Tuesday, August 10, 2010

उत्तर बनाम दक्षिण भाग एक-शिक्षा

भारत में कुल 300 मेडिकल कालेज हैं जिनमें 143 सरकारी क्षेत्रों में तथा 157 निजी क्षेत्रों में है। मैं मेडिकल कालेजों की संख्या के बारे में चर्चा नही बल्कि उनकी संख्या के विभिन्नता के बारें में चर्चा करना चाहता हूँ।

महाराष्ट्र में 41, कर्नाटक में 39, आन्ध्राप्रदेश में 33, तमिलनाडु में 32 तथा केरल में 22 मेडिकल कालेज हैं। कुल मिलाकर 167 मेडिकल कालेज दक्षिण के पाँच राज्यों में हैं जो भारत की एक तिहाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व भी नही करते। बाकी के 133 मेडिकल कालेज देश के बाकी राज्यों मे हैं जिनमें से 22 उत्तरप्रदेश तथा 21 गुजरात मे हैं। अगर इन दो राज्यों के कालेजों को निकाल दिया जाय तो बचते हैं 90 कालेज जो कि देश के बाकी राज्यों में हैं।

आज के परिवेश में जब पूरा भारत उत्तर भारत के कुछ राज्यों, जिनमें से उत्तर प्रेदश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों को पिछड़ा और अशिक्षित मानता है, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि उत्तर भारत के ये राज्य इस अवस्था में क्यों हैं या फिर इनका जिम्मेदार कौन है।

ऊपर मैंने मेडिकल कालजों का एक उदाहरण दिया जो आधे से अधिक दक्षिण के पाँच राज्यों में है। किसी भी व्यक्ति, समाज या देश के विकास और प्रगति में सबसे ज्यादा जरूरी चीज है शिक्षा, वह भी स्तरीय जो उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण के राज्यों में अधिक सरलता से उपलब्ध है। दक्षिण के राज्यों में जब बच्चा हाईस्कूल या फिर बारहवीँ में होता है तो वह अपना एक टार्गेट बना चुका होता है कि उसे क्या बनना है, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या फिर साइंटिस्ट। हालाँकि उत्तर भारत के राज्यों में भी कैरियर के प्रति सजगता में विकास हुआ है लेकिन फिर भी बहुत सारी कमियाँ है। दक्षिण के राज्यों में बीटेक की डिग्री लेकर निकलने वाला एक सामान्य इंजीनियर डिग्री के साथ संचार के सशक्त माध्यम अंग्रेजी को भी साथ लेकर निकलता है जो मल्टीनेशनल कंपनियो में काम करने के लिये बुनियादी जरूरत है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के राज्यों के स्टूडेंट्स में पहला और बुनियादी अंतर यही जो आगे चलकर नौकरी पाने के अवसरों में विचलन पैदा करता है।

दक्षिण भारत के राज्यों ने शिक्षा व्यवस्था पर बहुत ही ज्यादा ध्यान दिया है और परिणाम सामने है। वहीं उत्तर भारत के राज्यो, विशेषकर उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दुर्गति अगर किसी व्यवस्था की हुई है तो वह शिक्षा व्यवस्था है। सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों, हायर सेकेंडरी स्कूलों और कालेज्स की हालत यह है कि दक्षिण भारत के कालेजों का सबसे कमजोर छात्र यहाँ के सबसे अच्छे छात्र को चैलेंज कर सकता है।

