्देश्य यही है। इस संस्था का उद्देश्य ना तो व्यवसाय, ना ही किसी प्रकार की प्रतिष्ठा अर्जित करना है।
                                   
निदेशक/प्रबंधक
सुरेन्द्र पटेल

लघभग 18 सालों से अध्यापन कार्य से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े रहने वाले सुरेन्द्र पटेल भूगोल विषय से परास्नातक और एडिटिंग में डिप्लोमा हैं। इन्होने लघभग दो दशक से शिक्षा, शिक्षार्थी और अध्यापन को करीब से देखा और समझा है। वर्तमान समय में शिक्षा के बदलते हुये परिवेश और विद्यार्थी के दिलो-दिमाग को बखूबी समझने वाले सुरेन्द्र पटेल भली-भाँति समझते हैं कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी आधारित है। जिसमें बच्चों को पढ़ाई के प्रति जिज्ञासु बनाया जा सकता है बजाय इसके कि उन्हे विषयों को रटने के लिये मजबूर किया जाय। इन्होने शिक्षा के कुछ बेहद जरूरी सिद्धान्त बनाये हैं जिसमें प्रमुख है फाइव सी का सिद्धान्त।
इनकी नजर में अध्यापन बहुत ही चैलेन्जिंग कार्य है। इसमें विद्यार्थियों के सामने आपको अपनी सारी काबिलियत झोंकने की जरूरत होती है जिसके द्वारा आप उन्हे बता सकें कि आपकी उपयोगिता गूगल गुरू से कहीं ज्यादा है। एक अच्छा अध्यापक क्रिकेट में आलराउंडर की तरह होता है जो बैंटिंग, बालिंग और फील्डिंग तीनों जिम्मेदारी अच्छे तरीके से निभा सके। सुरेन्द्र पटेल विषयों के संदर्भ में न सिर्फ भूगोल, इतिहास, अंग्रेजी, हिन्दी, कला, कंप्यूटर बल्कि संगीत के क्षेत्र में आर्गन, सैक्सोफोन, बाँसुरी, खेल के संदर्भ में क्रिकेट, वालीबाल, शतरंज, बैडमिन्टन, लेखन के क्षेत्र में निबंध, कहानी, कविता इत्यादि में विशेष योग्यता रखते हैं।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल

आपके पाल्य के लिये सबसे सही जगह क्यों?
यह एक ऐसा विद्यालय जहाँ आपके बच्चे को वे सारी सुविधायें मिलती हैं जो उसे सर्वांगीण विकास करने में सहायक होती हैं। इसके साथ ही साथ उसे अपने आपको निखारने का पूरा मौका मिलता है न सिर्फ एकेडमिक लेवल बल्कि क्रियेटिव लेवल पर भी। क्लासेज में उसकी बेसिक चीजों जैसे लिखावट और उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा विद्यालय में अनेक ऐसी सुविधायें प्रदान की जाती हैं जो उसके विद्यार्जन और व्यक्तित्व विकास के लिये आवश्यक हैं।

1-फाइव सी
विद्यार्थियों के ओवरआल डेवलपमेन्ट के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल इस सिद्धानत को फालो करता है जिसमें-
1.      क्यूरियसिटी
2.      क्रियेटिविटी
3.      कान्टिन्यूटी
4.      कान्फडेन्स
5.      कम्यूनिकेशन
पर ध्यान दिया जाता है। क्यूरियसिटी बच्चे की पहली अवस्था होती है जिसमें वह किसी चीज के प्रति जिज्ञासु बनता है। जिज्ञासा उसे अगले पड़ाव यानि क्रियेटिविटी की तरफ ले जाती है जिसमें वह उसे जानने या समझने के लिये अपने नजरिये का विकास करता है। उसके बाद कान्टिन्यूटी की अवस्था आती है जिसमें वह अपने नजरिये को अभ्यास के धरातल पर ले जाता है और उसे लगातार जारी रखता है जबतक कि उसे उसमें प्रवीणता ना हासिल हो जाये। इसके बाद कान्फडेन्स की स्थिति आती है जिसमें वह अपने द्वारा अर्जित किये गये ज्ञान को परखता है और खुद में आत्मविश्वास का संचार करता है जो उसे कम्यूनिकेशन के अंतिम अवस्था तक ले जाती है जिसमें वह अपने ज्ञान व कौशल को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है और सफल व्यक्ति बनता है।

