Tuesday, July 17, 2012

हिग्ज बोसान

ईश्वरीय तत्व एवं एवं सदी की सबसे महान खोज के रूप में प्रसारित किया जा रहा हिग्स  बोसान निःसन्देह ही विज्ञान और जीवन की उत्पत्ति के विषय में हमारे ज्ञान के पथ पर एक मील का पत्थर साबित होगा  पर इसे ईश्वर का रूप प्रचारित करना कहीं ना कहीं हमारी अहं भावन को प्रदर्शित करता है जैसा कि प्रो. यशपाल कहते हैं- "हिग्ज बोसान कणों की खोज वाकई ऐतिहासिक पल है पर इसे ईश्वरीय तत्व या गॉड पार्टिकल कहना अनुचित है।"
आज के संभवतः तीन या चार महीने पूर्व जब हिग्ज बोसान कणों के अस्तित्व की एक धुंधली सी तस्वीर वैज्ञानिकों को दिखाई दी थी तब मैने अपने ब्लाग पर इन कणों के खोज के विषय में लिखा था किन्तु उस समय किसी गॉड पार्टिकल जैसी किसी चीज की जानकारी नही थी और ना ही मीडिया में इस कदर हो हल्ला मचा था लेकिन इस समय स्थिति एकदम उलट है।
हिग्ज बोसान वे अतिसूक्ष्म कण हैं जो कणों में भार सुनिश्चित करते हैं जिनका अस्तित्व एक सेकेण्ड के अरबवें हिस्से तक रहता है और जिनके न रहने पर कोई भी वस्तु भारहीन हो जायेगी। इसी आधार पर ये कयास लगाये जा रहे हैं कि भविष्य में चीजों को भार के बिना प्रकाश की गति से कहीं भी प्रक्षेपित किया जा सकेगा। मानव इतिहास के लिये यह मील का पत्थर साबित होगा लेकिन विज्ञान के विकास स्थापित किये गये पूर्व के मील के पत्थरों पर नजर डालने से पता चलता है इन सभी मील के पत्थरों ने मानव के रास्ते में पथ प्रदर्शन के बजाय उन्हे भटकाया ही है। अरबों खरबों रूपये खर्च करके जिस कण के तलाश में वैज्ञानिक जुटे हैं आशा है कि वह व्यर्थ नही जायेगा।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Monday, May 28, 2012

दिल्ली की मेट्रो और उम्मीद की किरण

पिछले तीन सालों में दिल्ली में बहुत सारे बदलाव हुये जिनकी झलक 2012 में मिल रही है। सबसे बड़ा बदलाव मानवीय शक्ति से चलने वाले रिक्शों के किराये में है जो लघभग तीन गुना बढ़ चुका है। सड़कों की लंबाई और चौड़ाई दोनो बढ़ चुकी है। सूरज का तापमान नाकाबिले बर्दाश्त हो चुका है। सूरज की गरमी से तपती सड़कों और सिर पर बरस रहे अंगारों की जलन से सड़क पर दो कदम चलना भी दुश्वार हो चुका है। पैसा बरस रहा है लेकिन इसके साथ ही बढ़ता प्रदूषण जाड़े में दिखाई देने वाले कोहरे  की चादरों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। हरपल धूल से सना आकाश अपने आखों में बरबस ही आ जा रहे आँसुओं को रोकने की कोशिश में असफल हो जा रहा है। ऐसे विरोधाभासी माहौल में कुछ पल सुकून के भी मिल जाते हैं दिल्ली की मैट्रों में।
तीन साल पहले तक मेट्रों का विस्तार ब्लू और येलो लाइन के सीमित से स्टेशनों तक ही था।

लेकिन आज यह दिल्ली की सारी जगहों को जोड़ती है।  येलो और ब्लू लाइनों के अलावा औरेंज लाइन और ग्रीन लाइन भी अस्तित्व में आ चुके हैं जिसके और भी विस्तार की योजना है। दिल्ली की चौड़ी लेकिन जलती हुई सड़कों से हटकर मेट्रो की अत्यंत ही व्यस्त बोगियाँ एक सुकून का अहसास कराती हैं। भीड़ चाहे कितनी भी क्यों ना हो, घुटन का अहसास बिलकुल भी नही होता।

मेट्रों का संचालन, स्टेशन की साफ-सफाई और रख-रखाव, स्टेशन पर कार्यरत अधिकारियो और सुरक्षा कर्मचारियों का व्यवहार और अनुशासन इत्यादि ऐसे पहलू है, जो हमारे देशवासियों औऱ नेताओं, दोनो के लिये नजीर हैं। काश कि सारा देश मेट्रों की तरह ही हो जाता।
दिल्ली के व्यस्त, बेहाल औऱ प्रदूषित वातावरण में दिल्ली की मेट्रो उम्मीद की एक किरण दिखाती तो है।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Friday, April 6, 2012