पिछले दिनों एक सरकारी मिडिल स्कूल का एक छात्र मेरे पास फोटो खिंचवाने आया। मैने उसे रेट बताया कि पंद्रह रुपये में तीन पासपोर्ट फोटो बनेंगे। ल़ड़के ने कहा मेरे पास दस रुपये हैं। मेरा जवाब था नही। पास बैठे मेरे दोस्त सेराज ने जो कि एक एडवोकेट है वो कहा कि बना दो...लड़का है। मैन कहा कि इसे घर से पंद्रह रुपये मिले होंगे फोटो खिंचवाने के लिये। पर ये दो फोटो खिंचवा कर पाँच रुपये बचाना चाहता है। जो कि भ्रष्टाचार का पहला पायदान है। जो चीज हमारी नही उसे लेना चोरी है। खैर सेराज के बहुत कहने पर मैने दो फोटो बनाने को तैयार हो गया। साथ में किसी और की फोटो भी बनानी थी इसलिये मैने दोनो की फोटो साथ लगा दी और जब वे प्रिंट होकर निकले तो पता चला कि उस लड़के की तीन फोटो निकल गई थी। मैने कहा अब तो तीन के पैसे देने ही पड़ेंगे। कमाल की बात थी, कि वह बिना कुछ कहे पंद्रह रुपये देकर चला गया। इस बात का संदर्भ मैं शिक्षा व्यवस्था पर देना चाहता हूँ, वह यह था कि फोटो तैयार करते वक्त मैनें उसकी पढ़ाई के विषय में बात करना प्रारंभ कर दिया। वह छठीं या फिर सातवीँ क्लास में था, उसे यह नही पता था कि सातवीं कक्षा को अंग्रेजी मे क्या कहते हैं। उसे नौ का पहाड़ा तक नही याद था और वह हिंदी वर्णमाला के अक्षरों तक को नही जानता था। उसे यह नही पता था कि उसके विद्यालय का गेट किस दिशा मे हैं। शायद उससे यह पूछा जाता कि वह किस देश मे रहता है तो वह यह भी नही बता पाता। उसके अनुसार उसकी दिन में सिर्फ तीन कक्षायें चलती हैं जिनमें उसे हिंदी, गणित और संस्कृत पढ़ाये जाते हैं। सरकारी स्कूलों मे पढ़ने वाले कक्षा सात के विद्यार्थी के बारे में उपरोक्त तथ्य जानकर आश्चर्य के साथ-साथ दुख भी होता है कि जब प्राइमरी लेवल की शिक्षा व्यवस्था का ये हाल है तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि उच्च शिक्षा की क्या हालत होगी।