2-इंग्लिश मीडियम
वर्तमान विश्व में अंग्रेजी विचारों के अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपने ज्ञान को दूसरों के सामने प्रस्तुत कर सकता है। देखा गया है कि विद्यार्थी जब अपने शहर व जिले से बाहर निकलता है तो

अंग्रेजी न बोल पाना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती है। इससे पार पाने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में अंग्रेजी कम्यूनिकेशन का एक बेहतर माहौल बनाया गया है जिसमें बच्चा अंग्रेजी न सिर्फ पढ़ पाता है बल्कि उसे व्यवहार में भी लाता है।

3-को-एजुकेशन
पूरे विश्व में लैंगिक समानता समाज के विकास के लिये सबसे बड़ी जरूरत में से एक बन गई है। आजकल हर जगह महिलायें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे चल रही हैं। विद्यालय में यह सोच विकसित करने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में को एजुकेशन की व्यवस्था लागू की गई है जिसमें लड़के और लड़कियाँ साथ पढ़ते हैं और विकास के रास्ते तलाश करते हैं।

4-आडियो-विजुअल क्लासेज
कक्षाओं को विद्यार्थी आधारित और विषयों की समझ को सुगम बनाने के लिये माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल में आडियो-विजुअल क्लासेज का व्यवस्था की गई है। इसके लिये कमरों में एल ई डी टीवी और इंटरनेट की व्यवस्था की गई है। एनिमेटेड कंटेन्ट को देखने के बाद बच्चा उसे आसानी से समझता है और लंबे समय तक उसे याद भी रख पाता है।

5-वीडियो लेसन्स
विद्यालय में कोर्स आधारित वीडियो, पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन बनाये जाते है और उन्हे टी वी के माध्यम दिखाया जाता है। इससे न सिर्फ उनका मनोरंजन होता है बल्कि उनका ज्ञान भी बढ़ता है।

6-एडवांस कंप्यूटर लैब
कंप्यूटर की पढ़ाई के लिये विद्यालय में एडवांस कंप्यूटर लैब की व्यवस्था की गई है जिसके द्वारा बच्चों को पाठ्यक्रम में शामिल चीजें तो पढ़ाई ही जाती है बल्कि उन्हे इंटरनेट, मीडिया और एनिमेशन की भी जानकारी दी जाती है।

7-लाइब्रेरी
बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिये एक पुस्तकालय की भी व्यवस्था भी की गई है जिसके द्वारा बच्चों को पाठ्यक्रम से इतर घर ले जाने के लिये मनोरंजक व ज्ञानवर्धक किताबें दी जाती हैं। बच्चे उसे पढ़ते हैं और पुनः विद्यालय को वापस कर देते हैं।

8-साइंस लैब
कक्षा 6 से बच्चों मे वैज्ञानिक अभिरूचि जागृत करने के लिये एक मिनी साइंस लैब की भी व्यवस्था की गई है।

9-फ्री कोचिंग
कोचिंग कल्चर समाप्त करने के लिये विद्यालय में शाम को एक्स्ट्रा क्लासेज चलती हैं जिसकी कोई फीस नही ली जाती है। इसमें विद्यार्थियों के होमवर्क, कठिन विषयों को पुनः पढ़ाना, खेलकूद इत्यादि शामिल हैं।

10-म्यूजिक, योगा क्लासेज
बच्चों में अन्य गुणों को विकसित करने के लिये विद्यालय में म्यूजिक, डांस और क्राफ्ट की कक्षायें चलती हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास का संचार होता है और वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ पाते हैं।






11-अनुभवी अध्यापक
अध्यापन कार्य के लिये विद्यालय में अनुभवी अध्यापकों की न्युक्ति की गई है जो न सिर्फ उच्च शिक्षित हैं बल्कि समझदार और बच्चों की मानसिकता को भली-भाँति समझने वाले हैं।

12-वाहन सुविधा
दूर-दराज के बच्चों को विद्यालय ले आने और ले जाने के लिये विद्यालय में वाहन की व्यवस्था भी की गई है।