वर्षासुन्दरी के प्रथम आगमन की महिमा


कल सीजन की पहली बारिश हुई, और वाकई कमाल की हुई। आँधी, तूफान, ओले, बिजली और ना जाने किस-किस के साथ हुई। किसी को खुशी दे गई तो किसी को गम। किसी की छत उड़ी तो किसी की कटरैन। घर के सामने खड़े बाँस के झुरमुटो की हालत तो ऐसी हो गई थी मानो वे वर्षासुन्दरी की खूबसूरती और उसके क्रोध मिश्रित तिरछी नजर से हड़बड़ाकर सजदे की हालत में आ गये हों। आम के पेड़ पर लगे बौर उसकी चपलता के आगे शरमाकर खुद ही डालियों से लदफदाकर गिर गये जैसे, आम ने भी उससे हार मान ली हो और बगल में लगे गुलाब की हालत तो उस माली की भाँति हो गई थी जिसने राजकुमारी के आगमन से पहले ही उसके रास्ते में फुलवारी के सारे फूल ही बिछा दिये हों। जिस प्रकार राजा के आगमन के समय प्रजा में उल्लास का रोमाँच हिलोरे मारने लगता है और छोटे बड़े में कोई भेद नही रह जाता उसी प्रकार रास्ते में पड़ी धूल भी उल्लसित होकर वर्षासुन्दरी के साथ चलने वाली सहचरी, हवा के प्रयास से ऊपर उठकर अपनी प्रसन्नता का प्रदर्शन कर रही थी।
उसके पथ का प्रदर्शन कर रही तड़ित मालिकाओं के प्रकाश से सारा वातावरण उसी प्रकार आलोकमय हो जाता था जैसे अंधेरी रात में सूरज की किरणों ने समस्त संसार में उजाला फैला दिया हो। कोयल की मीठी आवाज
उसके पायलों की मीठी झनकार के आगे बेसुरी प्रतीत हो रही थी और वातावरण में बसंत के आगमन के बाद व्याप्त हरियाली उसकी आँखों के काजल के सामने बेरंग लग रहे थे। सारे पशु-पक्षी वर्षासुन्दरी के आगमन से प्रफुल्लित थे और इंसान, अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति की वजह से खुश भी था और दुखी भी।

दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Friday, March 30, 2012

अतिक्रमण का साँप और चालाक सपेरे

जिस प्रकार बरसात के मौसम में साँप अपने बिल से बाहर निकलकर आस-पास के लोगों को डराने की कोशिश करता है और कोई फायदा न देखकर वापस अपने बिल में ही वापस चला जाता है उसी प्रकार महराजगंज में अतिक्रमण हटाने के प्रयास भी पानी वाले साँप के कुतूहल उत्पन्न करने के की कोशिश ही नजर आते हैं। हम सभी जानते हैं कि हमारे कस्बे में अतिक्रमण और जाम की समस्या बड़ी विकट हो गई  है जिसकी वजह से आये दिन परेशानियाँ खड़ी हो जाया करती हैं। कुछ दिन पूर्व नगरपालिका वाले भारी भरकम पुलिस दस्ते के साथ अतिक्रमण करने वालों से जूझते नजर आये औऱ सड़क को उनके नाजायज कब्जे से निजात दिलाया। लेकिन मुहाने को साफ नहीं करा सके। यानि कि जिस चौराहे पर अतिक्रमण हटाने की सबसे ज्यादा जरुरत थी वहाँ कुछ हुआ ही नहीं। तहसील बिल्डिंग, चौराहे की कुछ दुकानों पर बुलडोजर नही चले। फलस्वरूप सड़कों पर कब्जे की दुबारा कोशिश शुरु हो  ही गई।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Wednesday, January 11, 2012

चुनाव आयोग का डंडा, नेताओं पर शिकंजा

पिछले कई चुनावों के दौरान भारत की संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग की कर्मठता और उसकी कार्यप्रणाली निःसंदेह काबिले तारीफ है। चुनाव आचार संहिता के लागू होते ही राजनीति के खुंखार शेर सहमे-सहमे से नजर आते हैं और उन्हे डर सताने लगता है कि कहीं उनकी दावेदारी खतरे में न पड़ जाये। मुझे याद है हमारे बचपन के दिनों में जब भी कोई चुनाव आता था तो महीनों पहले से ही प्रत्याशियों के दौरे प्रारंभ हो जाते थे। लाउडस्पीकरों के शोर और नारेबाजी के तूफान में आमआदमी का जीना मुहाल हो जाता था। शहर की दीवारें और सड़के पोस्टरों और बैनरों से इस कदर ढ़क जाती थीं कि नीली छतरी को देखने के लिये जान हथेली पर रखना पड़ता था। देशी विदेशी मदिरा के दुकान पर चौबीसों घंटे मेला सा लगा रहता था। लेकिन शुक्र है चुनाव आयोग ने देर से ही सही लेकिन अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया और दो महीने के लिये ही सही, बिगड़ैल साड़ों के नथुनों में नकेल डाली तो सही। काश कि भारत की सरकार चुनाव आयोग जैसी ही होती।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Monday, January 9, 2012