दूसरा उदाहरण और भी विचारणीय है। मेरे जनपद का सबसे अच्छा हाईस्कूल जिसकी शिक्षा व्यवस्था विद्यालय के कथनानुसार प्रदेश में तीसरे स्थान पर है। उसके एक छात्र ने उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाइस्कूल की परीक्षा में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। जिसका विज्ञापन अखबारों, विद्यालय के प्रचार माध्यमों से दो सालों तक जोरशोर से किया गया। वही छात्र दो साल बाद बी एस सी के इंट्रेंस इग्जाम में गोरखपुर विश्विद्यालय की प्रवेश परीक्षा तक नही पास कर पाया। वर्तमान मे जनपद की थर्ड क्लास कालेज में बी एस सी कर रहा है। यह एक निजी विद्यालय है जो दिन दोगुनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहा है लेकिन सिर्फ पैसा कमाने में। विद्यालय के विषय में एक हास्यास्पद बात और है कि यह प्रदेश का तीसरा सबसे अच्छा विद्यालय है। जिसका कुल कैंपस ही एक एकड़ है। विद्यालय भवन में लघभग बीस से पच्चीस कमरे हैं और उसके अध्यापकों की स्थिति और भी चिंताजनक है। जब मैंने इसके तीसरे स्थान के बारे में सुना तो मुझे अचानक ही फैजाबाद के जिंगल बेल्स एकेडमी की याद आ गयी। जहाँ मैं राज्य स्तरी बाल विज्ञान कांग्रेस में हिस्सा लेने के लिये प्रथम बार महराजगंज की ओर से 1999 में गया था। जब मैं दसवी क्लास में था। 1999 में जिंगल्स बेल्स एकेडमी को देखने पर पहली बार अहसास हुआ कि कालेज ऐसे भी होते है। उस समय उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज महज आठ तक था। और किराये के मकान में चलता था। तीन से चार मंजिलों की जिंगल्स बेल्स एकेडमी की इमारतें अपनी भव्यता का गुणगान कर रही थी। क्लासेज इतने बड़े थे कि उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज के तीन कमरे उसमें समा जाये। यहाँ तक कि गोरखपुर विश्विद्यालय के क्लासेज भी आगे फीके थे। कालेज की अपनी ए क्लास की कैंटीन, टीचर्स अपर्टमेंट थे। 1999 में कालेज का कंप्यूटर रूम पचास के लघभग कंप्यूटरों से भरा था। कालेज के फर्श पर धूल का एक कण भी दिखाई नही देता था, और प्लेग्राउंड इतना बड़ा था कि उत्तर प्रदेश के तीसर कालेज जैसे आठ-दस कालेज इसमें बन जाते। सबसे बड़ी बात बता दें कि स्टूडेंट्स, जिनको देखने से ही लगता था कि ये किसी ए क्लास कालेज में पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं। प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन के दौरान वहाँ के आडिटोरियम जाने का मौका मिला और मैने जाना कि आडिटोरियम क्या होता है। जब कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी आडिटोरियम को बने कुछ साल हुये। जिंगल्स बेल्स एकेडमी के सेमी ओपेन आडिटोरियम में ऐसा लग रहा था कि मैं किसी और दुनिया में था। मुझे वहाँ एकमात्र स्पेशल कांशोलेशन प्राइज मिला और मैं उस पल को याद करके आज भी रोमांचित हो जाता हूँ। खैर इस बात को बीते और जिंगल्स बेल्स एकेडमी को देखे ग्यारह साल हो गये और विश्वास है कि उस कालेज ने और भी ज्यादा तरक्की की होगी, लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज और ग्यारह साल पहले के जिंगल्स बेल्स एकेडमी की तुलना करें तो आज उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज ग्यारह साल पहले के जिंगल्स बेल्स एकेडमी के बराबर क्या नीचे बैठने के लायक भी नही है। न शिक्षा के बारे में, न व्यवस्था के मामले में और न ही विद्यार्थियों के मामले में। कमाल की बात यह है कि मैं स्वयं भी आज से तेरह साल पहले इसी उत्तर प्रदेश के तीसरे कालेज से आठवीं पास हूँ। तब जब ये स्कूल किराये के मकान में चलता था।

अपवाद हर जगह होते हैं और उत्तर प्रदेश में भी शिक्षा के साथ हर क्षेत्र में भी। जिंगल्स बेल्स एकेडमी जैसे और भी कालेज होंगे जो अपने स्तर से अच्छा कर रहे होंगे लेकिन अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता। ऊपर से जिंगल्स बेल्स एकेडमी जैसे स्कूल प्राइवेट सेक्टर में हैं जिनकी फीस आम आदमी अफोर्ड नही कर सकता। राज्य सरकार को चाहिये कि वो शिक्षा व्यवस्था में तत्काल सुधार करे ताकि आने वाले सालों में शिक्षा का स्तर उपर उठ सके और उत्तर प्रदेश के विद्यार्थी भी विज्ञान, तकनीकी, कला, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में, उत्तर प्रदेश मे रहकर ही कार्य कर सकें ताकि उत्तर प्रदेश से पिछड़ेपन और अविकसित होने का दाग धीरे धीरे मिटाया जा सके। वरना नाम डुबाने के लिये उत्तर प्रदेश का तीसरा कालेज है ही........

सुरेंद्र पटेल

Saturday, August 7, 2010

आई पी एल और दंतेवाड़ा के जवानों की कंपंशेसन राशि.......