13- साउण्ड सिस्टम-
 विद्यालय में निजी साउण्ड सिस्टम और लाउडस्पीकर्स हैं जिसका उपयोग प्रतिदिन असेंबली के दौरान किया जाता है। बच्चे माइक में बोलते हैं जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
अब तक-
माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल अपने पहले ही सत्र में अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा उतरा है और अपने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में उन गुणों का विकास करने में सफल हुआ है जो उसे औरों से अलग बनाते हैं। समय-समय पर विद्यालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक, रचनात्मक गतिविधियों का संचालन कराया जाता है जो विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मंच प्रदान करते हैं। इन गतिविधियों का खबरें जिले के प्रमुख अखबारों में सदैव छपती रहती हैं।

माइलस्टोन हेरिटेज स्कूल
नर्सरी से कक्षा 8 तक
पिछले सत्र में विद्यालय कक्षा चार तक कक्षायें संचालित करता था। इस सत्र में कक्षा 8 तक कक्षायें संचालित की जायेंगी। भविष्य में यह कक्षा 12 तक चलेगा जिससे यह सभी स्तर के विद्यार्थियों की सेवा करने में सक्षम होगा।

सत्र 2017-18 के लिये रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है। सीमित सीटे हैं अतैव शीघ्र करें।
रजिस्ट्रेशन के लिये संपर्क करें-
9125366128/8299844533
लाइक करें- www.facebook.com/mhsmrj
ईमेल करें- milstoneheritage@gmail.com




बाहुबली- 2

bahubali के लिए चित्र परिणाम
दो साल का इंतजार अंततः खत्म हुआ। बाहुबली 2 रिलीज हुई और रिलीज के पहले ही दिन इसने 100 करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया जिसके पास पहुँचते पहुँचते ज्यादातर फिल्में हाफने लगती हैं।
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, यह सवाल सोशल मीडिया में दो सालों तक गूँजता रहा। लोगों की उत्सुकता इस फिल्म के प्रति दीवानगी के हद तक जा पहुँची। यहाँ तक कि मेरे विद्यालय में पढ़ने वाली एक लड़की ने बड़े ही गर्व से बताया कि वह 28 अप्रैल को गोरखपुर जा रही है बाहुबली 2 देखने। किसी फिल्म के प्रति इतना क्रेज, यह बताने के लिये काफी है कि उस फिल्म की कमाई कहाँ तक पहुँचेगी। फिल्म पंडित यह कयास लगा रहे हैं कि यह भारत की पहली फिल्म बन सकती है जो 1000 करोड़ रूपये की कमाई कर सकती है।
निःसन्देह पहली फिल्म हर मायनों में भारतीय फिल्मों से कई साल आगे रही थी। भव्य सेट, रिच कलर, शानदार सिनेमैटोग्राफी, अचंभित करने वाले ग्राफिक्स इन सबने मिलकर एक मायाजाल रच दिया था जिसके भीतर जाने पर दर्शक को कुछ याद नहीं रहता था। बाहुबली के कई सारे दृश्य ऐसे हैं जो अभी तक मानस पटल पर अंकित हैं लेकिन अफसोस कि बाहुबली 2 उस पैमाने पर खरी नहीं उतरी। हालाँकि यह फिल्म भी आम भारतीय फिल्मों से बहुत बेहतर है लेकिन इसमें पहले वाली बात नहीं।

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा इसके जवाब में दर्शक किसी अकल्पनीय ताने-बाने की कल्पना कर रहे थे, लेकिन हकीकत में यह बहुत ही सतही साबित हुआ। शिवगामी देवी द्वारा अपने पुत्रमोह में कटप्पा को यह आदेश देना कि बाहुबली को मार दो अथवा वह उसे मार देंगी, बहुत ही बचकाना रहा। कटप्पा द्वारा बाहुबली को धोखे से मारने की बजाय प्रजा रक्षा के लिये उसके द्वारा खुद मौत के गले लगाने का निर्णय लेना और भी ज्यादा भावनात्मक प्रभाव पैदा करता।
दूसरे हाफ में भल्लाल के षडयंत्र इतने जल्दी-जल्दी घटित होते हैं कि किसी एक को भी एस्टाब्लिश करने का समय ही नहीं मिला।
शिवगामी देवी के चरित्र में इतनी जल्दी यू टर्न आना, अगले कुछ दृश्यों में बाहुबली को मारने का आदेश दे देना, खटकता है।  
जिस बाहुबली को पहली फिल्म में देवता समान दिखाया गया वह दूसरी फिल्म में अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के चलते अपनी जान गँवा बैठा, अखरता है।
पहले फिल्म में अरब से आये हुये एक हथियार के सौदागर का चरित्र दिखाया गया है, जिसे सुदीप ने निभाया था, दूसरे फिल्म में उसके दुबारा लाने की पूरी गुंजाइश थी लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया।
पहली फिल्म में युद्ध के दृश्य हालीवुड फिल्मों को भी मात देते थे...वह आकर्षण इस फिल्म में नजर नहीं आया।
पहली फिल्म में महेन्द्र बाहुबली का चरित्र अमरेन्द्र बाहुबली के टक्कर का था, लेकिन इस फिल्म में उसका इस्तेमाल सही तरीके से नही हो पाया।