भोजन का अधिकार दिलायेंगे- राहुल गाँधी

 उत्तर प्रदेश के चुनावी महासंग्राम में विरोधियों के खेमें मे हुंकार भर रहे राहुल द्वारा मुस्लिम आरक्षण के बाद फेंका गया पासा भोजन की गारंटी का है। देवरिया में चुनावी सभा को संबोधित करते हुये उन्होने कहा कि रोजगार गारण्टी की योजना की भाँति भोजन के अधिकार का कानून बनाया जायेगा...जाहिर सी बात है कि जब सरकार सत्ता में आयेगी तब।
ध्यान से देखने से पता चलता है कि राहुल गाँधी के द्वारा दिये गये इस बयान में भारतीय जनमानस में व्याप्त आम सोच की झलक मिलती है। आमतौर पर हर नेता वही बोलता है जो जनता सुनना चाहती है।  जिससे सुनकर उसे अच्छा लगता है। अपनी सोच को राहुल जैसे नेता के मुँह से सुनकर जनता फूली नही समाती और एक बार फिर बेवकूफ बन जाती है अगले पाँच वर्षों तक बेवकूफ बने रहने के लिये। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली जनता जो सच्चे मायनों में गरीब है औऱ रोटी का जुगाड़ करने में ही उसका पूरा दिन निकल जाता है, वह रोटी के ऊपर कुछ सोच ही नही सकती । वह उसके जीवन की सबसे बड़ी समस्या और सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा भी, जिसके पूरे होने के बाद उसके पास सोचने और करने के लिये कुछ नही बचता क्योंकि उसे उस लायक बनाया ही नही गया कि वह रोटी से ऊपर कुछ सोच सके।
विज्ञान कहता है कि मनुष्य के विकास के पीछे इसकी महत्वाकांक्षा बहुत बड़ा योगदान है जिसके फलस्वरूप उसे परिस्थितियों से लड़कर प्राप्त करने के साथ साथ उसे धीमे किन्तु मजबूत कदमों से आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिलती है। भारत की दो तिहाई जनता की महत्वाकांक्षा रोटी ही है इसलिये अगर जनता राहुल गाँधी उसकी यह महत्वाकांक्षा पूरी करने का वादा करते हैं तो भारतीय जनता उन्हे वोट क्यों न दे....।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

Thursday, January 5, 2012

भाजपा पर दाग, देश का दुर्भाग्य

माया की जूठन कमल पे आये,
भ्रष्टाचारी मंत्रियों को भाजपा गले लगाये,
गले लगाके भाजपा खूब करे सम्मान,
जैसे द्वार सुदामा के आये हों भगवान।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर साँप छछुंदर जैसी स्थिति में अपने आपको हमेशा पाने वाली भाजपा ने कुछ दिनों पहले ये साबित कर दिया कि, क्षणिक लाभ के लिये सभी पार्टियाँ देश औऱ जनता, दोनों से विश्वासघात करने में अपने कदमों को पीछे नही हटातीं। जिन मंत्रियों को बसपा ने लात मारकर निकाल दिया था उन्हे भाजपा ने गले लगाकर अपनी फटी तहमद में दो चार पैबंद और जोड़ लिये। उत्तर प्रदेश में पिछले पाँच वर्षों के दौरान भाजपा शीतलहर में उगने का प्रयास कर रहे सूरज की भांति जद्दोजहद करती नजर आयी और 2011 के शुरूआती दौर में अन्ना के आंदोलन से निकली चिंगारियों की सहयता से राजनीति के भँवर में डूबती उतरती अपनी नैया में ईंधन देने का प्रयास करते हुये 2012 के शुरुआत में ऐसे औंधे मुँह गिरी कि उसे बसपा के त़ड़ीपार मंत्रियों का दामन थामने के लिये विवश होना पड़ा। राजनीति के अखाड़े में मायके और ससुराल के बीच में झूलती नई नवेली दुलहिन की भाँति नेताओं का रूठना और मानना आम बात है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इनका जमीर उन्हे रोकता है या नही। शायद नही रोकता तभी तो नटों की भाँति रस्सी पर चलते हुये इन्हे गिरने का कोई डर नहीं सताता क्यों हाथ में थमी बल्ली इन्हे गिरने में लगी चोट से बचाती है। अगर नेताओं में भय की लहर जगानी है तो इनके हाथ में थमी बल्ली को इनसे छीनना ही होगा।
दिल से निकलगी, ना मरकर भी, वतन की उल्फत मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी....।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...