मेरे दोस्त अरविंद ने मुंबई से आज एक मैसेज भेजा कि आई पी एल में खेलने वाले हर एक खिलाड़ी को तीन करोड़ रुपये मिले और छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मरने वाले जवानों को मात्र एक लाख।

आज इस पर चर्चा करते हैं।

पहली बात तो यह कि आई पी एल में खेलने के लिये हर एक खिलाड़ी की बोली लगती है और वह खिलाड़ी लगाई गई बोली में खरीदा जाता है जो उनके नाम और प्रतिभा के अनुरूप होती है। दूसरी बात आज जमाना पैसे का है और पैसा आता है बिजनेस से, बिजनेस चलता है ऐड से और ऐड करते हैं फिल्मस्टार और क्रिकेटर। इसलिये यह कहना कोई मायने नही रखता कि किसी खिलाड़ी को कितने रुपये मिले क्योंकि वो रुपये उसे खेलने के लिये नही, हजारों करो़ड़ों रुपये के ऐड सिस्टम का हिस्सा बनने के लिये दिया जाता है। सभी जानते है कि 20-20 क्रिकेट से कम से कम क्रिकेट का तो कोई भला नही होने वाला है। यह एक ऐसा फार्मेंट है जिसमें कोई भी टीम थोड़े से अभ्यास से अच्छा खेल दिखा सकती है। एक आकलन में पिछले आई पी एल में आधिकारिक प्रसारणकर्ता सोनी ने अकेले लघभग आठ सो करोड़ का मुनाफा कमाया था। अगर सोनी इतनी बड़ी रकम कमा सकता है तो आयोजनकर्ताओं और फ्रेंचाइजी टीमों की कमाई का कोई हिसाब ही नही है और इस कुबेर की कमाई से सौ दो सौ खिलाड़ियों को देना जैसे उन्हे चुग्गा खिलाना है। असल में आज भारत में कोई सबसे ज्यादा प्रोफेशनल संस्था है तो वो बी सी सी सी आई है। पैसा बनाना तो कोई इनसे सीखे। आई पी एल की कमाई का खेल इतना हाई प्रोफाइल, फायदेमंद और उलझा है कि ललित मोदी और शशि थरूर इसके भेंट चढ़ गये।

अब बात करते हैं नक्सलियों के द्वारा मारे गये जवानों की कंपंशेसन राशि के बारे में। नक्सलियों का हमला और हमारे जवानों की मौत सीधे-सीधे हमारे आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का मामला है जो अभी सेना के हाथ में नही हमारे घटिया मंत्रियों के हाथों में है। जो कुंभकर्णी नींद में इस कदर डूबे हुये हैं कि न तो उन्हे हमारे देश के अति पिछड़े अविकसित इलाकों की चीख पुकार ही सुनाई दे रही है और न ही नक्सलियों के हमलें में मारे जाने वाले जवानों के परिवारो का क्रंदन ही। वे जब अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में राष्ट्रमंडल जैसे खेलों के आयोजन में देश की इज्जत की परवाह न करते हुये खर्चे के लिये दिये जाने वाले पैसों को दोनों हाथो से लूट सकते हैं तो उन्हे पचास, सौ जवानों की मौत से कोई फर्क नही पड़ने वाला है। बी एस एफ, सी आर पी एफ और एस एस बी जैसे सैनिक और अर्धसैनिक बलों में देश के पिछड़े इलाकों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश राजस्थान हरियाणा, आदि राज्यों से आये नवयुवक भर्ती होते हैं जिनके मरने से किसी को कोई फर्क नही पड़ने वाला। क्योंकि जितने मरते हैं उससे ज्यादा मरने के लिये भर्ती होने के लिये भर्ती होने के लिये आ जाते हैं। अगर यकीन न आता हो तो गोरखपुर और बरेली जैसे शहरों में आकर हजारों युवकों की उस भीड़ को देखिये जो ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट इत्यादि तो है लेकिन जिनमें योग्यता का अभाव है। उन्हे रोजगार पाने का ये सबसे आसान तरीका लगता है।