और भी कई चीजे हैं लेकिन हम अपने कमरे में बैठकर फिल्म मेकिंग को जज नहीं कर सकते। फिल्म बनाने में हजारों लोगों की मेहनत और समय लगता है और बाहुबली को बनाने में तो लाखों की मेहनत लगी होगी। इस फिल्म ने इतिहास बनाया है लेकिन जिससे आशा होती है अगर वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो एक टीस मन में रह ही जाती है। फिलहाल बाहुबली टीम को बधाई...।

Sunday, April 23, 2017

तेरा लाइक-मेरा लाइक

बहुत दिन नही हुये जब फेसबुक को कोई जानता नही था। पिछले कुछ सालों में इसके इस्तेमाल करने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक इजाफा हुआ है। फेसबुक ही नहीं बल्कि हर प्रकार के सोशल मीडिया प्लेटफार्म के इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ी है। मास कम्यूनिकेशन के साधनों में सोशल मीडिया ने अपनी पकड़ बहुत बजबूत बनाई है। निःसन्देह यह काबिले तारीफ है। इन्टरनेट और सोशल मीडिया ने विश्व को और ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया है। बीते कुुछ सालों की बात करें तो हमें अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के लिये कम्यूनिकेशन के पारंपरिक माध्यमों पर निर्भर रहना पड़ता था। जिसमें पत्र, टेलीफोन, बैनर, पोस्टर इत्यादि शामिल थे। ये तरीके धीमे, खर्चीले और कम लोगों तक पहुँचने वाले थे। इसके उलट सोशल मीडिया ने आज इसको बहुत ही ज्यादा आसान बना दिया है। आज कोई भी व्यक्ति जिसके फ्रेन्डलिस्ट में हजार-पाँच सौ लोग भी हैं, और वह फेसबुक पर छींकता भी है तो उसका संक्रमण उतने लोगों तक पहुँचता है। अच्छी बात है।
आक्सीजन जीवधारियों के लिये सबसे ज्यादा आवश्यक अवयय है जिसके बिना जिन्दगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इंसान और जानवर तो क्या पेड़-पौधे भी आक्सीजन के बिना नहीं रह सकते लेकिन इसी आक्सीजन की एक सबसे बड़ी खामी है कि यह जलने के लिये भी आवश्यक है। यह खामी भी है और खासियत भी। जब कहीं आग लग जाती है तो यह खामी नहीं तो खासियत के रूप में सृष्टि की सेवा करती रहती है। यही बात सोशल मीडिया पर भी लागू होती है। पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी, जो कालेज, स्कूल यहाँ तक कि प्राइमरी तक में पढ़ रहे हैं, इन माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैंऔर किसलिये सिर्फ अपने फोटोज शेयर करने के लिये। दिमागी तौर पर उनकी सोच इतनी ज्यादा विकसित ही नहीं हुई कि वो इन माध्यमों के जरिये कुछ रचनात्मक या फिर सर्जनात्मक विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। अफसोस होता है जब छोटे-छोटे बच्चे फेसबुक पर प्यार और मोहब्बत के बारे में अपनी राय और उनसे जुड़े अनाप-शनाप फोटोज शेयर करते हैं। पहले के स्कूलो में मेेरे पढ़ाये हुये बच्चे जो आज छठवीं से लेकर बारहवीं कक्षाओं में पढ़ रहे हैं वो बेधड़क लव, हेट, आफेक्शन पर अपने विचार रख रहे हैं। उससे भी बुरी बात कि उनको लाइक करने वालों की कमी भी नही है। 
बच्चे अपनी सेल्फी लेते हैंं, एडिट करते हैं, कैप्शन लिखते हैं और पोस्ट कर देते हैं। फिर शुरू होता है उसको लाइक और कमेंट करने का सिलसिला, जिसमें नाइस, आसम, डैशिंग, गुड लुकिंग, झक्कास इत्यादि शब्दों की भरमार होती है। हर कमेंट के लिये शेयर करने वाला थैंक्स ब्रो, थैंक्स भाई और थैंक्स दोस्त इत्यादि की कृतज्ञता दिखाता  है। बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि इन शब्दों की वास्तविक जिन्दगी में कोई अहमियत ही नही हैं। असली नाइस, आसम और हैण्डसम इत्यादि का कंप्लेन्ट तब मिलता है जब बच्चा पढ़ लिख कर लायक बन जाता है और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के काबिल हो जाता है। असली कमेंट फोटो में बाइक, कार या फिर नदी के किनारे फोटो खिंचवाने नहीं बल्कि रियल लाइफ में उसे अपने दम पर खरीद कर चलाने में हैं। 
दुख की बात है कि आजकल के बच्चे इस आभासी दुनिया में इतना रम गये हैं कि वो हकीकत की तरफ मुँह करना ही नहीं चाहते। मैं कई ऐसे बच्चों को जानता हूँ जो इण्टर की क्लासेज में फेल हो चुके हैं लेकिन फेसबुक पर उन्हे लाइक करने वालों की संख्या सैकड़ों हैं। असल में ये लाइक करने वाले भी उसी कैटगरी के बच्चे हैं।  बच्चे दूसरों को देखकर बहुत प्रभावित होते हैं। वो सेलिब्रिटीज की फैन फालोइंग को देखकर अपनी भी समांतर फैन फालोइंग बनाना चाहते हैं लेकिन ये भूल जाते हैं कि अमिताभ की करोड़ों फैन फालोइंग फेसबुक इस्तेमाल करने से नहीं बल्कि पचासों साल से की गई मेहनत का परिणाम है। जिन नाम शख्सियतों के सोशल मीडिया पर फैन बेस को देखकर हम प्रभावित होते हैं वो उनके काम की वजह से है ना कि फेसबुक इस्तेमाल करने की वजह से है। मुझे याद है कि मैं जब मुंबई में था तब सचिन ने 2008-2009 मे ट्विटर अकाउंट ओपेन किया था और उनके अकाउंट ओपेन करते ही फालोअर्स की संख्या करोड़ों के पार चली गई। उस समय ट्विटर मिड डे में प्रतिदिन उनके बढ़ते फालोअर्स की संख्या प्रकाशित करता था। अगर सचिन क्रिकेट के भगवान नहीं होते तो उनको ये फैन फालोइंग की  संख्या पाते ना जाने कितना समय लगता। मैं खुद भी फेसबुक का 2008 जनवरी से इस्तेमाल करता हूँ। उस समय बहुत कम लोग इसके बारे में जानते थे। मैं खुद भी एक दोस्त के द्वारा ही जान सका जो उस समय दुबई से आई थी। लेकिन आज भी मेरे दोस्तों की संख्या 1000 तक नहीं पहुँची हालाँकि सैकड़ों फ्रैन्ड रिक्वेस्ट को मैने अभी एसेप्ट नहीं किया। 
सवाल यह है कि फ्रेन्ड लिस्ट बढ़ाने से क्या फायदा जब आप समाज और दूसरों के जीवन के लिये सार्थक योगदान नहीं कर सकते। गलतफहमी किसी हद तक ठीक हो सकती है लेकिन खुशफहमी निश्चित तौर पर इंसान के आगे बढ़ने में रूकावटें पैदा करती है। 
पढने वाले बच्चों से मेरी यही गुजारिश है कि वो पहले अपने पढ़ाई पर ध्यान दें और बाद में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें क्योंकि यह धीरे-धीरे हमारी आदत में शुमार होता जा रहा है और आदतें अच्छी भी होती हैं और बुरी भी।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...