यह हमारी शिक्षा व्यवस्था है जो ऐसे ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट नही बनाती है जो योग्य हों। हमारा शासन तंत्र है जो जवानों की मौत पर सिर्फ घड़ियाली आँसू बहाते हैं। ये हमारे नेता हैं जो वक्त आने पर देश को भी बेच सकते हैं। प्राब्लम आई पी एल, जवानों की मौत या नक्सलियों का नही है, प्राब्लम हमारे भ्रष्ट नेताओं, सड़ चुके सिस्टम और बेइमान हो चुकी जनता में है। नेता जो अपना काम ईमानदारी से नही करते, सिस्टम जिसमें हजारो कमियाँ है, और जनता जो इतनी डरी हुई और बेईमान है कि विरोध का झंडा नही उठाती....


सुरेंद्र...

Sunday, August 1, 2010

53 प्रतिशत पाकिस्तानी मानते हैं कि भारत उनके लिये सबसे बड़ा खतरा है

शीर्षक पढ़कर हर भारतीय के मन में यह बात जरुर उठेगी कि सही है, चोर की दाढ़ी में तिनका। उपरोक्त तथ्य एक सर्वेक्षण में सामने आये हैं जिसे दो हजार पाकिस्तानी युवकों में किया गया। जाहिर सी बात है कि यदि यही सर्वेक्षण भारत में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं में किया जाय तो सौ प्रतिशत भारतीय यह मानेंगे कि पाकिस्तान भारत की शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

सर्वेक्षण वाशिंगटन के एक रिसर्च सेंटर, ग्लोबल एट्टीट्यूड प्रोजेक्ट नाम की संस्था ने पाकिस्तान में करवाया। गौर करने वाली बात यह है कि उपरोक्त संस्थान ने यही सर्वेक्षण अमेरिका में करवाया होता तो क्या होता।

अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों यह जानते हैं कि कौन किसके लिये खतरा है। इस प्रकार के सर्वेक्षणों की प्रासंगिकता कितने दिनों तक है सभी जानते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि अपगानिस्तान और ईरान मसले पर इसी प्रकार के सर्वेक्षण अमेरिका और पूरे विश्व में किये जाने चाहिये।

यह सर्वेक्षण हामिद करजई के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होने कहा है कि आतंकवादियों के खात्मे के लिये पाकिस्तान पर हमले क्यों नही किये जा रहे हैं।

भारत पाकिस्तान जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर इस प्रकार की घटिया मानसिकता वाले सर्वेक्षणों के उपरांत निकाले गये वाहियात निष्कर्षों के आधार पर दोनों देशों के बीच में कटुता बढ़ाने के बजाय अमेरिका को वियतनाम के बाद अफगानिस्तान से नंगा होकर भागने के रास्ते तालाशने चाहिये।

Sunday, July 25, 2010

मुलायम की माफी.....इतिहास के झरोखें से ताकता जिन्ना का भविष्य

मुलायम ने कल्याण सिंह को अपनी पार्टी में शामिल करने का पत्ता खेला और दाँव उल्टा पड़ गया, नतीजन उनको विधानसभा चुनावों में हार का मुँह देखना पड़ा। मुलायम को हराने में तुरुप के पत्ते साबित हुये उनके फिक्स वोट बैंक जोकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बेल्ट है। विधान सभा चुनाव फिर आने वाले हैं और मुलायम सिंह को अपनी गलती का अहसास हो गया और उन्होने बड़ी विनम्रता से मुस्लिमों से माफी माँगी कि कल्याण सिंह को पार्टी में शामिल करना उनकी भूल थी।

सवाल यह है कि क्या सोचकर मुलायम ने कल्याण सिंह को सपा में शामिल किया, अगर किया तो फिर निकाला क्यों, और निकाला भी तो अपने शामिल करने के निर्णय पर माफी क्यों माँगी, मान लीजिये माफी भी माँग ली तो क्या सोचकर मुस्लिमों से माफी माँगी। क्या वे सोचते हैं कि मुस्लिम नही समझते कि ये सारी नौंटंकी वोट के लिये है। शायद वे सही सोचते हैं, क्योंकि उनका सोचना सही नही होता तो क्यों मुसलमान उन्हे अपना हमदर्द मानते। मैं नही समझता कि उन्होने उनके लिये कुछ विशेष किया है। उन्होने अगर कुछ विशेष किया है तो सिर्फ अपने परिवार वालों के लिये।

अगर मुसलमान यह सोचते हैं कि उनका वोट लेकर मुलायम उनके लिये कुछ बेहतर करेंगे तो इससे अच्छा होता कि वे अपनी अलग पार्टी बना लेते, कुछ भी हो मुस्लिम वोट चुनावों में विचलन तो पैदा कर ही सकते हैं। मुलायम को इस बात से डरना चाहिये कि अगर यह हो गया तो उनका क्या होगा, कोई बच्चा भी उनसे पूछ सकता है कि तेरा क्या होगा कालिया। मुलायम मुस्लिम वोटों के बिना बेकार हैं और अगर वे समुदायवाद को बढ़ावा देकर अपने भूखे पेट के लिये राजनीति के तवे पर वोट रूपी रोटियाँ सेकना चाहते हैं तो इसमें कोई शक नही कि वाकई जिन्ना का भविष्य सुरक्षित है।

Monday, July 5, 2010

राजनीति- प्रकाश झा बनाम भारत, एक रिव्यू

बचपन में मैने एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें एक राजा के राज्य में दो ठग आते हैं और उससे कहते हैं कि वे उसे ऐसी पोशाक सिल कर देंगें जो सिर्फ बुद्धिमानों को दिखेगी। राजा खुश होता है और सोचता है कि इसी बहाने राज्य में बुद्धिमानों की गिनती भी हो जायेगी। वह ठगों को पोशाक सिलने के लिये ढ़ेर सारा धन देता है। ठग राजमहल में ही अपना करघा लगाते हैं और सबसे पहले कपड़ा बनाना शुरू करते हैं। राजा से लेकर मंत्री तक, सभी आते हैं पर उन्हे करघे पर सूत का एक धागा भी नही दिखता है, पर मूर्ख समझे जाने के डर से वे कुछ नही कहते हैं। आखिरकार कपड़ा तैयार हो जाता है और राजा उसे पहनकर निकलता है जो कि असल में रहता ही नही है। राजा पूरी तरह से नंगा होता है पर कोई कुछ नही कहता है। राजा कपड़ा पहन कर अपने राज्य में निकलता है और सभी देखते हैं कि राजा तो नंगा है। पर कोई नही कहता। अंत में एक छोटा बच्चा अपनी माँ से कहता है कि माँ, राजा तो नंगे हैं। उसकी माँ उसे चुर करा देती है।

दामुल से लेकर अपहरण तक का लंबा सफर तय कर चुके प्रकाश झा, काश कि इस बार जमीन की भूख, कहानी के नायक की भाँति अधिक लालच में नही पड़ते तो निश्चय ही राजनीति अपहरण की अगली कड़ी साबित होती, ठीक उसी तरह जैसे अपहरण गंगाजल की अगली कड़ी साबित हुई थी। प्रकाश झा का लालच, कहानी के रूप में महाभारत से शुरू हुआ और स्टारकास्ट के रूप में सारा पर आकर खत्म हुआ। ना जाने क्या सोचकर उन्होने राजनीति जैसे अतिसंवेदनशील विषय पर, अर्जुन रामपाल, रणवीर कपूर, कैटरीना कैफ और सारा जैसे अतिअसंवेदनशील चेहरों को लिया। रणवीर तो कुछ समझ में आते हैं लेकिन बाकियों के तो प्रकाश झा ही मालिक हैं। स्टार कास्ट और टार्गेट आडियेंस के चक्कर में उन्होने, इसको ले लूँ, उसको ले लूँ, उसको क्यों छोड़ू, चलो उसको भी ले लेता हूं....करते करते राजनीति का खाजनीति बना दिया।

वर्तमान में जहाँ राजनीति की टूटी-फूटी कुर्सी, क्षेत्रीय दलों के रूप में प्रतिदिन ठोंके जा रहे असंख्य कीलों की बदौलत टिकी है, प्रकाश झा की राजनीति एक परिवार के दो दलों पर टिकी है जिसमें घात-संघात का ऐसा दौर चलता है कि यकीन ही नही होता कि यह जिस प्रकाश झा को चेहरों के भावों, संवादों और प्रतीकात्मक रूप में हिंसा दिखाने में महारत हासिल है, उसे बार-बार गोली और बम ब्लास्ट का सहारा लेना पड़ रहा है। ऊपर से तुक्का यह कि कहानी महाभारत की एडाप्शन है।

पूरी फिल्म में अच्छे संवादों का जैसे सूखा ही पड़ गया है। नाना पाटेकर की संवाद अदायगी देखने गये दर्शकों को थियेटर से निकलते वक्त साँप सूँघ गया होगा। इससे अच्छा ये होता कि नाना को गूंगा बना दिया होता, कम से कम खलिश तो नही रह जाती। जिस चरित्र के सबसे ज्यादा संवाद थे, उसका रोल ऐसे अभिनेता ने प्ले किया जिसका चेहरा गंगा के उपजाऊ मैदान की भाँति हमेशा प्लेन ही रहता है। प्रकाश झा की जिस अभिनेता के साथ सबसे ज्यादा अंडरस्टैंडिंग है, जिसके साथ उन्होने गंभीर और व्यावसायिक सिनेमा का अंतर पाटा, उसका रोल इतना कम रखा कि पता ही नही चलता कि वह कब आता है और कब चला जाता है। उसकी मौत तो ऐसे दिखाई गयी है जैसे प्रकाश झा को समर ने सुपारी दी है कि उनको मोतिहारी का टिकट दे दिया जायेगा बस उसकी मौत ऐसे जगह पर दिखानी है जहाँ कोई और कैरेक्टर की एंट्री न हो पाये। कैटरीना के बारे में तो कहना ही क्या। भाषणबाजी में तो उन्होने सोनिया गाँधी को भी पीछे छोड़ दिया है और बेचारी सारा तो अमेरिका से भारत प्रेगनेंट होकर मरने के लिये ही आती है।

पूरी फिल्म में कुछ कलात्मक था तो वो था वीरेंद्र प्रताप का चरित्र, और उसको प्ले कर रहे मनोज वाजपेयी, बाकी सब तो विज्ञान था। अब ज्यादा क्या कहूँ, बस इतना ही कि राजनीति वाज ए बाउंसर एंड प्रकाश झा हैज मिस्ड द लाइन...। उप्स सबसे बड़ी बात तो बताना ही भूल गया। राजनीति में नसीरुद्दीन शाह का, उनके पूरे कैरियर में सबसे गंदा प्रयोग किया गया है। सच है बुढ़ापे में लोग सठिया जाते हैं...

सुरेंद्र

Monday, May 31, 2010

दोस्तों

दोस्तों, हम दिन भर में सैकड़ों मैसेज भेजते हैं, वे चुटकुले होते हैं, कमेंट होते हैं, इमोशंस होते हैं, फ्लर्टी होते हैं, डर्टी होते हैं....लेकिन क्या आपने ये भी कभी सोचा है कि भारत में कितने प्रतिशत गरीबी है, कितने लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं, कितने बच्चे प्रतिदिन वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेले जाते हैं, हमारी शासन व्यवस्था विश्व में किस पायदान पर आती है, हम भ्रष्टाचार में किस नंबर हैं, भारत के प्रति व्यक्ति पर वर्ल्ड बैंक का कितना कर्ज है....।

खाली समय में कभी-कभी ये भी शेयर कर लिया कीजिये...सही है कि अकेला कुछ नही कर सकता, लेकिन कई लोग अगर सोच लें तो कुछ भी कर सकते हैं...भारत नही अपनी आने वाली पीढ़ी के बारे में सोचिये, शायद उसके पास ये सोचने का वक्त भी नही होगा.....।

अगर आप कुछ कहना चाहते हैं तो प्लीज कमेंट दें.....http//:dastuk.blogspot.com

Saturday, May 29, 2010

नेताओं का प्रिय खेल तू-तू मैं-मैं

कब तक खून बहेगा आखिर कुर्सी खातिर जनता का,

कब तक नक्सलवाद रहेगा, लावा बना उफनता सा,

कितने ताज जलेंगे, कितने हमले होंगे संसद पे,

ना जाने कब तक हर बच्चा सोयेगा रात सहमता सा।




वैसे तो भारत में क्रिकेट खेल के उस मुकाम तक पहुँच गया है जहाँ गाहे-बगाहे इसे धर्म की संज्ञा दे ही दी जाती है, और वह धर्म ही है जिसने भारत को इस अधःपतन के गर्त में लाकर खड़ा कर दिया है। खैर मैं अपने मुद्दे से भटकना नही चाहता इसलिये मुख्य बिंदु पर आता हूँ कि नेताओं का प्रिय खेल क्या है- गौर से नजर डाली जाये तो पता चलेगा कि ये तू-तू, मैं-मैं है। दुर्भाग्यवश भारत में कोई भी दुर्घटना या फिर हादसा, या फिर आतंकी हमला होता है तो नेता बड़ी शिद्दत से इस खेल को, जीतने की पूरी कोशिश करते हुये खेलने लगते हैं। ऐसा लगता है कि वे अगर हार गये तो उनका जीवन संकट में पड़ जायेगा, सही भी है कि हारने की वजह से उनकी कुर्सी संकट में पड़ जायेगी, और कुर्सी बोले तो नेता का जीवन।

इस तथ्य को जरा और निकट से जानने की कोशिश करते हैं। 22 मई 2010 को मंगलौर में एअर इंडिया का प्लेन क्रैश हुआ जिसमें 23 की शाम तक 104 यात्रियों के मरने की खबर क्लीयर हो चुकी थी। अगर हमारे देश के नागरिक उड़्डयन मंत्री में जरा भी शर्म और जिम्मेदारी की भावना होती तो वो सबसे पहले अपना इस्तीफा देते। 150 यात्रियों की जिंदगी उनकी कुर्सी के सामने छोटी पड़ जाती है और वे गाँव की पतुरियों की तरह आक्रामक मुद्रा अपनाते हुये एअर इंडिया के अधिकारियों पर निशाना लगाते हैं, ताकि उनकी तशरीफ रखने की जगह सुरक्षित ही रह सके। 22 मई की दुर्घटना हो, या फिर 26-11 का आतंकी हमला, नक्सलियों की प्रतिदिन की खेले जाने वाली खून की होली हो या फिर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ की वजह से जाने वाली किसी यात्री की कुत्ते की तरह जान हो, हमारे देश में किसी भी नेता या फिर बड़े अधिकारी के दिल में चुल्लू भर पानी में डूब मरने का बाइज्जत ख्वाब भी नही आता।

हर घटना के बाद अपनी-अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में नेता एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करना प्रारंभ कर देते हैं और कुछ दिन बाद जनता भी सारी बातें भूल जाती है फिर से एक नई घटना का पर तू-तू, मैं-मैं सुनने के लिये।

मतदान स्थल और एक हेडमास्टर कहानी   जैसा कि आम धारणा है, वस्तुतः जो धारणा बनवायी गयी है।   चुनाव में प्रतिभागिता सुनिश्चित कराने एवं लो...